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कृषि विकास को चाहिए ठाेस पहल

By ब्रजेश झा
Updated Date
प्रतीकात्मक तस्वीर

कृषि का अर्थव्यवस्था में योगदान सिर्फ 15 प्रतिशत है, लेकिन करीब 45 से 60 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर है़ं ऐसे में कृषि का यदि अच्छे से विकास हो, किसानों को उनकी उपज का अच्छा पैसा मिले, तो कृषि कार्यों से जुड़े 45 से 60 प्रतिशत लोगों की जिंदगी बेहतर हो जायेगी़ यह अच्छी बात है कि कोरोना काल में लॉकडाउन लगने या जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बंद होने या अन्य कारणों से कृषि बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ है,

जैसाकि दूसरे क्षेत्रों के साथ हुआ है़ कृषि में संभावना है और इसकी बेहतरी के लिए जरूर सोचा जाना चाहिए, लेकिन इसके लिए सिंचाई, तकनीक, बाजार आदि से संबंधित समस्याओं को दूर करना होगा़ हमारी करीब 50 प्रतिशत भूमि ही अभी तक सिंचित हो पायी है, जबकि 1980 तक एक तिहाई भूमि सिंचित हो चुकी थी़

इस लिहाज से करीब 40 वर्षों में मुश्किल से 17 प्रतिशत और भूमि को ही हम सींच पाये हैं, जो बेहद धीमी गति है़ हमारी सिंचाई अब ट्यूबवेल आधारित हो गयी है, इस कारण उन इलाकों का भूमिगत जलस्तर यानी ग्राउंड वाटर लेवल भी नीचे चला गया है, जो पहले जल संपन्न माना जाता था़ इससे यहां भी जल समस्या उत्पन्न हो गयी है़ इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण कभी चार-पांच दिन तक इतनी ज्यादा बारिश होती है कि बाढ़ आ जाती है

और फिर पांच-सात, 15 दिन तक पानी ही नहीं बरसता और सूखा हो जाता है़ एक्सट्रीम वेदर के कारण खेती काफी प्रभावित हो रही है़ जलवायु परिवर्तन के कारण इसमें अभी वृद्धि होगी़ इसलिए जल संरक्षण संरचना को बनाया और बचाया जाना बहुत जरूरी है़ आज जो भी तालाब या कुएं बचे हैं उन्हें पुनर्जीवित करने की जरूरत है़,

क्योंकि जब इन जल निकायों में बरसात का पानी जमा होगा, तो वह भूमिगत जल स्तर को रिचार्ज करेगा और उसका इस्तेमाल सिंचाई में भी हो सकेगा़ ये जल संरक्षण संरचना अत्यधिक वर्षा के कारण आनेवाली बाढ़ को भी रोकने में सहायक सिद्ध होंगे़ मनरेगा के तहत यह कार्य हो भी रहा है़

लेकिन इसकी गति और संख्या बढ़ाने की जरूरत है़ माइक्रो इरिगेशन की बहुत जरूरत है, लेकिन अभी पूरे भारतवर्ष के करीब 10 प्रतिशत क्षेत्र में ही यह पहुंच पाया है, जबकि हमारे देश में बहुत से ऐसे इलाके हैं जहां पानी की बहुत कमी है़ देशभर की सिंचाई की समस्या को दूर करने के लिए माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा देना होगा़

हमारे देश में करीब 86 प्रतिशत छोटे या सीमांत किसान हैं जिन्हें घर-परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए खेती के अलावा आमदनी के दूसरे स्रोतों पर भी निर्भर रहना पड़ता है़ ग्रामीण क्षेत्र में इस दूसरे स्रोत की कमी हो गयी है, इस कारण ये किसान बड़े शहरों की तरफ पलायन कर रहे है़ं अपनी जमीन की सही से देखभाल नहीं कर पा रहे है़ं एक तरह से गैरहाजिर भू-मालिकों की संख्या ज्यादा हो गयी है़

इस परेशानी को दूर करने के लिए हमारा लैंड रिकॉर्ड ठीक होना जरूरी है, क्योंकि इससे फिर हमारा लैंड मार्केट ठीक होगा़ खेती से संबद्ध और गैर-कृषि क्षेत्रों का गांव के आस-पास होना भी बहुत आवश्यक है़ संबद्ध क्षेत्रों जैसे पशु पालन में तो काफी काम हुआ है लेकिन मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, रेशमकीट पालन के क्षेत्र में अभी ज्यादा काम नहीं हुआ है,

जबकि इनमें काफी संभावनाएं है़ं तो इन क्षेत्रों को बढ़ावा देने की जरूरत है़ गांव के नजदीक के जो शहर हैं वहां भी नॉन-एग्रीकल्चर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से संबंधित चीजों की व्यवस्था करने की जरूरत है, जिससे किसानों को काम की तलाश में बहुत ज्यादा दूर नहीं जाना पड़े़

दूसरे, किसानों को तकनीकी माध्यम से किसानी की जानकारी देना आवश्यक है़ आजकल मोबाइल से यह हो रहा है, लेकिन अभी इसकी पहुंच ज्यादा नहीं है़ इसे सही तरीके से और ज्यादा विस्तार देना होगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान जुड़ सके़ं इसके लिए संबंधित इलाके के कृषि विश्वविद्यालय को काफी गंभीरता दिखानी होगी़

हालांकि, इन समस्याओं के समाधान के लिए सरकार संविदा खेती का नया कृषि कानून लेकर आयी है़ यह एक अच्छा कदम है़ बाजार से जुड़े दो कानून भी अभी सरकार लेकर आयी है़ इसमें निजी गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया है और एपीएमसी मार्केट की मोनोपॉली को खत्म की गयी है़ निजी लोगों के आने से निवेश ज्यादा होगा और किसानों को ज्यादा विकल्प भी उपलब्ध हो सकता है़ साथ ही, उत्पादों के रख-रखाव और प्रसंस्करण के लिए भी नये उपाय किये जा सकेंगे़

कृषि विकास के अलावा, कृषि में अच्छे लोगों का रहना बहुत जरूरी है़ गांव से लोगों का पलायन न हो इसके लिए इंफ्रॉस्ट्रक्चर पर ध्यान देना, उसे बेहतर बनाना बहुत जरूरी है़ मनरेगा के विस्तार से इसे अच्छा किया जा सकता है़ कृषि में बेहतरी के साथ-साथ ग्रामीण विकास भी बहुत जरूरी है़

ग्रामीण विकास नहीं होने से यहां शिक्षा, स्वास्थ्य समेत तमाम तरह की परेशानियां हैं, इस कारण लोग गांवों में रहना नहीं चाहते हैं. खासकर जो थोड़े से भी पढ़-लिखे हैं वे आस-पास के शहरों में पलायन कर जाते हैं. इस समस्याओं के निदान में कितना समय लगेगा, यह अलग-अलग जगह और वहां किस तरह की समस्या है, इस पर निर्भर करता है़ हां यह जरूर कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे इन समस्याओं का निदान होता जायेगा, संबंधित जगहों पर खेती और ग्रामीण विकास भी बेहतर होता जायेगा़

posted by : sameer oraon

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