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कोरोना की दूसरी लहर के आर्थिक प्रभाव

By अजीत रानाडे
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कोरोना की दूसरी लहर के आर्थिक प्रभाव
कोरोना की दूसरी लहर के आर्थिक प्रभाव
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चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आधिकारिक आर्थिक आंकड़े इस महीने के अंत में घोषित होंगे. पिछले साल अक्तूबर से माहौल में उत्साह था और अर्थव्यवस्था में बेहतरी की उम्मीद की जा रही थी. आधिकारिक गिनती में कोरोना संक्रमण के मामलों में ऐसी तेज गिरावट आयी थी कि जनवरी के आखिर में महामारी पर जीत की घोषणा भी कर दी गयी. विश्व आर्थिक मंच के एक आयोजन में 28 जनवरी को वायरस के खिलाफ जंग में भारत की कामयाबी के बारे में बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि दुनिया की 18 फीसदी आबादी के देश ने कोरोना पर असरदार ढंग से काबू पाकर मानवता को बड़ी तबाही से बचा लिया है.

दुर्भाग्य से वह उत्साह क्षणिक साबित हुआ और महामारी की दूसरी लहर ने भारत को आक्रामक तरीके से चपेट में ले लिया. रोजाना मामलों की संख्या लगभग चालीस गुना बढ़ गयी. ऑक्सीजन, आइसीयू, बिस्तर, वेंटिलेटर, दवा और आपातकालीन सुविधाओं की कमी की वजह से मौतों की तादाद बढ़ती गयी. हालत यह हो गयी कि श्मशानों व कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ गयी.

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, इन लाशों की तादाद हजारों में हो सकती है. लाशों के साथ ऐसा करने की एक वजह यह है कि गरीब लोग चिता के लिए महंगी लकड़ी खरीदने में असमर्थ हैं और दूसरी वजह बीमारी का डर है, या शायद इसके साथ कोई वर्जना जुड़ी हुई हो.

तथ्य यह है कि वायरस उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों, छत्तीसगढ़ के घने जंगलों समेत सुदूर गांवों तथा छोटे शहरों तक फैल गया है. चूंकि बहुत सारे ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं का भी अभाव है, इसलिए अक्सर कोरोना को बीमारी व मौतों का कारण नहीं बताया जाता है. इसलिए, संक्रमण और मौतों की आधिकारिक गिनती वास्तविकता से बहुत कम हो सकती है. संतोष की बात है कि बहुत तेजी से आयी दूसरी लहर का प्रकोप अब तेजी से कम होने लगा है.

कम-से-कम महानगरों में ऑक्सीजन, बिस्तर और वेंटिलेटर के लिए बेचैन मांग अब काफी कम है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों, कम-से-कम कुछ राज्यों में स्थिति अब भी नाजुक है. इसलिए कई राज्यों में लॉकडाउन बरकरार है, जिससे आर्थिक गतिविधियां कम हो जाती हैं. ऐसे में हमें इस स्थिति के आर्थिक प्रभाव का आकलन करना चाहिए. नवंबर, 2020 में कई विश्लेषकों का मानना था कि 2021-22 के वित्त वर्ष में वृद्धि दर 12 या 13 प्रतिशत तक हो सकती है.

यह आशा संकुचन के बाद तीव्र बढ़ोतरी की संभावना पर आधारित थी. लेकिन अब इस आकलन को घटाया जा रहा है और सबसे अधिक आशावादी संभावना लगभग आठ प्रतिशत वृद्धि की है. इसका अर्थ यह है कि दो साल बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 2019 की तुलना में कुछ कम ही रहेगा. चूंकि कर संग्रहण आर्थिक वृद्धि से संबंधित है, तो इस साल कम वृद्धि से कर संग्रहण में लगभग एक से डेढ़ लाख करोड़ रुपये की कमी हो सकती है. इससे वित्तीय घाटा केंद्रीय बजट के अनुमान से कहीं अधिक हो सकता है. इसका मतलब यह है कि केंद्र सरकार को अधिक उधार लेना पड़ेगा, जिससे ब्याज दरों को कम रखना मुश्किल हो जायेगा.

मुद्रास्फीति के ताजा आंकड़े इंगित करते हैं कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 10.5 प्रतिशत के साथ 11 वर्षों में सबसे अधिक है. इसमें ईंधन और बिजली की मुद्रास्फीति 20 प्रतिशत है. थोक मूल्य सूचकांक में अखाद्य मुद्रास्फीति 15.6 प्रतिशत है. यह स्थिति आगामी कुछ महीने बनी रह सकती है. ये आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं. यह सूचकांक मुख्य रूप से उत्पादकों के लागत व्यय में बढ़ोतरी को इंगित करता है. देर-सबेर लागत का भार उपभोक्ताओं पर आयेगा. उस स्थिति में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति बढ़नी शुरू हो जायेगी.

अभी उपभोक्ता मुद्रास्फीति छह प्रतिशत से नीचे है, जो निर्धारित ऊपरी सीमा है. इस मुद्रास्फीति में खाद्य का बड़ा हिस्सा है. अपेक्षित सामान्य मॉनसून और अच्छी फसल की वजह से खाद्यान्न मुद्रास्फीति नहीं भी बढ़ सकती है. लेकिन मांस, पोल्ट्री, दूध, दाल और प्रोटीन के अन्य स्रोत महंगे हो सकते हैं. यह विडंबना है कि कुछ टमाटर किसानों ने इस कारण अपनी फसल को नष्ट करने का निर्णय लिया है कि दाम लागत से भी नीचे गिर गये हैं. बिजली, उर्वरक, श्रम आदि जैसी चीजों की लागत अच्छी-खासी बढ़ी है.

शायद यह भी एक वजह है कि प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों के महंगे होने के बावजूद यहां कीमतें कम रखने का फैसला किया है. इससे इस वर्ष किसानों को अधिक अनुदान मिलेगा. फूड एंड एग्रीकल्चर एसोसिएशन के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य मूल्य सूचकांक सात सालों के उच्चतम स्तर पर है. पिछले साल की तुलना में खाद्य तेलों की कीमत दुगुनी हो गयी है और चीनी के दाम में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. भारत में पेट्रोल की खुदरा कीमत सौ रुपये से अधिक हो चुकी है, जिससे आवागमन और खाद्य पदार्थ महंगे होंगे.

मुद्रास्फीति के साथ बेरोजगारी चिंताजनक संकेत हैं. सीएमआइई के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल में बेरोजगारी दर आठ फीसदी तक पहुंच गयी. श्रम बल भागीदारी दर (वैसे कामगारों का हिस्सा जो या तो रोजगार में है या रोजगार की तलाश कर रहा है) केवल 40 प्रतिशत रह गयी है यानी 16 से 60 साल आयु की 60 फीसदी सक्षम कार्य शक्ति बाहर है. ये लोग या तो रोजगार पाने की उम्मीद से बेजार हो गये हैं या घर या शिक्षण या प्रशिक्षण संस्थान में हैं.

यह जगजाहिर है कि महामारी ने बड़ी संख्या में महिलाओं को श्रम बल से हटने के लिए विवश किया है. वैश्विक स्तर पर श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी भारत में सबसे कम है. बेरोजगारी और मुद्रास्फीति की इस निराशाजनक स्थिति में सरकार को पहल करनी चाहिए. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत घरों में अधिक अनाज देने, निशुल्क व तीव्र सार्वभौमिक टीकाकरण, ग्रामीण रोजगार में अधिक आवंटन, स्वीकृत इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को आगे बढ़ाने तथा सरकार व सरकारी उपक्रमों में अधिकाधिक भर्ती करने जैसी पहलों के रूप में समुचित वित्त उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

स्वाभाविक तौर पर ऐसी वित्तीय पहलों के साथ सस्ती दरों पर धन मुहैया कराने की मौद्रिक नीति और सरकार द्वारा उधार लेने के कार्यक्रम को समर्थन देने जैसे उपाय भी होने चाहिए. स्वास्थ्य और आर्थिक संकट से जूझते हुए उबरने की कोशिश में लगे हम लोगों के साथ नीति-निर्धारकों तथा प्रशासकों को अपना काम करना है.

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