नरेंद्र मोदी के इरादों की अभिव्यक्ति

By Prabhat Khabar Digital Desk
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क्या 3500 वर्ष पुरानी सभ्यता में बदलाव की कल्पना नरेंद्र मोदी इस प्रकार करते हैं? ऊपर से नीचे की ओर और राजनीतिकों द्वारा? इस पर कुछ गंभीर चिंतन की जरूरत है, जो मोदी के भाषण में नहीं थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में एक बार फिर यह साबित किया कि वे एक जबर्दस्त वक्ता हैं. उनमें अपने औपचारिक भाषणों में, खास कर गुजराती और हिंदी में, बातचीत की शैली और रोजमर्रा की भाषा के इस्तेमाल की क्षमता है. राष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय से सक्रिय नेताओं से वे कहीं बेहतर संवाद-संचारक हैं, जो स्पष्ट और सरल भाषा बोलते हैं. वे उस क्षमता में कुशल हैं, जिसे प्राचीन यूनान और रोम में वाक्पटुता यानी कायल कर देनेवाले भाषण की कला के रूप में जानते थे.

बहरहाल, लाल किले की प्रचीर से उनके संदेश का मूल तत्व क्या है? मेरे विचार में मोदी के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे चुनाव अभियान की भाषा से अलग दिखे. जब वे लोगों से वोट मांग रहे थे, तो उन्होंने भारतीयों को यह बताया था कि उनकी सारी समस्याओं की जड़ में सरकार है और राजनीतिक दलों में बदलाव मात्र से भारत में परिवर्तन हो जायेगा. उन्होंने हमें बताया था कि वे सत्ता में आकर सभी बड़ी समस्याओं का समाधान कर देंगे, क्योंकि इसके लिए एक आदमी- जो कि वे खुद हैं- की प्रतिभा और कड़ी मेहनत की आवश्यकता है.

मेरे विचार में मोदी ने बिल्कुल ठीक कहा कि भारत की अधिकतर बड़ी समस्याओं के कारण सरकार में नहीं, बल्कि समाज में हैं. उन्होंने कुछ उदाहरण दिये, जैसे- स्त्री भ्रूण हत्या, जो देश के कई हिस्सों, विशेषकर हरियाणा और गुजरात में, बहुत अधिक है और स्वच्छता, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि हम भारतीयों को हमारी गंदगी पर शर्मिंदा होना चाहिए. मोदी ने यह भी माना कि ये कुछ काम सरकार की क्षमता से बाहर हैं. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘ये सरकार से होता नहीं है’. तीसरी बात उन्होंने भारत में हो रही बलात्कार की घटनाओं के बारे में कही. मोदी ने कहा कि जो परिवार अपनी बेटियों के आने-जाने को नियंत्रित करने पर जोर देते हैं, उन्हें अपने बेटों की हरकतों पर भी नजर रखनी चाहिए. वे इस समस्या को इस तरह से उचित ही देख रहे हैं. वे कोई चेहराविहीन गुण्डे नहीं होते हैं, जो अपराध करते हैं, बल्कि हमारे ही समाज के सदस्य और परिवार का हिस्सा होते हैं.

दुर्भाग्य से, समस्या को इस तरह से देखने और उसकी जड़ को ठीक से समझने के बाद नरेंद्र मोदी इसके उपचार की बात कहते हुए भटक गये. उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत को बदलने का तरीका यह है कि संसद के सदस्य अपने क्षेत्र में हर वर्ष एक आदर्श ग्राम का विकास करें. ये आदर्श गांव फिर आस-पड़ोस के गांवों के लिए प्रोत्साहन बन जायेंगे और फिर पूरा ग्रामीण भारत जादुई ढंग से स्वयं को बदल देगा. मेरी राय में यह मूर्खतापूर्ण और बेमानी बात है.

हमने इस तरह के बहुत-से प्रयोग किये हैं. महाराष्ट्र में रालेगन-सिद्धि एक आदर्श ग्राम माना जाता है, जिसे अन्ना हजारे ने एक वर्ष नहीं, बल्कि दशकों तक संवारा है. यह गांव हरा-भरा, समृद्ध और पवित्र दिखता है. लेकिन, इस पूर्णता को प्राप्त करने में इस गांव ने शराब को प्रतिबंधित कर दिया है और जो लोग शराब पीते पकड़े जाते हैं, उन्हें खंभे से बांध कर पीटा जाता है. अगर मान भी लिया जाये कि यह एक तरह से पूर्ण ग्राम बन गया है, जिस पर मुङो संदेह है, रालेगान-सिद्धि के बदलाव ने अपने आसपास के गांवों को प्रभावित नहीं किया है.

इसमें दूसरी बात अधिक महत्वपूर्ण है. क्या 3500 वर्ष पुरानी सभ्यता में बदलाव की कल्पना मोदी इस प्रकार करते हैं? ऊपर से नीचे की ओर और राजनीतिकों द्वारा? दुनिया के सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक भारत के इस तरह होने का कारण है और मैं नहीं समझता कि यह उसके संसदीय राजनेताओं के कारण है. इस पर कुछ गंभीर चिंतन की जरूरत है, जो मोदी के भाषण में नहीं थी. कुछ अन्य मसलों पर मोदी के भाषण में कुछ लापरवाहियां थीं.

सरकारी ढांचे में बड़े फेरबदल न करने के लिए मोदी की आलोचना होती रही है और आलोचकों में वे अर्थशास्त्री भी शामिल हैं, जिन्होंने उन्हें समर्थन दिया था. अपना पहला बड़ा ऐतिहासिक फैसला करते हुए मोदी ने योजना आयोग की जगह नयी संस्था स्थापित करने की घोषणा की. यह एक ताजा सोच है. लेकिन हमें यह देखने के लिए इंतजार करना होगा कि नयी संस्था, चाहे उसका नाम जो भी रखा जाये, का काम योजना आयोग से किस तरह अलग होगा. बड़े बदलाव के पक्षधरों को आशंका है कि सिर्फ नाम में ही बदलाव होगा. कुछ ऐसा ही मंत्री समूह को लेकर हुआ है, जिसे आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया गया है, लेकिन गंगा सफाई पर एक समूह बिना मंत्री समूह नाम के काम कर रहा है. अन्य बड़ी साहसी घोषणा लोगों को निर्माण के लिए आह्वान थी. उन्होंने गुजरात में निर्माण को बढ़ावा दिया था, हालांकि देश के स्तर यह करना चुनौतीपूर्ण होगा.

उन्होंने इशारों में पश्चिमी एशिया में इसलामिक स्टेट के लिए लड़ रहे भारतीयों की चर्चा की. मीडिया की खबरों के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या तकरीबन दस है. मुङो समझ में नहीं आता कि क्या यह इतना महत्वपूर्ण मामला था, जिसे उन्हें इस भाषण में उठाने की जरूरत थी?

नरेंद्र मोदी ने भारत के पड़ोसियों की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा कि हमें गरीबी निवारण पर ध्यान देना चाहिए. यह स्वागतयोग्य और अच्छी बात है, लेकिन यह समस्या को लेकर समुचित प्रतिक्रिया नहीं है. पाकिस्तान भी इस बात को स्वीकार करता है कि दक्षिण एशिया की बड़ी समस्या गरीबी है. हालांकि उसके नेता यह भी कहते हैं कि दक्षिण एशिया की गरीबी का कारण भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव है. अगर यह तनाव समाप्त हो जाये तो दोनों देश रक्षा पर अपने खर्च में कटौती कर सकते हैं और अपना ध्यान विकास पर केंद्रित कर सकते हैं. ऐसे में मोदी का कथन हमें कहीं आगे नहीं ले जाता है.

लेकिन, कुल मिलाकर यह एक अच्छा भाषण था और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कई बातों में नरेंद्र मोदी का इरादा नेक है. जैसा कि मैंने पहले कहा है, वे सही ही यह स्वीकार कर रहे हैं कि सभी समस्याएं सरकार की गलती का नतीजा नहीं हैं. मैं यही उम्मीद कर रहा हूं कि यह यथार्थवाद कुछ समाधानों में भी परिलक्षित हो. अंधेरे से निकाल कर उजाले की ओर ले जाने के लिए भारत को किसी मसीहा की आवश्यकता नहीं है. इस देश को कुछ ठोस आंतरिक बदलाव और समाज सुधार की जरूरत है, और इसमें बहुत कुछ करने की जिम्मेवारी केवल सरकार के ऊपर नहीं छोड़ी जा सकती है.

आकार पटेल

वरिष्ठ पत्रकार

aakar.patel@me.com

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