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हिंदी को बैसाखी की दरकार नहीं

Updated at : 18 Oct 2021 8:11 AM (IST)
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भारतीय भाषाओं में एकता का जो सूत्र संस्कृत के जरिये नजर आता है, वही सूत्र आज हिंदी के रूप में समूचे भारतीय भाषिक परिदृश्य को जोड़े हुए है.

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इस देश के किसी भी हिस्से में रहनेवाला व्यक्ति अगर यह कहता है कि ‘यू नो, हिंदी में थोड़ा हाथ वीक है’ तो मान लीजिए, वह झूठ बोल रहा है. जैसी भाषा में वह खुद को हिंदी का विपन्न बता रहा है, दरअसल उससे भी बेहतर हिंदी लिख-बोल सकता है. हिंदी की स्वीकार्यता को लेकर विवाद चलते रहे हैं और चलते रहेंगे, मगर मनोरंजन से लेकर व्यापार तक हिंदी के बिना किसी का काम नहीं चलता.

देश के किसी व्यक्ति को अलग से हिंदी सीखने की जरूरत नहीं है. हिंदी संपर्क भाषा है और संचार माध्यमों के जरिये सब ओर पसरी हुई है. किसी तमिल या तेलुगू भाषी के हिंदी शिक्षक बनने पर कोई रोक नहीं है. भाषाएं ही रोजगार का जरिया हैं. पूर्वी क्षेत्रों से निरंतर महाराष्ट्र, पंजाब जानेवाले बहुत से मजदूर अब वहीं बस गये हैं. यह जानना चाहिए कि इसमें वहां की भाषा मददगार बनी या नहीं.

हिंदी को किसी सरकारी बैसाखी की जरूरत नहीं है. दुनियाभर के आइटी विशेषज्ञों का ध्यान हिंदी समेत अनेक भारतीय भाषाओं पर है. हिंदी भारत की ही नहीं, दुनियाभर के भारतवंशियों व हिंदुस्तानियों की संपर्क भाषा है. इसका अहसास भारत में कम, विदेश जाने पर ज्यादा होता है. विश्व में हिंदी बोलनेवालों की संख्या करीब चौंतीस करोड़ बतायी जाती है. ये संख्या उन इलाकों की है, जहां विशुद्ध हिंदीभाषी रहते हैं. व्यावहारिक तौर पर ऐसा नहीं है.

हिंदी का महत्व उसे बोलने और समझनेवालों की संख्या से जुड़ा है. भारत जैसे बहुभाषी देश में चीन वाला पैमाना लागू नहीं हो सकता, जहां करीब एक अरब से भी ज्यादा लोग चीनी बोलते हैं. मगर वहां बहुभाषिकता नहीं है. भारत के बहुभाषिक होने से हिंदी जाननेवालों की संख्या एक अरब से ज्यादा हो सकती है. दुनिया में इससे भी ज्यादा. मौजूदा पैमानों पर अभी हिंदी बोलनेवालों की संख्या करीब 40 करोड़ है और यह दुनिया में पांचवे क्रम पर है.

बंगाल, तमिलनाडु, बर्मा से लेकर अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तातारिस्तान, कजाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान समेत न जाने कितने एशियाई मुल्कों में सैकड़ों बरसों से हिंदुस्तानी व्यवसायी रह रहे हैं. उस दौर से जब वे घोड़ों और ऊंटों पर माल लाद कर ले जाते थे. हिंदी ही नहीं, दुनिया की सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषाएं इसीलिए बढ़ीं क्योंकि उन्हें कारोबार ने आगे बढ़ाया, किसी सरकार ने नहीं.

विंध्याचल-सतपुड़ा के आर-पार दक्षिणापथ और उत्तरापथ के बीच सब तरफ या तो हवा बेरोक-टोक पहुंचती थी या हिंदी. रूस में अस्त्राखान नाम का शहर है, जहां सदियों पहले से भारतीय व्यापारी बसे हुए हैं. अब पूरी तरह से स्थानीय हो चुके हैं. ईसा से भी कई सदी पहले सुदूर मिस्र में भारतीय व्यापारियों की बस्तियां थीं.

भारत जैसा भाषाई विविधता वाला दूसरा कोई देश दुनिया में नहीं है. नयी शिक्षा नीति में इस बात की व्यवस्था हो कि कोई छात्र हिंदी व अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा को सीख सके. अंग्रेजी केवल मेट्रो शहरों में अथवा कार्यस्थल पर सहारा बनती है, बाकी जगह तो लोग स्थानीय भाषा ही बोलते हैं. ऐसे में हिंदी मददगार बनती है. कोई मलयाली अगर पंजाबी सीखे या कोई मराठी अगर बांग्ला सीखे, तो ऐसा रोजगार के नजरिये से ही लाभप्रद नहीं होगा, बल्कि इसके अनेक सकारात्मक आयाम होंगे.

देश की विविधरंगी संस्कृति को समझने में मदद मिलेगी. कहा जा सकता है कि ऐच्छिक तौर पर तो आज भी ऐसा किया जा सकता है. मगर इसका दूसरा पहलू भी है. किसी स्कूल में अगर चार-पांच भाषाएं सीखने-सिखाने की व्यवस्था हो, तो बच्चे अपने आप प्रेरित होंगे. गैर-हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी सिखाने की योजना, चाहे ऐच्छिक हो या अनिवार्य, लागू करने की कतई आवश्यकता नहीं है.

सरकार अगर वहां हिंदी का अतिरिक्त प्रचार-प्रसार करना चाहती है, तो किसलिए! वैसे भी यह काम एनजीओ के जरिये करवाया जा सकता है. इससे ज्यादा जरूरी है कि हिंदीभाषी क्षेत्रों में तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, बांग्ला, असमिया, पंजाबी, कश्मीरी, नेपाली, गोरखाली जैसी भाषाएं सिखाने की व्यवस्था की जाए. प्रारंभिक स्तर पर चारों द्रविड़ भाषाओं समेत मराठी, गुजराती व बांग्ला की व्यवस्था तो जिला स्तर के किसी एक स्कूल में ऐच्छिक आधार पर की ही जानी चाहिए.

हमारा मानना है कि आज हिंदी का रथ अपनी स्वयं की रफ्तार से दौड़ रहा है. हिंदी चाहे तमिल, तेलुगू, मराठी, अवधी, राजस्थानी व अन्य भाषाओं की तुलना में बहुत प्राचीन नहीं है, उसमें शास्त्रीय साहित्य नहीं है, जो पुरातनता के पैमानों पर उसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाता हो, मगर उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक देश और दुनिया को जोड़नेवाली संपर्क भाषा के तौर पर जो बढ़त हिंदी को हासिल है, वह उसके अल्पवय को देखते हुए अभूतपूर्व है. इसका महत्व इस बात में है कि हिंदी व अन्य भाषाओं का प्राकृतों से अंतरसंबंध है.

जहां तक संस्कृत का सवाल है, द्रविड़ भाषाओं में संस्कृत के रूप-भेद पहचानना कठिन होता है. मगर उनमें संस्कृत की मौजूदगी साबित करती है कि भाषाई आधार पर जो आर्य-द्रविड़ द्वंद्व दर्शाया जाता है, वह नकली है. संस्कृत और द्रविड़ भाषाओं में अटूट अंतरसंबंध रहा है. भारतीय भाषाओं में एकता का जो सूत्र संस्कृत के जरिये नजर आता है, वही सूत्र आज हिंदी के रूप में समूचे भारतीय भाषिक परिदृश्य को जोड़े हुए है.

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अजित वडनेरकर

लेखक के बारे में

By अजित वडनेरकर

अजित वडनेरकर is a contributor at Prabhat Khabar.

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