एक दूरगामी फैसला

Published at :20 Aug 2015 4:07 AM (IST)
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एक दूरगामी फैसला

देश की सबसे गरीब एवं वंचित आबादी के मुंह से यह बात शिकायत के रूप में निकलती थी कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सेहत आदि की जैसी व्यवस्था सरकार ने हमारे लिए की है, वैसा ही सरकारी ओहदे पर बैठे लोगों के लिए भी हो, तो मानें कि इस देश में बराबरी का लोकतंत्र […]

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देश की सबसे गरीब एवं वंचित आबादी के मुंह से यह बात शिकायत के रूप में निकलती थी कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सेहत आदि की जैसी व्यवस्था सरकार ने हमारे लिए की है, वैसा ही सरकारी ओहदे पर बैठे लोगों के लिए भी हो, तो मानें कि इस देश में बराबरी का लोकतंत्र है.

सुखद संयोग कहिए कि इस शिकायत को अब इलाहाबाद हाइकोर्ट ने फैसले के रूप में सुनाया है. हाइकोर्ट का आदेश है कि सरकारी नौकरी कर रहे लोग, निर्वाचित जन- प्रतिनिधि और वे सभी व्यक्ति जो किसी न किसी रूप में सरकारी खजाने से वेतन पाते हैं, अपने बच्चों को सरकारी प्राथमिक स्कूलों में भेजें. कोर्ट का फैसला पहली नजर में आश्चर्यजनक लगेगा, क्योंकि ऐसी शिकायतों पर अदालतें सरकार को फटकार लगा कर गलती सुधारने के आदेश देती रही हैं.

पर इलाहाबाद हाइकोर्ट ने यूपी के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में सहायक शिक्षकों की भर्ती में गड़बड़ियों की शिकायत वाली याचिका पर यूपी सरकार को सिर्फ फटकार लगा कर नहीं बख्शा, बल्कि मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि अगले छह महीने में वे कोर्ट के फैसले को लागू करने का इंतजाम करें. यह भी कहा गया है कि जो सरकारी ओहदेदार फैसले का पालन नहीं करते, उनसे दंड वसूला जाये, उनकी वेतनवृद्धि तथा प्रोन्नति पर रोक लगे.

इस फैसले का तात्कालिक संदर्भ भले ही शिक्षकों की नियुक्ति की वह बेतुकी प्रक्रिया हो, जो अकसर अदालत में चुनौती का सबब बनती है, पर इसका एक दूरगामी पक्ष भी है.

उदारीकरण के बाद से शिक्षा के बाजारीकरण की लहर के बीच सरकारों ने 12वीं तक की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लचर बना दिया है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी स्कूलों में गंवई इलाकों के 56 और शहरी इलाकों में 77 प्रतिशत विद्यार्थी समाज के सबसे गरीब तबके के हैं. ‘असर’ रिपोर्ट की मानें, तो सरकारी स्कूलों के पांचवीं के ज्यादातर विद्यार्थी दूसरी कक्षा की पाठ्यपुस्तक भी ठीक-ठीक पढ़-समझ नहीं पाते. यह रोग गहरा है और संकेत करता है कि सरकारी तथा निजी स्कूलों की समानांतर व्यवस्था के जरिये समाज में दो तरह के नागरिक तैयार किये जा रहे हैं

कोर्ट के कड़े फैसले ने इस भेदभाव से आगाह किया है. अच्छा होगा कि इस फैसले को एक प्रस्थान बिंदु मान कर सरकारें फिर से उन दिनों की वापसी की सोचें, जब हर अंचल में एक-दो ऐसे सरकारी स्कूल जरूर होते थे, जहां राजा और रंक दोनों के बच्चे को एक-सी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती थी.

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