भारतीय साहित्य का अंतरराष्ट्रीयकरण

Published at :10 Feb 2015 5:50 AM (IST)
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भारतीय साहित्य का अंतरराष्ट्रीयकरण

आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार ‘मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया’ का लक्ष्य भारत की पिछली दो शताब्दियों के महानतम साहित्य के धरोहर को दुनिया के सबसे बड़े पाठक वर्ग और नयी पीढ़ी तक पहुंचाना है. मैं उम्मीद करता हूं कि यह लाइब्रेरी एक समय के बाद दुनिया को आकर्षित करेगी. लोएब क्लासिकल लाइब्रेरी में मेरी पसंदीदा […]

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आकार पटेल
वरिष्ठ पत्रकार
‘मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया’ का लक्ष्य भारत की पिछली दो शताब्दियों के महानतम साहित्य के धरोहर को दुनिया के सबसे बड़े पाठक वर्ग और नयी पीढ़ी तक पहुंचाना है. मैं उम्मीद करता हूं कि यह लाइब्रेरी एक समय के बाद दुनिया को आकर्षित करेगी.
लोएब क्लासिकल लाइब्रेरी में मेरी पसंदीदा किताबों की एक श्रृंखला है, जिसे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने छापा है. इसमें पुराने ग्रीक और लैटिन पाठ्यों का अनुवाद है. ये किताबें कई मायनों में अनूठी हैं. इसका पहला कारण तो इन किताबों का आकार है. उनको ऐसा बनाया गया है कि वे किसी भी भले मानुष की जेब में आ सकती हैं. ये सभी छह सही 3/8 इंच लंबी तथा चार सही 1/4 इंच चौड़ी हैं.
यह पैमाना इनको बेहद छोटा बनाता है. ये मेरी लाइब्रेरी की लगभग 6,000 किताबों में सबसे छोटी हैं. कोई भी किताब मोटी नहीं है, क्योंकि अकसर ये किताबें कई खंडों में निकाली गयी हैं. इसी वजह से यूरीपीडस के तीन नाटक एक खंड में संकलित किये जा सकते हैं, जबकि हेरोडोट्स द्वारा लिखा पर्शियन युद्ध का इतिहास चार खंडों में होगा.
लोएब किताबें वे हैं, जिन्हें 19वीं सदी के दूसरे हिस्से तक एक सभ्य यूरोपीय द्वारा पढ़े जाने की अपेक्षा रहती थी. प्लेटो, अरस्तू, हिप्पोक्रेट्स और प्लूटार्क के काम या पोलिबियस द्वारा हनिबल की जीत का वर्णन और अरिन का सिकंदर की जीत का वर्णन, इलियड और सभी महान दुखांतवादियों की रचनाएं ग्रीक के खाते में थीं. लैटिन के पास सिसरो, सेनेका और सीजर (इतिहास के कुछ महानतम रचनाकारों में शुमार) थे. व्यंग्य में लूसियन और इतिहास में लिव और सुएटोनियस थे. यह एक ऐसी सूची है, जो होमर से शुरू होती है, जो ईसा पूर्व आठवीं सदी तक कायम रही, जिसके बाद रोमन आये.
इन किताबों के अनूठेपन की दूसरी वजह यह है कि इनमें मूल ग्रीक या लैटिन पाठ बायीं तरफ के पृष्ठ पर दिया गया है और दायीं पर उसका अंगरेजी अनुवाद है. हममें से जो भी इन भाषाओं की थोड़ी समझ रखते हैं, उनके लिए यह शानदार उपहार है.
लेखिका वर्जीनिया वुल्फ ने 1917 में इस श्रृंखला में लिखा था, ‘लोएब लाइब्रेरी, जो एक तरफ ग्रीक या लैटिन और दूसरी तरफ अंगरेजी अनुवाद देती है, आजादी का आनंद देती है.. इसके अस्तित्व को लाइब्रेरी ने प्रकाशनों के जरिये पहचान दी और काफी हद तक आदरणीय बनाया. ग्रीक की कठिनाई पर गहरा काम नहीं हुआ है, शायद इसलिए, क्योंकि इस खतरनाक पानी में उतरने का हमें जो आकर्षण देते हैं, वे सामान्य तौर पर विद्वान हैं, जो भूल चुके हैं कि वे कठिनाइयां क्या हैं.
हालांकि साधारण शौकीनों के लिए वे बेहद सत्य और बड़ी हैं.. इसीलिए हमें इस तथ्य कोपहचानने के लिए खासी मेहनत करनी चाहिए और सोच लेना चाहिए कि हम कभी अपने लोएब से अलग नहीं होंगे.’
सभी खंड मोटी जिल्द में हैं और रंगों के माध्यम से अलग हैं. ग्रीक का रंग हरा है और लैटिन को लाल में छापा गया है. तीसरी चीज जो इनको खास बनाती है, वह यह है कि इनके प्रकाशन के लिए कोष दान से जुटाया गया है.
इन पहली किताबों में ‘ए वर्ड अबाउट इट्स परपस एंड स्कोप’ भी शामिल है, जिसमें जेम्स लोएब ने लोएब क्लासिकल लाइब्रेरी के दर्शन और लक्ष्य को समझाया है. वह कहते हैं, ‘प्रचीन यूनान और रोम के महान लेखकों के दर्शन और हास्य को समझने के लिए, उनके सौंदर्य और ज्ञान को एक बार फिर पहुंच में लाने के लिए अनुवाद के माध्यम का सहारा लिया जा रहा है, जो कि खुद में ही साहित्य हैं.
एक ऐसी चीज जो केवल आनंद के लिए पढ़ी जायें, न कि बोझिल कथनों का संग्रह मात्र हो, जो अपने हरेक वाक्य में उम्दा मूल लेखन की झांकी दे, जिससे सामान्य पाठक दूर रह जाता है. इसीलिए अनुवाद के साथ ही साथ मूल पाठ को भी देने का लक्ष्य मैंने रखा है.’
मैं इसे अभी इसलिए बता रहा हूं, क्योंकि भारत में भी ऐसी ही एक पुस्तक श्रृंखला आ रही है, जो लोएब जैसी ही मूल्यवान होगी. यह है ‘मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया’ और इसे भी विश्व प्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस छाप रहा है.
सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की जानी-मानी कंपनी इन्फोसिस के संस्थापक, अरबपति नारायण मूर्ति के बेटे रोहन मूर्ति इसे आर्थिक मदद दे रहे हैं. इस लाइब्रेरी का लक्ष्य भारत की पिछली दो शताब्दियों के महानतम साहित्य के धरोहर को दुनिया के सबसे बड़े पाठक वर्ग और नयी पीढ़ी तक पहुंचाना है.
नारायण मूर्ति के साथ-साथ इन्फोसिस के ही अरबपति नंदन नीलेकणी और विप्रो के अजीम प्रेमजी भी दान देने के मामले में और सामाजिक कामों में लगे भारतीय अरबपतियों में काफी आगे रहे हैं.
हालांकि वे भारत के उन धनकुबेरों में अपवाद की तरह हैं, जिनके लिए दान का मतलब ज्यादा-से-ज्यादा मंदिर या खर्चीले अस्पताल बना देना है. दशकों तक केवल टाटा ही ऐसे थे, जिनकी होल्डिंग कंपनी टाटा संस के दो-तिहाई हिस्से पर चैरिटेबल ट्रस्ट का हक था, जो कमाई का अधिकतर हिस्सा सामाजिक कामों में लगा रहे हैं. इसीलिए यह प्रोत्साहित करनेवाली बात है कि नारायण मूर्ति के बेटे ने भी इस दिशा में एक नयी सोच के साथ कदम बढ़ाया है.
मूर्ति क्लासिकल सीरीज के पहले पांच खंडों, जो पिछले महीने प्रकाशित हुए हैं, में बुल्ले शाह के सूफी गीत, अबुल फजल का लिखा अकबर का इतिहास- खंड-1, थेरीगाथा : पहली बौद्ध महिलाओं के गीत, तेलुगू की शास्त्रीय किताब मनु की कहानी और अंधे कवि सूरदास के गीतों का संग्रह है. रोहन मूर्ति कहते हैं, नयी जेनरेशन को भारत के लाजवाब लिटरेचर से मिलवाने के लिए यह शुरुआत की गयी है.
इसके बाद रामचरितमानस, गालिब की शायरी जैसे कई क्लासिक्स भी इस लाइब्रेरी का हिस्सा बनेंगी. इसके तहत हर साल पांच नयी पुस्तकें छपेंगी और पांच सौ पुस्तकों की यह पूरी योजना वर्ष 2115 तक पूरी होगी. मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी की किताबों का आंकड़ा लोएब से बड़ा होगा, पर उसका प्रारूप वही है- मूल के साथ-साथ अनुवाद देना. भारत में संस्कृत, पाली, तेलगू, मराठी, सिंधी, तमिल, हिंदी जैसी कई भाषाओं में ज्ञान का खजाना है, जिसे दुनिया के सामने लाना इस लाइब्रेरी का मकसद है.
इस सीरीज के संपादक शेल्डॉन पॉलोक, जो संस्कृत के मेधावी छात्र रहे हैं, का मानना है कि भारत का दुनिया में बहुभाषीय इतिहास रहा है. इनमें से कई भाषाएं उपलब्ध भी नहीं है. उनका प्रयास होगा संभावित बेहतर ढंग से इन्हें उपलब्ध कराना.
ये पुस्तकें बांग्ला, हिंदी, कन्नड़, मराठी, पाली, पंजाबी, पारसी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगू और ऊदरू में उपलब्ध होंगी. फिलहाल केवल पहली पांच किताबों की विविधता को देखते हुए मैं उम्मीद करता हूं कि मूर्ति लाइब्रेरी भी पूरी दुनिया को आकर्षित करेगी.
(अनुवाद : व्यालोक)
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