अंतहीन जीवनकथा

Updated at : 15 Jan 2016 4:09 AM (IST)
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अंतहीन जीवनकथा

जीवन का अंत होता है, जीवन की कथा का अंत नहीं होता. और, अगर कोई जीवनकथा राष्ट्रीय गौरव के विशेष क्षण से जुड़ी हुई हो, तो कृतज्ञ राष्ट्र उस कथा को हमेशा के लिए अमिट बना देता है. आखिर गौरव के क्षणों के भीतर ही तो किसी राष्ट्र के भावी जीवन के संकल्पों का स्फुरण […]

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जीवन का अंत होता है, जीवन की कथा का अंत नहीं होता. और, अगर कोई जीवनकथा राष्ट्रीय गौरव के विशेष क्षण से जुड़ी हुई हो, तो कृतज्ञ राष्ट्र उस कथा को हमेशा के लिए अमिट बना देता है. आखिर गौरव के क्षणों के भीतर ही तो किसी राष्ट्र के भावी जीवन के संकल्पों का स्फुरण होता है.
बांग्लादेश का मुक्ति-संग्राम भारतीय राष्ट्रीय जीवन के लिए ऐसा ही गौरव का क्षण रहा है. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि गौरव का यह क्षण भारत को जनरल जेएफआर जैकब की अगुवाई में हासिल हुआ और ठीक इसी कारण भारत की कथा के साथ उनकी जीवनकथा भी हमेशा के लिए अमिट हो चली है. बांग्लादेश बनने के साथ दक्षिण एशिया के भीतर इस सत्य की गरजदार घोषणा हुई कि राष्ट्रीयताओं का आधार सिर्फ धर्म भर नहीं होता.
बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के साथ यह बात साबित हो गयी कि धर्म-आधारित राष्ट्रीयता का नारा बुलंद करके भारतीय उपमहाद्वीप के भीतर पाकिस्तान नाम का राष्ट्र बनाना जन-मानस की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति कम और किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा या धार्मिक उन्माद पर आधारित मुहिम की जिद का नतीजा ज्यादा थी. बांग्लादेश बनने के बाद भारत सगर्व कह सका कि स्वतंत्रता का भारतीय संग्राम ही अपने समावेशी चरित्र के कारण बहुलतावादी समाज की संभावनाओं को एक और अखंड बना कर धारण करता है, धर्म आधारित राष्ट्रीयताओं के उद्घोष में यह दम नहीं है.
बांग्लादेश ने अपनी मुक्ति भारतीय सेना की सरपरस्ती में हासिल की. पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों के साथ पाक सेना के जनरल नियाजी को भारत के आगे आत्मसमर्पण करना पड़ा. इस जीत के अगुआ बने भारतीय इस्टर्न कमांड के चीफ ऑफ स्टॉफ जेएफआर जैकब. इसे जनरल जैकब के पराक्रम, साहस और सूझ-बूझ की मिसाल ही कही जायेगी कि ढाका में तकरीबन तीन हजार की संख्या में भारतीय सेना के मुकाबले 26 हजार पाकिस्तानी सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद जनरल नियाजी को बिना शर्त आत्मसमर्पण के लिए राजी होना पड़ा.
दूसरे विश्वयुद्ध समेत देश और विदेश में युद्ध के कई मैदानों में मोर्चा संभालनेवाले जनरल जैकब सेना से अवकाश प्राप्ति के बाद गोवा और पंजाब के राज्यपाल रहे और सैन्य मामलों में उन्होंने सलाहकार की भी भूमिका निभायी. अपनी इस भूमिका में भी जनरल जैकब भारत और इजरायल के बीच नये सिरे से मैत्रीपूर्ण संबंध कायम करने के मामले में महत्वपूर्ण साबित हुए. कृतज्ञ राष्ट्र उनकी सेवा, शौर्य और कर्तव्य-भावना को हमेशा याद रखेगा और प्रेरणा लेता रहेगा.
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