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स्वदेशी और स्वावलंबन के हिमायती जार्ज फर्नांडीस

By अनिल हेगड़े
Updated Date

अनिल हेगड़े, जार्ज के सहयोगी व समाजवादी कार्यकर्ता

आज जब कोरोना काल में भारत में आत्मनिर्भरता, देशी उद्योगों के संरक्षण, पलायन आदि पर बहस चल रही है, उस दिशा में आज से 90 साल पहले जन्मे महान समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस के विचार और उनके द्वारा लिये गये फैसले आज और ज्यादा प्रासंगिक दिख रहे हैं. साल 1977 में मोरारजी देसाई सरकार में उद्योग मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडीस ने रोजगार की तलाश में मजदूरों के गांवों से शहर की ओर हो रहे पलायन को रोकने के लिये गांधी जी और डॉ लोहिया के विचारों को ध्यान में रखते हुए नयी उद्योग नीति घोषित की थी. इसके मुताबिक प्रवासी मजदूरों को अन्य प्रदेशों में शोषण रोकने के लिए कानून बनवाया.

देशी पूंजी, पलायन रोकना, विदेशी कंपनियों के मुकाबले में नवजात देशी उद्योगों का संरक्षण, अधिक रोजगार सृजन से देश को स्वाबलंबी और आत्मनिर्भर बनाना उनकी प्राथमिकता थी. इसके लिए कोका-कोला और आइबीएम को बाहर का रास्ता दिखाया गया. तब इसका विरोध भी हुआ, लेकिन इससे देशी कंपनियां बाजार में आयीं और लाखों की संख्या में रोजगार सृजन हुआ. साल 1991 में जब बीज और दवाई की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ट्रिप्स का प्रारूप लिखा और अपने एकाधिकार के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक पर दबाव बनाकर भारत में नयी आर्थिक नीति लागू कराया, तो जॉर्ज फर्नांडीस ने उसका तीखा विरोध किया.

उनका मानना था कि यह मजदूर और किसान विरोधी नीति है. तब उन्हें लगा था कि यह मामला एक दिन के देशव्यापी हड़ताल से सुलझनेवाला नहीं है. इसी कारण उनके द्वारा 2008 तक समाजवादी अभियान के तहत लगातार हर रोज गैट समझौता विरोधी गिरफ्तारी अभियान चलता रहा. फरवरी, 1993 में दुनिया की सबसे बड़ी अनाज कंपनी कारगिल को केंद्र सरकार ने नमक बनाने के लिए गुजरात के कांडला बंदरगाह के निकट 15 हजार एकड़ जमीन देने का फैसला किया.

इसके खिलाफ जॉर्ज फर्नांडीस ने लोकसभा में आक्रमक भूमिका निभायी और उस साल 19 मई से कांडला में सत्याग्रह शुरू किया, जो चार महीने चला. इस सत्याग्रह में देशभर से सत्याग्रहियों ने रोज गिरफ्तारी दी. गांधीनगर उच्च न्यायालय में जनहित याचिका पर जॉर्ज ने बिना कोई वकील रखे खुद ही बहस की. सुनवाई के दिन 27 सितंबर, 1993 को कारगिल ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया. इससे इस सत्याग्रह को ऐतिहासिक जीत मिली. इस जीत से जार्ज उत्साहित थे.

गैट समझौते के विरुद्ध एक मार्च, 1994 को संसद के सामने समाजवादी अभियान की तरफ से सत्याग्रह शुरू हुआ. यह सत्याग्रह 14 सालों तक हर रोज चलता रहा. सत्याग्रह के लिए सत्याग्रही रोज तीन-चार घंटे संसद मार्ग में जमा होते थे. सत्याग्रह के दौरान वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय के नेतृत्व में दिल्ली के करीब डेढ़ सौ पत्रकारों ने गिरफ्तारी दी थी. इस आंदोलन में समाज के हर वर्ग का साथ मिला. इस लड़ाई में सिद्धराज डड्डा, विनोद मिश्रा, नीतीश कुमार और शरद राव जॉर्ज के आह्वान पर धनबाद में 28 मई 1994 को एक साथ मंच पर उपस्थित हुए. यूपीए-2 के समय उसी सरकार के मंत्री जयराम रमेश, संसदीय स्थायी समिति, सोपोरी समिति, सुप्रीम कोर्ट की तकनीकी समिति ने जीएम फसल पर रोक लगायी. तब तक जॉर्ज जीवित थे, लेकिन बहुत समय से बीमार थे.

तसल्ली की बात है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जीएम फसलों को बिहार में नहीं आने देने का वादा किया है और शराबबंदी लागू करके मुख्य रूप से किसान-मजदूरों के परिवारों को राहत देने का काम किया है, जो जॉर्ज को अति प्रिय था. साल 1998 से 2004 की अवधि में जॉज रक्षा मंत्री रहे. अपने अनुभव से बताते थे कि ‘हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड, आइएमएफ, वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री बेरोजगारी का कोई समाधान नहीं ढूंढ पाये. वे मानते थे कि चरखा गांधी जी के आत्मनिर्भरता का प्रतीक है और आत्मनिर्भरता स्वदेशी से ही संभव है.

जॉर्ज चाहते थे देशप्रेमी लोग स्वदेशी अभियान के साथ चीन में मानवाधिकार उल्लंघन के विरुद्ध अभियान चलायें. वे बताते थे कि वहां के बाल श्रमिक, जबरिया श्रम का फायदा उठाकर चीन सस्ता माल भारत और दुनिया में बेचता है. भारत के छोटे उद्योग इस कारण प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं. शुद्ध खादी का इस्तेमाल कार्यकर्ता या देशप्रेमी को स्वयं की प्रेरणा से ही करना पड़ेगा. देशी बीज बचाने से बीज पर विदेशी कंपनियों का एकाधिकार होना रुक सकता है.

हर दल के कार्यकर्ता अगर अपने जीवन शैली में थोड़ा बदलाव लाकर साल में दो जोड़ा शुद्ध खादी हैंडलूम और दस्तकारी चीज खरीदें, तब रोजगार बढ़ेगा. गांव से शहर की ओर पलायन कम होगा. इसके लिये किसी सरकार की अनुमति जरूरी नहीं है. बेरोजगारी और पर्यावरण की चिंता रखनेवाले लोग यह कर सकते हैं. कोरोना काल में यदि हम ऐसा कर सकें, तो यह जॉर्ज फर्नांडीस के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

(यह लेखक के निजी विचार है)

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