सहमति से समाधान
Updated at : 17 Feb 2016 6:00 AM (IST)
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संवाद के सहारे सहमति कायम कर किसी सार्वजनिक व्यवस्था को तय करना लोकतंत्र का मूल धर्म है. और संवाद पारस्परिकता तथा आपसी विश्वास की मांग करता है. इस लिहाज से संसद के बजट-सत्र से पहले विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक बुला कर उनसे सलाह-मशविरा करने की प्रधानमंत्री की पहल सराहनीय कही जायेगी. हालांकि यह […]
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संवाद के सहारे सहमति कायम कर किसी सार्वजनिक व्यवस्था को तय करना लोकतंत्र का मूल धर्म है. और संवाद पारस्परिकता तथा आपसी विश्वास की मांग करता है. इस लिहाज से संसद के बजट-सत्र से पहले विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक बुला कर उनसे सलाह-मशविरा करने की प्रधानमंत्री की पहल सराहनीय कही जायेगी. हालांकि यह देखना बाकी है कि विश्वास बहाली की पहल किस सीमा तक अपने उद्देश्यों में सफल हो पायेगी.
संसद का पिछला सत्र अगर गतिरोध का शिकार हुआ, विशेषकर राज्यसभा, तो उसकी एक वजह यह भी थी कि सत्र शुरू होने से पहले सरकार बहस-तलब मुद्दों पर विपक्षी पार्टियों को विश्वास में नहीं ले पायी थी. पारस्परिक विश्वास का यह घाटा सदन में बारंबार गतिरोध में तब्दील हुआ. अब आगामी बजट-सत्र से पहले विपक्षी नेताओं की बैठक में प्रधानमंत्री का यह कहना कि ‘विकास के मुद्दे को राजनीति से अलग रखा जाये’ खुद ही में एक बहसतलब बात है.
सामाजिक मोरचे पर अमन विकास की बुनियादी शर्तों में से एक है. सामाजिक सामंजस्य को सुनिश्चित करके ही विकासपरक मुद्दों के लिए बातचीत का वातावरण बनाया जा सकता है. दूसरे, बजट-सत्र से पूर्व आर्थिक मोर्चे पर स्थितियां सरकार की तरफ से कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण की मांग कर रही हैं. शेयर बाजार का सूचकांक गिर कर उस स्तर के आसपास पहुंच गया है, जहां करीब पौने दो साल पहले था, जब इस सरकार ने सत्ता संभाली थी. डॉलर की तुलना में रुपया लगातार खस्ताहाल बना हुआ है और 2014 की 4.7 फीसदी की औद्योगिक विकास-दर बीते दिसंबर में बहुत नीचे चली गयी.
सकल घरेलू उत्पाद के बारे में सरकार ने दावा आठ फीसदी का किया था, पर बदले हालात में उसे घटा कर सात से साढ़े सात फीसदी कर दिया गया है. सरकारी बैंकों के भारी-भरकम घाटे और कॉरपोरेट तथा प्रत्यक्ष कर से होनेवाली कमाई में कमी का समाचार बनना भी बजट-सत्र से पहले सरकार के लिए फांस की तरह है. एक बड़ा सवाल महंगाई का भी है. सरकार का पक्ष है कि खुदरा महंगाई दर करीब पौने छह फीसदी है, जबकि साल भर के भीतर दालें ही नहीं, स्कूल फीस से लेकर मकान-भाड़ा और आवागमन तक काफी महंगा हुआ है.
दूसरी ओर सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर अमल को लेकर सरकार विशेष उत्साह में नहीं दिख रही. उम्मीद की जानी चाहिए कि विपक्षी पार्टियों को विश्वास में लेने से संसद में इन मुद्दों पर सार्थक चर्चा हो सकेगी और सरकार बेहतर समाधान की दिशा में बढ़ेगी.
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