कर्मफल व्यवस्था नहीं

इस संसार में इतने साधन मौजूद हैं कि यदि उनका मिल-बांट कर उपयोग किया जाये, तो किसी को किसी प्रकार के संकटों का सामना न करना पड़े. प्राचीनकाल में इसी प्रकार की सुद्धि को अपनाया जाता रहा है. कोई कदम उठाने से पहले यह सोच लिया जाता था कि उसकी आज या कल-परसों क्या परिणति […]
इस संसार में इतने साधन मौजूद हैं कि यदि उनका मिल-बांट कर उपयोग किया जाये, तो किसी को किसी प्रकार के संकटों का सामना न करना पड़े. प्राचीनकाल में इसी प्रकार की सुद्धि को अपनाया जाता रहा है. कोई कदम उठाने से पहले यह सोच लिया जाता था कि उसकी आज या कल-परसों क्या परिणति हो सकती है? औचित्य को अपनाये रहने से वह सुयोग बना रह सकता है, जिसे पिछले दिनों सतयुग के नाम से जाना जाता था.
सन्मार्ग का राजपथ छोड़ कर उतावले लोग लंबी छलांग लगाते और कंटीली झाड़ियों में भटकते हैं. स्वार्थ आपस में टकराते हैं और अनेकानेक समस्याएं पैदा होती हैं. दूरगामी परिणामों पर विचार न करके जिन्हें तात्कालिक लाभ ही सब कुछ लगता है, वे चिड़ियों, मछलियों की तरह जाल में फंसते चाशनी पर आंखें बंद करके टूट पड़नेवाली मक्खी की तरह बेमौत मरते हैं. दुर्बुद्धि का यही कुचक्र जब असाधारण गति से तीव्र हो जाता है, तब उलझने भी ऐसी ही खड़ी होती हैं कि जन-जन को विपत्तियों के दल-दल से उबरने नहीं देती.
क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न होने में बहुधा विलंब लग जाता है, इसी कारण कितने ही लोगों में संदेह उत्पन्न हो जाता है कि जो किया है, उसकी तदनुरूप परिणति होना आवश्यक नहीं. कई बार बुरे कार्य करनेवाले भी उन पाप-दंडों से बचे रहते हैं, कई बार अच्छे कर्म करने पर भी उनके सत्परिणाम दिख नहीं पड़ते. इससे सोचा जाता है कि सृष्टि में कोई नियमित कर्मफल व्यवस्था नहीं है, यहां ऐसा ही अंधेर चलता है. ऐसी दशा में स्वेच्छाचार बरता जा सकता है. ऐसे लोग प्रतिक्रिया उत्पन्न होने में जो समय लगता है, उसकी प्रतीक्षा नहीं करते और नास्तिक हो बैठते हैं.
नशेबाज का स्वास्थ्य बिगड़ता और जीवनकाल घटता जाता है, पर वह सब कुछ तुरंत ही दिख नहीं पड़ता. यदि झूठ बोलते ही मुंह में छाले पड़ जाते, चोरी करते ही हाथ में लकवा मार जाता, व्यभिचारी नपुंसक हो जाते, तो किसी को अनर्थ करने का साहस ही न होता. भगवान ने मनुष्य की समझदारी को जांचने के लिए कदाचित इतना अवसर दिया है कि वह उचित-अनुचित का निर्णय कर सकनेवाली अपनी विवेक-बुद्धि को जागृत करे.
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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