बच्चों को लिखना-पढ़ना नहीं आया

Published at :16 Jan 2015 6:01 AM (IST)
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बच्चों को लिखना-पढ़ना नहीं आया

योगेंद्र यादव नेता, आम आदमी पार्टी राष्ट्र-निर्माण के नाम पर स्कूलों में भवन निर्माण होता गया. शिक्षण के नाम पर शिक्षकों की नौकरी लगती गयी. शिक्षा में विकास के नाम पर बच्चों का दाखिला बढ़ता गया. बस एक कसर रह गयी कि बच्चों को पढ़ना-लिखना नहीं आया. पिछले महीने वंचित तबके के बच्चों के बीच […]

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योगेंद्र यादव
नेता, आम आदमी पार्टी
राष्ट्र-निर्माण के नाम पर स्कूलों में भवन निर्माण होता गया. शिक्षण के नाम पर शिक्षकों की नौकरी लगती गयी. शिक्षा में विकास के नाम पर बच्चों का दाखिला बढ़ता गया. बस एक कसर रह गयी कि बच्चों को पढ़ना-लिखना नहीं आया.
पिछले महीने वंचित तबके के बच्चों के बीच काम करनेवाले एक संगठन ने न्योता भेजा कि आपको शिक्षा के मुद्दे पर आयोजित हमारे एक संवाद में बोलना है. बीजेपी और कांग्रेस के प्रतिनिधि भी आमंत्रित थे.
विषय था- ‘2030 में शिक्षा का भविष्य’. संचालन की भूमिका एक जाने-पहचाने टीवी एंकर ने संभाल रखी थी. शुरुआत ही में एंकर ने हम तीनों में झगड़ा करवाने की कोशिश की. मैंने इस खेल में शामिल होने की अनिच्छा दिखायी, तो उन्हें निराशा हुई. मगर उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी. बीजेपी के नलिन कोहली बिल्कुल उखड़ गये. उनका गुस्सा बेवजह नहीं था. शिक्षा की स्थिति पर एक गंभीर संवाद महज एक टेलीविजनी तू-तू, मैं-मैं बन कर रह गया था.
यह वाकया एक मिसाल भर है. आज देश में शिक्षा के लिए अभूतपूर्व भूख है. पढ़े-लिखे बाबू से लेकर अनपढ़ मजदूर तक, हर कोई चाहता है कि उसका बच्चा पढ़-लिख जाये. जिन्हें इस समाज ने सदियों तक विद्या से वंचित रखा, वे सोचते हैं कि शिक्षा मिल गयी, तो न जाने उनके बच्चे कहां पहुंच जायेंगे. निश्चित ही हमारे समाज में शिक्षा के प्रति आग्रह बढ़ता जा रहा है.
गांव और शहर दोनों जगह मां-बाप पेट काट कर बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं. यही वजह है कि पिछले पांच साल में गांवों में प्राइवेट स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चों की संख्या 18 से 31 प्रतिशत हो गयी है. मां सुबह-सुबह बच्चे को तैयार कर स्कूल भेज तो देती है, लेकिन वह स्कूल में सीखता क्या है, इसकी किसी को परवाह नहीं है. जो मां-बाप खुद किताब लेकर बच्चों के साथ नहीं बैठ सकते या ट्यूशन नहीं लगवा सकते, उनके बच्चों को देखनेवाला कोई नहीं है.
हर साल ‘असर’ रपट पढ़ कर शिक्षा की दशा-दिशा के बारे में इसी सोच की पुष्टि होती है. ‘असर’ यानी गांव के स्कूलों में शिक्षा की हालत पर एक सालाना रपट. यह रपट बताती है कि ग्रामीण स्कूलों में इमारत से लेकर लाइब्रेरी तक की क्या-क्या सुविधाएं हैं और वहां पढ़नेवाले बच्चों को क्या कुछ आता है. पिछले कुछ वर्षो से यह रपट कमोबेश एक-सी तसवीर पेश कर रही है. एक ओर स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं बढ़ रहीं हैं, लेकिन दूसरी ओर शिक्षा की गुणवत्ता का संकट गहराता जा रहा है.
पांच साल पहले शिक्षा का अधिकार (आरटीइ) लागू होने के बाद से ग्रामीण स्कूलों की काया में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन अभी बहुत कुछ सुधरना बाकी है. ‘असर’ की नवीनतम रपट 13 जनवरी, 2015 को दिल्ली में जारी हुई. इसके मुताबिक पिछले साल के तथ्य बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र के लगभग 24.4 प्रतिशत स्कूलों में पानी की सुविधा नहीं है, 34.8 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में शौचालय नहीं है या उपयोग लायक नहीं है. लगभग 21.9 प्रतिशत स्कूलों में लाइब्रेरी नहीं है.
2014 में आरटीइ में वर्णित शिक्षक-छात्र अनुपात का पालन करनेवाले सरकारी स्कूलों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में 49.3 प्रतिशत तक पहुंच पायी है.
स्कूलों की काया तो सुधरी है, मगर आत्मा नहीं. पिछले साल की ‘असर’ रिपोर्ट के मुताबिक तीसरी कक्षा में पढ़नेवाले विद्यार्थियों में केवल 25 प्रतिशत ही इस काबिल थे कि दूसरी कक्षा की किताब पढ़ सकें. पांचवीं कक्षा में पढ़नेवाले केवल 50 प्रतिशत विद्यार्थी इस काबिल बन पाये हैं कि दूसरी कक्षा की किताब को पढ़-समझ सकें. चौंकानेवाली एक बात यह भी है कि 2009 की तुलना में स्थिति और भी खराब हो रही है. 2009 में कक्षा दो के 11.2 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे, जो 9 तक की संख्या को समझ नहीं पाते थे. 2014 में यह बढ़ कर 19.5 प्रतिशत हो चुका है.
यह स्थिति किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं है, लेकिन ऐसी खबरें अखबारों की सुर्खियां नहीं बनतीं. टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनती, चूंकि इस आपदा के शिकार मध्यम-वर्गीय लोग नहीं हैं.
आपदा सर पर सवार है और सरकारें या तो बेखबर हैं. मां-बाप को लगता है कि परीक्षा खत्म होने की वजह से पढ़ाई का स्तर गिर रहा है. सरकार को भी यह काम आसान लगता है. स्कूलों में योग्य अध्यापकों की नियुक्ति करना और उनसे काम लेना मुश्किल है. परीक्षाएं दोबारा शुरू कर देना आसान है.
इसलिए राजस्थान सरकार ने कक्षा पांच और आठ में बोर्ड की परीक्षा शुरू करने का फैसला कर लिया है. आरटीइ को 2009 में गाजे-बाजे के साथ शुरू किया गया था. इससे बहुत उम्मीदें बंधी थीं. आज यह कानून लगभग फेल हो गया है. सरकारी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के सपने को दफनाने की तैयारी चल रही है.
हर साल की तरह इस साल भी ‘असर’ देश और सरकारों पर बिलकुल बे-असर रहा. राष्ट्र-निर्माण के नाम पर स्कूलों में (घटिया) भवन निर्माण होता गया. शिक्षण के नाम पर शिक्षकों की (कच्ची) नौकरी लगती गयी. शिक्षा में विकास के नाम पर (कागज में) बच्चों का दाखिला बढ़ता गया. बस हर बरस की तरह इस बार भी एक कसर रह गयी- बच्चों को पढ़ना-लिखना, गुणा-भाग नहीं आया.
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