स्वयं का होना आनंद है

Updated at :26 Aug 2015 11:38 PM
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स्वयं का होना आनंद है

मनुष्य का जीवन बिलकुल यांत्रिक बन गया है. हम जो भी कर रहे हैं, वह कर नहीं रहे हैं, हमसे हो रहा है. हमारे कर्म सचेतन और सजग नहीं हैं. मनुष्य से प्रेम होता है, क्रोध होता है, वासनाएं प्रवाहित होती हैं. पर ये सब उसके कर्म नहीं हैं, अचेतन और यांत्रिक प्रवाह हैं. वह […]

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मनुष्य का जीवन बिलकुल यांत्रिक बन गया है. हम जो भी कर रहे हैं, वह कर नहीं रहे हैं, हमसे हो रहा है. हमारे कर्म सचेतन और सजग नहीं हैं. मनुष्य से प्रेम होता है, क्रोध होता है, वासनाएं प्रवाहित होती हैं. पर ये सब उसके कर्म नहीं हैं, अचेतन और यांत्रिक प्रवाह हैं.
वह इन्हें करता नहीं है, ये उससे होते हैं. वह इनका कर्ता नहीं है, वरन उसके द्वारा किया जाना है. इस स्थिति में मनुष्य केवल एक अवसर है, जिसके द्वारा प्रकृति अपने कार्य करती है. वह केवल एक उपकरण मात्र है. उसकी अपनी कोई सत्ता, कोई होना नहीं है.
वह सचेतन जीवन नहीं, केवल अचेतन यांत्रिकता है. यह यांत्रिक जीवन मृत्यु-तुल्य है. जीवन का एक ही उपयोग है कि वास्तविक जीवन प्राप्त हो. अभी आप जिसे जीवन जान रहे हैं, वह जीवन नहीं है. जिसे अभी जीवन मिला नहीं, उसके सामने उपयोग का प्रश्न ही नहीं उठता. सत्य-जीवन की उपलब्धि न होना ही जीवन का दुरुपयोग है. उसकी उपलब्धि ही सदुपयोग है. उसका अभाव ही पछताना है.
उसका होना ही आनंद है. जो स्वयं अस्तित्व में न हो, वह कर भी क्या सकता है? महावीर ने कहा है, यह मनुष्य बहुचित्तवान है. हममें एक व्यक्ति नहीं, अनेक व्यक्तियों का आवास है. व्यक्तियों की अराजक भीड़ की जगह एक व्यक्ति हो, बहुचित्तता की जगह चैतन्यता हो, तो हममें प्रतिकर्म की जगह कर्म का जन्म हो सकता है.
आचार्य रजनीश ओशो
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