जेएनयू और रोमिला थापर

Updated at : 09 Sep 2019 4:40 AM (IST)
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जेएनयू और रोमिला थापर

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की स्थापना संसद एक अधिनियम द्वारा 1966 में हुई थी. अपनी स्थापना के तीन वर्ष बाद 22 अप्रैल, 1969 को यह अपने अस्तित्व में आया. अपने स्वर्णजयंती वर्ष में अपने यहां 49 वर्ष से सेवा दे रही विश्व प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार रोमिला थापर (30 नवंबर, 1931) से […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की स्थापना संसद एक अधिनियम द्वारा 1966 में हुई थी. अपनी स्थापना के तीन वर्ष बाद 22 अप्रैल, 1969 को यह अपने अस्तित्व में आया. अपने स्वर्णजयंती वर्ष में अपने यहां 49 वर्ष से सेवा दे रही विश्व प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार रोमिला थापर (30 नवंबर, 1931) से इसने सीवी की मांग की है. जेएनयू के रजिस्ट्रार ने 12 एमेरिटस प्रोफेसरों से अपनी सीवी जमा करने को कहा था, जिनमें रोमिला थापर सर्वप्रमुख हैं.
कहा गया था कि जेएनयू एक समिति का गठन कर रोमिला थापर के कार्यों का आकलन करेगा. वर्तमान कुलपति की नियुक्ति (जनवरी 2016) के बाद जिस प्रकार जेएनयू का दुष्प्रचार किया गया, उसकी निंदा की गयी है. वर्तमान कुलपति के कार्यकाल में ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति के इस विश्वविद्यालय को ‘देशद्रोही गतिविधियों का केंद्र’, ‘घातक राजनीति का अड्डा’, ‘नक्सली समर्थक’ आदि कहा गया. संघ की पत्रिका ‘पांचजन्य’ में इसे ‘दरार का गढ़’ कहा गया.
रोमिला थापर के अनुभव और अकादमिक कार्यों-रिकॉर्डों का मूल्यांकन कौन करेगा? साल 1958 में लंदन विवि के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज से थापर ने एएल बाशम (द वंडर दैट वाज इंडिया) के निर्देशन में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. बाशम आरएस शर्मा और वीएस पाठक के भी शिक्षक थे. रोमिला थापर ने 1961-62 में कुरुक्षेत्र विवि और 1963-70 तक दिल्ली विवि में प्राचीन इतिहास का अध्यापन किया. उनका अकादमिक योगदान इतना बड़ा है कि उनका सभी सम्मान करते हैं.
किसी भी विवि को अपने ऐसे विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकार पर गर्व करना चाहिए. रोमिला थापर पर गर्व ज्ञान पर गर्व और सम्मान है. जेएनयू में वह 1970 से 1991 तक प्रोफेसर रहीं. साल 1993 में जेएनयू ने उन्हें मानद प्रोफेसर (एमिरेटस प्रोफेसर) बनाया. उनके अकादमिक रिकॉर्ड का मूल्यांकन करने के लिए उनसे सीवी की मांग करना उनका अपमान करना है.
सीवी देने का कोई सवाल नहीं है. रोमिला थापर ने रजिस्ट्रार के पत्र के उत्तर में कहा है- ‘यह जीवन भर का सम्मान है.’ उन्होंने देश और जेएनयू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया है. उन्होंने केवल 1970 में जेएनयू में सीवी दिया था, जब विवि प्राचीन भारतीय इतिहास पीठ के लिए उनके नाम पर विचार कर रहा था. साल 1970 में जेएनयू में इतिहास के प्रोफेसर एस गोपाल, रोमिला थापर, बिपन चंद्र और सतीश चंद्र थे.
इन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास के पारंपरिक अध्ययन के स्थान पर सैद्धांतिक महत्व और विश्लेषणात्मक अवधारणाओं के जरिये अतीत को पुनर्निर्मित किया, जो एक बड़ा कार्य था. संस्कृत, फारसी और आधुनिक भारतीय भाषाओं में मौजूद प्राथमिक स्रोतों पर इनका विशेष ध्यान था. प्राचीन भारतीय इतिहास के गंभीर और शोधपरक अध्ययन के कारण ही रोमिला थापर को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त हुई. वे 1983 में भारतीय इतिहास कांग्रेस की अध्यक्ष थीं.
उन्हें 1999 में ब्रिटिश अकादमी की कॉरेस्पोंडिंग फेलो बनाया गया. साल 2009 में वे अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज का विदेशी फेलो सदस्य चुनी गयीं और दो वर्ष पहले 2017 में सेंट एंटनी कॉलेज, ऑक्सफोर्ड की माननीय फेलो बनीं. उन्होंने दो बार पद्म पुरस्कार लेने से इनकार किया- ‘मैं केवल अकादमिक या मेरे काम से जुड़े संस्थानों से पुरस्कार स्वीकार करती हूं, न कि राजकीय पुरस्कार.’ बेंजामिन फ्रेंकलिन द्वारा स्थापित अमेरिकी दार्शनिक सोसाइटी ने उन्हें अपना सदस्य बनाया है. नोबेल पुरस्कार की तरह का 10 लाख डॉलर का क्लूज पुरस्कार उन्हें ससम्मान प्रदान किया गया है.
रोमिला थापर से सीवी मांगने की भर्त्सना की जा रही है. भारतीय विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ समय से जिस तरह कुलपतियों की नियुक्तियां हो रही हैं, वे यह बताती हैं कि अब विवि को ज्ञान और वास्तविक शोध से दूर किया जा रहा है.
जेएनयू में सोशल साइंसेज के सभी विदेशी जर्नल्स अब नहीं आ रहे हैं. जेएनयू प्रशासन को यह भी पता नहीं है कि एमिरेटस प्रोफेसर का न तो कोई पद है और न इसके लिए कोई आवेदन किया जाता है. यह विवि द्वारा समस्त उपलब्धियों और कार्यों को ध्यान में रखकर सम्मान के रूप में दिया जाता है.
रोमिला थापर कार्नेल और पेंसिलवेनिया विवि एवं पेरिस के कॉलेज डी फ्रांस में विजिटिंग प्रोफेसर हैं. ‘अशोका एंड द डिक्लाइन ऑफ द मौर्या’ (1961) से लेकर ‘इंडियन सोसाइटीज एंड द सेकुलर एस्सेज’ (2016) के बीच की महत्वपूर्ण पुस्तकों की एक बड़ी सूची है. रोमिला थापर को ‘फिक्शनल राइटर’ कहनेवाले अपढ़ हैं, जिन्हें विश्वविद्यालयों में नहीं होना चाहिए.
उन्होंने इतिहास के अध्ययन और शोध को नयी दिशा-दृष्टि दी है. वे दक्षिणपंथी, दकियानूसी विचारधारा के सदैव खिलाफ रही है. उन्होंने हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की सदैव आलोचना की है. उन्होंने बौद्धिक और शैक्षणिक संस्थाओं, जीवन को गरिमा प्रदान की है.
सरकारें ज्ञान से खौफ खाती हैं. वे भय और डर का माहौल बनाती हैं. विवि को ज्ञान विमुख करना अपराध है. ‘द हिस्टोरियन एंड हर क्राफ्ट’ (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2017) को ही अगर पढ़ लिया जाये, तो पता चलेगा कि रोमिला थापर का कार्य कितना बड़ा है. जेएनयू ने रोमिला थापर को अपमानित करना चाहा था. दांव उल्टा पड़ गया. ज्ञान का संसार बड़ा संसार है. वहां कीचड़ में कमल नहीं खिलता है.
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