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मोबाइल से बदलता परिदृश्य

By आशुतोष चतुर्वेदी
Updated Date
मोबाइल से बदलता परिदृश्य
मोबाइल से बदलता परिदृश्य
फाइल फोटो

आशुतोष चतुर्वेदी

प्रधान संपादक

प्रभात खबर

तकनीक ने सारा परिदृश्य बदल दिया है. तकनीक ने चुपके से कब हमारे जीवन को बदल दिया, हमें पता ही नहीं चला. अब हम सब, मौका मिलते ही मोबाइल के नये मॉडल और पैकेज की बातें करने लगते हैं. व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर तो जीवन की जरूरतों में शामिल हो गये हैं. मोबाइल फोन के बिना तो हमारा जीवन जैसे अधूरा ही है. शायद आप ने अनुभव किया हो कि यदि आप कहीं मोबाइल भूल जाएं या फिर वह किसी तकनीकी खराबी से वह बंद हो जाए, तो आप कितनी बेचैनी महसूस करते हैं.

जैसे कि जीवन का कोई अहम हिस्सा अधूरा हो गया हो. सूचनाएं हों अथवा कारोबार हो या फिर मनोरंजन, मोबाइल फोन की लोगों को लत लग गयी है. भारत में मोबाइल के इस्तेमाल पर नोकिया ने हाल में एक रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में लोग अन्य देशों की तुलना में स्मार्ट फोन पर औसतन ज्यादा समय बिताते हैं.

इसके अनुसार स्मार्टफोन पर भारतीय रोजाना लगभग पांच घंटे तक व्यतीत करते हैं. यह समय दुनियाभर में सबसे ज्यादा है. भारत में स्मार्ट फोन पर वीडियो देखने का चलन खासा बढ़ा है और यह 2025 तक बढ़ कर चार गुना हो जायेगा. देश में पिछले पांच वर्षों में डेटा ट्रैफिक में लगभग 60 गुना से अधिक की वृद्धि हुई है. यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

पिछले साल देश में एक सामान्य उपयोगकर्ता का मोबाइल डेटा उपयोग चार गुना बढ़ गया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में घर से काम करने की जरूरत के कारण डेटा का उपयोग तेजी से बढ़ा है. डेटा उपयोग के मामले में भारत भी बड़े बाजार में शामिल हो गया है. यहां प्रति माह प्रति उपभोक्ता मोबाइल डेटा उपयोग 13.5 जीबी से अधिक हो रहा है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति माह प्रति उपयोगकर्ता डाेटा का उपभोग साल दर साल 76 फीसदी की दर से बढ़ रहा है.

इसमें 55 फीसदी डेटा अल्प अवधि की वीडियो देखने में खर्च किया जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार मोबाइल पर ब्राडबैंड के सबसे अधिक इस्तेमाल के मामले में फिनलैंड के बाद दूसरा स्थान भारत का है. अच्छी बात है कि डेटा का इस्तेमाल बढ़ा है, पर यह भी देखना जरूरी है कि इसका इस्तेमाल किस में हो रहा है. लोग ऐसे वीडियो देखें, जिनसे ज्ञानवर्धन हो, तो बेहतर है. अगर यह इस्तेमाल समाज में विकृति लाए, तो यह चिंता का विषय है.

देश में इंटरनेट यूजर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है. सांख्यिकी वेबसाइट स्टेटिस्टा के अनुसार साल 2020 में भारत में लगभग 70 करोड़ इंटरनेट यूजर्स थे.अनुमान है कि 2025 तक यह संख्या 90 करोड़ तक जा पहुंचेगी. इसमें शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों के इंटरनेट यूजर्स की संख्या में भारी वृद्धि होगी. भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट का बाजार है. दिलचस्प तथ्य यह है कि ज्यादातर लोग इंटरनेट का इस्तेमाल मोबाइल के माध्यम से करते हैं. इंटरनेट यूजर्स की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद एक बड़ी खामी यह है कि ग्रामीण और शहरों इलाकों में इस्तेमाल करने वालों के बीच संख्या का बड़ा अंतर है.

साथ ही महिला व पुरुषों और बूढ़े और जवानों के बीच भी संख्या की बड़ी खायी है. एक बड़ी समस्या कनेक्टिविटी और कॉल ड्राॅप की है. आप बिहार, झारखंड के विभिन्न शहरों में किसी को फोन मिलाने की कोशिश करें, तो कई बार कनेक्टिविटी की समस्या से आपको दो चार होना पड़ सकता है. साथ ही इंटरनेट की स्पीड भी एक बड़ी समस्या है. जब बैंक से लेकर पढ़ाई तक, सारा कामकाज इंटरनेट के माध्यम से होना है, तो जाहिर है कि सबको तेज गति का इंटरनेट चाहिए और निर्बाध मिलना चाहिए.

इंटरनेट के साथ सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. 2018 तक के आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 32.61 करोड़ लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे थे. अनुमान है कि 2023 तक 44.8 करोड़ लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने लगेंगे. इसमें सबसे लोकप्रिय फेसबुक है. सोशल मीडिया पर आइपीएल सबसे आगे है. दुनिया की जितने भी खेलों की लीग प्रतियोगिताएं हैं, आइपीएल उसमें सबसे अधिक लाइक किया गया है.

आइपीएल के कुछ फेसबुक पोस्ट पर 5.9 करोड़ लाइक तक रहे हैं. ट्विटर पर तो लगभग 5.8 करोड़ लोग इसे फोलो करते हैं. दरअसल, भारत सोशल मीडिया कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है. विभिन्न स्रोतों से मिले आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में व्हाट्सएप के एक अरब से अधिक सक्रिय यूजर्स हैं. इनमें से लगभग 20 करोड़ भारत में ही हैं. फेसबुक इस्तेमाल करने वाले भारतीयों की संख्या लगभग 34 करोड़ और ट्विटर अकाउंट्स की संख्या लगभग 1.75 करोड़ से ऊपर है. सोशल मीडिया की समस्या यह है कि यह अनियंत्रित होता जा रहा है. इसके माध्यम से फेक न्यूज की तो जैसे बाढ़ आ गयी है. हां, यह सूचनाओं का वैकल्पिक स्रोत भी है.

नोकिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना काल में शिक्षा से जुड़े एप के इस्तेमाल में 30 फीसदी तक की वृद्ध देखी गयी. दरअसल, कोरोना ने शिक्षा के चरित्र को पूरी तरह बदल दिया है. वर्चुअल कक्षाओं ने इंटरनेट को एक अहम कड़ी बना दिया है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में एक बड़े तबके के पास न तो स्मार्ट फोन है, न कंप्यूटर और न ही इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है.

नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार केवल 23.8 फीसदी भारतीय घरों में ही इंटरनेट की सुविधा है. इसमें ग्रामीण इलाके बहुत पीछे हैं. शहरी घरों में यह उपलब्धता 42 फीसदी है, जबकि ग्रामीण घरों में यह 14.9 फीसदी ही है. केवल आठ फीसदी घर ऐसे हैं, जहां कंप्यूटर और इंटरनेट दोनों की सुविधाएं है. देश में मोबाइल की उपलब्धता 78 फीसदी आंकी गयी है, पर इसमें भी शहरी और ग्रामीण इलाकों में भारी अंतर है. ग्रामीण क्षेत्रों में 57 फीसदी लोगों के पास ही मोबाइल है.

कुछ वर्ष पहले मुझे बीबीसी के लंदन के मीडिया लीडरशिप इवेंट में हिस्सा लेने का मौका मिला. इसमें बदलते तकनीकी परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा हुई. तकनीक को लेकर तो मीडिया के क्षेत्र में भी खूब प्रयोग हुए हैं. वोइस से टेक्स्ट जैसे कई साॅफ्टवेयर भी विकसित कर लिये गये हैं. लोग अखबार तो पढ़ ही रहे हैं, साथ ही वे वेबसाइट और अन्य नये माध्यमों के जरिये भी खबरें प्राप्त कर रहे हैं. इस दौरान एक दिलचस्प तथ्य भी सामने आया कि यूरोप में मोबाइल इस्तेमाल करने वाले औसतन दिन में 2617 बार अपने फोन स्क्रीन को छूते हैं.

कोरोना काल में निश्चित रूप से इस औसत में और वृद्ध हुई होगी. मुझे लगता है कि भारत भी इस मामले में बहुत पीछे नहीं होगा. आज लगभग 70 करोड़ भारतीय इंटरनेट यूजर्स हैं. तकनीक ने हमें भी दुनिया से इतना जोड़ दिया है कि अब हम भी इन बदलावों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते हैं.

Posted By : Sameer Oraon

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