चश्मा ही जिंदगी है

Updated at : 27 Mar 2017 6:58 AM (IST)
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चश्मा ही जिंदगी है

वीर विनोद छाबड़ा व्यंग्यकार बात जब चश्मे की उठती है, तो हम पिछली सदी के साठ की शुरुआत में पहुंच जाते हैं. चश्मा तब बहुधा सठियाये लोग ही लगाते थे. लेकिन हमने तो ग्यारह साल की उम्र में ही साठ वालों की बराबरी कर ली. हमने आईना देखा. एक धीर-गंभीर और बुद्धिजीवी आकृति के दर्शन […]

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वीर विनोद छाबड़ा
व्यंग्यकार
बात जब चश्मे की उठती है, तो हम पिछली सदी के साठ की शुरुआत में पहुंच जाते हैं. चश्मा तब बहुधा सठियाये लोग ही लगाते थे. लेकिन हमने तो ग्यारह साल की उम्र में ही साठ वालों की बराबरी कर ली. हमने आईना देखा. एक धीर-गंभीर और बुद्धिजीवी आकृति के दर्शन हुए. जरूर बड़ा होके बड़ा नाम करेगा. लेकिन जमाना- हाय-हाय! इत्ती सी उम्र और चश्मा लग गया. सलाहें मिलने लगीं. हरी सब्जियां खिला इसे. मां हमें डॉक्टर बनाना चाहती थी. एक दूर के मामा ने रूलिंग दे दी कि बदन की महीन नाड़ियां तो इसे दिखाई ही नहीं देंगी. ऑपरेशन गलत कर देगा यह तो. कईयों की जान चली जायेगी. बाबू बना इसे. बेचारी मां ने दिल के अरमां आसूओं में बहा दिये.बहरहाल, जैसे ही हमने चश्मा लगाया, एक नयी दुनिया दिखी. एक अरसे से ब्लैक बोर्ड पर धुंधली दिखती इबारत साफ-साफ दिखने लगी.
बड़े होकर इस अनुभव पर हमने एक कहानी भी लिखी थी. एक जहीन बच्चे को इसलिए कम नंबर मिले, क्योंकि उसे ब्लैकबोर्ड पर साफ दिखना बंद हो गया. बच्चे ने डर से मां-बाप को बताया नहीं. लेकिन शिक्षक समझ गये. उसके मां-बाप से बात की. वे विलाप करने लगे.
हाय! बेटा इतनी छोटी सी उम्र में चश्मुद्दीन कहलायेगा. शिक्षक ने उन्हें मना लिया. बच्चे को चश्मा लगा और वह फर्स्ट आने लगा. लेकिन कहानी का असलियत से क्या लेना-देना? हमें याद है जब हमने कम उम्र में चश्मा लगाया था, तो माता-पिता को कोई उलझन नहीं हुई. हां समाज और स्कूल में जरूर हाहाकार मच गया. अक्सर कमेंट्स सुनने को मिलते- अरे ओ, चश्मुद्दीन. सबसे खराब तब लगा जब एक शिक्षक ने हमें चश्मुद्दीन कहा. एक दिन शिक्षक ने एक गलती पर हमें कंटाप रसीद दिया. चश्मा टूट गया.
मैथ वाले शिक्षक पहले चश्मा उतरवाते थे और फिर पिटायी करते थे. दरअसल वह खुद भी चश्माधारी थे. हम क्रिकेट और कबड्डी के बहुत शौकीन थे. आये दिन चश्मे टूटा करते थे. मार पड़ती थी. कितनी बार चश्मा बनेगा तेरा. घर में टकसाल तो खुली नहीं है. नतीजा, एक दिन क्रिकेट-कबड्डी खेलने पर प्रतिबंध लग गया. जैसे-तैसे हम यूनिवर्सिटी पहुंच गये. तब तक हमारे चश्मे का शीशा बहुत मोटा हो चुका था, जिसमें से हमारी आंखें बहुत मोटी-मोटी दिखती थीं. चश्मा उतार लें तो हमें लड़का-लड़की में फर्क नजर नहीं आता था. उन्हीं दिनों एक लड़की से हमारी मित्रता हो गयी.
एक दिन हमने सुना कि उस लड़की से उसकी सहेली पूछ रही थी- क्यों री, आज तेरा चश्मुद्दीन नहीं दिखा. यूनिवर्सिटी छूटी तो वह लड़की भी कहीं गुम हो गयी. समय बढ़ता गया.
नौकरी लगी तो मां को बेटे के लिए छोकरी की फिक्र हुई. लेकिन हमारे चश्मे के मोटे-मोटे लेंस देख होनेवाला पहला ही ससुर डर गया. यह तो बहुत जल्दी अंधा हो जायेगा. करीब दर्जन बार हम ठुकरायेे गये. एक सज्जन के नौ बच्चे थे. छठीं नंबरवाली हमारे पल्ले पड़ी. हम पचास पार कर गये. एक दिन हमें महसूस हुआ कि हमें लगा कि दुनिया बस अंधेरी होने ही वाली है.
डॉक्टर ने बताया- अरे बुद्धू, दोनों आंख में मोतियाबिंद है. फौरन ऑपरेशन कराओ. ऑपरेशन के बाद तो एक नयी दुनिया को इंतजार करते पाया. सब कुछ बहुत साफ-सुथरा और चमकता हुआ. और वह भी बिना चश्मे के. लेकिन चश्मा फिर भी न छूटा. शुक्र है कि सिर्फ रीडिंग के लिए और वह भी बहुत कम पावर का. और हम ठहरे लिखने-पढ़नेवाले और ऊपर से भुलक्कड़. लिहाजा तीन सेट बनवाये. लेकिन, आजकल एक ही सेट है. एक चोरी गया और दूसरा बंदर उठा ले गये.
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