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समर्पित संपादकों के हौसले की ऋणी है हिंदी पत्रकारिता

Updated at : 29 May 2024 10:00 PM (IST)
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समर्पित संपादकों के हौसले की ऋणी है हिंदी पत्रकारिता

‘विशाल भारत’ के बहुचर्चित संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी की वृत्ति और भी स्वतंत्र व विशिष्ट थी. उनके प्रायः सारे संपादकीय फैसलों की एक ही कसौटी थी- क्या उससे देश, समाज, उसकी भाषाओं और साहित्यों, खासकर हिंदी का कुछ भला होगा या मानव जीवन के किसी भी क्षेत्र में उच्चतर मूल्यों की प्रतिष्ठा होगी अथवा नहीं.

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हिंदी भाषा, विशेषकर उसके शब्दों व पत्रकारिता का अब तक जो भी संस्कार या मानकीकरण संभव हो पाया है, दूसरे शब्दों में कहें, तो उनके स्वरूप में जो स्थिरता आयी है, उस सबके पीछे एक समय उसके उन्नयन की अगुवाई में अपना सब कुछ दांव पर लगा देने वाले स्वाभिमानी संपादकों की समूची पीढ़ी की जज्बे व जिदों से भरी अहर्निश सेवाओं की बहुत बड़ी भूमिका रही है. यह बड़ी भूमिका हिंदी पत्रकारिता के ‘शिल्पकार’ और ‘भीष्म पितामह’ कहलाने वाले मराठीभाषी बाबूराव विष्णु पराड़कर (16 नवंबर, 1883-12 जनवरी, 1955) से बहुत पहले से दिखाई देने लगती है, परंतु उसे ठीक से रेखांकित उन्हीं के समय से किया जाता है.

स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हिंदी पत्रकारिता को जन जागरण का अस्त्र बनाकर विदेशी सत्ताधीशों की नाक में दम करने और स्वतंत्रता के बाद नये भारत के निर्माण के लिए प्रयुक्त करने में उन्होंने खुद को ऐसा क्रांतिकारी शब्द शिल्पी तो बनाया ही, जिसके एक हाथ में कलम और दूसरे में पिस्तौल हुआ करती थी, अप्रतिम संपादकाचार्य भी बनाया. नहीं बनाया होता तो उनके समय स्थिरीकरण व मानकीकरण के दौर से गुजर रही हिंदी भाषा और पत्रकारिता अनेक ऐसे शब्दों से (साथ ही संपादकों से) वंचित रह जाती, जिनके बिना आज वह काम नहीं चला पाती. इसे यूं समझ सकते हैं कि श्री, सर्वश्री, राष्ट्रपति और मुद्रास्फीति जैसे अनेक शब्द, जिनका आज हिंदी पत्रकारिता में धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है, उन्होंने ही हिंदी को दिये. इन सबसे ऊपर, उनका सबसे बड़ा पत्रकारीय योगदान यह है कि वे संपादक नामक संस्था की सर्वोच्चता के लिए जिद की हद तक सतर्क रहे.

जब वे उन दिनों के प्रतिष्ठित दैनिक ‘आज’ के संपादक थे, उसके संस्थापक और मालिक शिवप्रसाद गुप्त से मतभेद होने पर भी उन्होंने संपादकीय सर्वोच्चता से समझौता करना गवारा नहीं किया. उल्टे उसे छोड़कर चले गये. बाद में शिवप्रसाद गुप्त के बहुत मनाने पर इस शर्त पर लौटे कि पत्र की सामग्री के चयन में उनका निर्णय ही अंतिम हुआ करेगा. साहित्यिक पत्रकारिता की बात करें, तो अपने समय की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सरस्वती’ के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (09 मई, 1864-21 दिसंबर, 1938) की उसे उत्कृष्ट बनाये रखने की जिद यहां तक थी कि कहते हैं, एक सज्जन ने उसके लिए उन्हें अपनी कविताएं भेजीं और अरसे तक उनके न छपने पर याद दिलाया कि ‘मैं वही हूं, जिसने एक बार आपको गंगा में डूबने से बचाया था’, तो आचार्य द्विवेदी का उत्तर था, ‘आप चाहें तो मुझे ले चलिए, गंगा में वहीं फिर से डुबो दीजिए, जहां आपने डूबने से बचाया था, पर मैं ये कविताएं सरस्वती में नहीं छाप सकता.’

जो मैथिलीशरण गुप्त अब राष्ट्रकवि कहलाते हैं, एक समय उनकी कविताएं उन्होंने यह कहकर छापने से मना कर दी थीं कि ‘सरस्वती’ खड़ी बोली की पत्रिका है और वे ब्रजभाषा में कविताएं लिखते हैं. अलबत्ता, ‘अस्थिरता’ के बदले ‘अनस्थिरता’ शब्द के पक्ष में बालमुकुंद गुप्त से हुए लंबे विवाद में पूरी शक्ति लगाकर भी आचार्य न उसका औचित्य सिद्ध कर पाये, न ही उसे प्रचलन में ला पाये. परंतु ‘सरस्वती’ ‘भारतमित्र’ और ‘हिंदी बंगवासी’ आदि पत्रिकाओं में उसको लेकर चले लंबे विवाद से इतना तो हुआ ही कि लेखक और संपादक भाषा और वर्तनी की एकरूपता व व्याकरण सम्मतता के प्रति पहले से अधिक सचेत रहने लगे. उन्हीं की ‘सरस्वती’ से निकले गणेश शंकर विद्यार्थी (26 अक्तूबर, 1890-25 मार्च, 1931) का जज्बा ऐसा था कि उन्होंने ‘प्रताप’ के प्रवेशांक में घोषणा की थी, ‘समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा और जरूरी साधन हम भारतवर्ष की उन्नति को समझते हैं.’

यह जज्बा इस संपादकीय नैतिकता तक जाता था कि उन्होंने 1930 में गोरखपुर में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन की अध्यक्षता की तो ‘प्रताप’ में उसकी रपट के साथ उसका चित्र छापने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उसमें वे भी शामिल थे और प्रताप में उसके संपादक का चित्र छापने या उसका महिमामंडन करने की सर्वथा मनाही थी. वे ‘प्रताप’ में छपने वाले एक-एक अक्षर की नैतिक व वैधानिक जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करते थे.

‘विशाल भारत’ के बहुचर्चित संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी (24 दिसंबर, 1892- 02 मई, 1985) की वृत्ति और भी स्वतंत्र व विशिष्ट थी. उनके प्रायः सारे संपादकीय फैसलों की एक ही कसौटी थी- क्या उससे देश, समाज, उसकी भाषाओं और साहित्यों, खासकर हिंदी का कुछ भला होगा या मानव जीवन के किसी भी क्षेत्र में उच्चतर मूल्यों की प्रतिष्ठा होगी अथवा नहीं.

जिद तो उनकी ऐसी थी कि उन्होंने छायावाद और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के विरुद्ध अभियान शुरू किया, तो उससे साहित्य जगत में उठे तूफान के बावजूद टस से मस होना स्वीकार नहीं किया. गौरतलब है कि यहां उल्लिखित संपादक ‘बटलोई के चावल’ भर हैं और हिंदी भाषा व पत्रकारिता अपने उन्नयन के लिए ऐसे और भी कितने ही समर्पित संपादकों की जिद और जज्बे की कर्जदार है. हिंदी पत्रकारिता दिवस, सच पूछिए तो उन सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का दिन है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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कृष्ण प्रताप सिंह

लेखक के बारे में

By कृष्ण प्रताप सिंह

कृष्ण प्रताप सिंह is a contributor at Prabhat Khabar.

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