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तेल कीमतों का दीर्घकालिक उपाय हो

वरुण गांधी सांसद, भाजपा fvg001@gmail.com तेल की कीमतों को लेकर दशकों से चल रही भारत की कोशिशें कभी ना खत्म होनेवाला सफर हैं. फिलहाल कीमतें बढ़ रही हैं, लेकिन दूसरे देशों की तुलना में भारत में बहुत ज्यादा बढ़ रही हैं. हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल से अधिक […]

वरुण गांधी
सांसद, भाजपा
fvg001@gmail.com
तेल की कीमतों को लेकर दशकों से चल रही भारत की कोशिशें कभी ना खत्म होनेवाला सफर हैं. फिलहाल कीमतें बढ़ रही हैं, लेकिन दूसरे देशों की तुलना में भारत में बहुत ज्यादा बढ़ रही हैं. हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गयी है. बीते 19 अक्तूबर को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 82.38 रुपये प्रति लीटर और मुंबई में 87.84 रुपये प्रति लीटर थी. वहीं ऑस्ट्रेलिया में पेट्रोल 82.30 रुपये प्रति लीटर, श्रीलंका में 72.75 रुपये और यूएस के कुछ हिस्सों में 61.72 रुपये है. यह वृद्धि कई कारणों से हुई है, जिसमें तेल उत्पादन में कटौती, अमेरिका द्वारा ईरान के तेल आयात पर प्रतिबंध और रुपये में अस्थिरता शामिल है.
आर्थिक सर्वेक्षण 2018 के मुताबिक तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत की जीडीपी 0.2-0.3 फीसद कम हो सकती है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति 1.7 फीसद और चालू खाता घाटा 9-10 अरब डॉलर बढ़ सकता है. महंगे कच्चे तेल का मतलब आयात का महंगा होना है, जिससे रुपये में और गिरावट आती है.
हालांकि, तेल की कीमत में इस वृद्धि में आंशिक योगदान तेल और गैस उत्पादों को दुधारू गाय की तरह दूहने की केंद्रीय सरकार की परंपरागत नीति का भी है. भारत में पेट्रोल-डीजल पर कई कर लगते हैं- केंद्र उत्पाद शुल्क लेता है, जबकि राज्य सरकारें वैट लेती हैं. ईंधन की खुदरा कीमतों में करों को अलग करके देखने से पता चलता है कि पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमत में करों का हिस्सा क्रमशः 43 और 33 फीसद (दिल्ली में 15 अक्तूबर 2018 को आईओसीएल पंप पर) है.
ऐसे कर डीलर मूल्य और पेट्रोल की कीमत में 90 फीसद और डीजल की कीमत में 60 फीसद की वृद्धि (डीलर कमीशन सहित) कर सकते हैं. वर्ष 2015-2017 में केंद्र के कुल कर राजस्व में उत्पाद शुल्क की हिस्सेदारी 23 फीसद (राज्यों के हिस्से सहित) थी; जिसमें पेट्रोल और डीजल पर कर लगाने से प्राप्त राजस्व कुल राजस्व का करीब 80-90 फीसद था.
बीते कुछ दशकों में, यहां तक कि जब कच्चे तेल की कीमतें ऐतिहासिक स्तर तक नीचे आ गयी थीं, तब भी केंद्र और राज्य दोनों ने अगर कोई राहत दी भी, तो बहुत मामूली दी है. आमतौर पर बढ़ती कीमतों के बोझ को तेल मार्केटिंग कंपनियों से वहन करने के लिए कहा जाता है.
राज्य सरकारों द्वारा लगाया गया वैट दोहरा कराधान है, और इसकी गणना केंद्र द्वारा डीलर से लिये जानेवाले दाम, डीलर कमीशन और उत्पाद शुल्क के योग पर की जाती है. इसको सुधारने से पेट्रोल की कीमतें फौरन पांच रुपये प्रति लीटर कम हो सकती हैं, इससे राज्य का राजस्व कम हो जायेगा. वैट करों की एडवेलोरम (मूल्यवर्धित) प्रकृति को देखते हुए राज्य सरकारें वास्तव में बजट से अधिक राजस्व एकत्र करती हैं. वैट दरों में कटौती की गुंजाइश है, बशर्ते कि अन्य कारक अपनी जगह कायम रहें. राज्य सरकारें निर्धारित कर दरों पर भी विचार कर सकती हैं, जो उनके बजट के अनुरूप है. साथ ही, पिछले दो दशकों में डीलर कमीशन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
सरकार को ईंधन पर रिफाइनरियों से सब्सिडी देने के लिए कहने के बजाय, पेट्रोल और डीजल की कीमतों के लिए कर व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने पर विचार करना चाहिए. फिलहाल, सरकार राज्य रिफाइनरियों के इनवेंटरी स्टॉक का उपयोग करने पर विचार कर सकती है.
साथ ही पाइपलाइनों, ट्रांजिट वाले जहाजों के स्टॉक और स्ट्रेटजिक पेट्रोलियम रिजर्व का इस्तेमाल उपभोक्ता को फौरी राहत देने के लिए कर सकती है, भले ही यह अल्पकालिक होगा. ऐतिहासिक रूप से, भारत सरकार पेट्रोल की कीमत पर डीजल के इस्तेमाल को प्रोत्साहन देती रही है; जिसका बोझ अब पलटकर उसके ही गले पड़ रहा है.
पेट्रोल की तुलना में डीजल की भारतीय किस्म में ज्यादा कण और अन्य प्रदूषक तत्व होते हैं, जो कैंसरकारक धुएं का उत्सर्जन करते हैं. इसके अलावा, डीजल की ज्यादा मांग के कारण, अतिरिक्त डीजल का उत्पादन करने के लिए भारतीय रिफाइनरियों द्वारा हाइड्रो क्रैक्सिंग का उपयोग किया जाता है, जिससे रिफाइनिंग लागत बढ़ जाती है.
वैकल्पिक ईंधन के प्रचार के तहत सरकार द्वारा, खासकर बायो-डीजल को बढ़ावा देने की कोशिशें स्वागतयोग्य हैं. इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास के लिए हमें एक स्थिर विनियामक व्यवस्था बनाने, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में सुधार, तेल पर निर्भरता को कम करने और भविष्य में कीमतों में वृद्धि के प्रति सुरक्षा उपाय करने की जरूरत है. इसके लिए मेट्रो रेल समेत दूसरे अन्य कुशल सार्वजनिक परिवहन बनाने पर जोर देने से मदद मिलेगी.
इस समस्या को लेकर दीर्घकालिक उपाय के बारे में भी सोचना जरूरी है. भारत की भौगोलिक स्थिति कच्चे तेल उत्पादन के लिए आदर्श नहीं है. साल 2013-14 में कच्चे तेल का उत्पादन 3.78 करोड़ टन से घटकर 2017-18 में 3.57 करोड़ टन हो गया है, जबकि खपत 15.84 करोड़ टन से बढ़कर 20.49 करोड़ टन हो गयी है, जिससे हमारी आयात निर्भरता वर्ष 2013-14 के 77.3 फीसद से बढ़कर वर्ष 2017-18 में 82.8 फीसद हो गयी है.
आयातित कच्चे तेल की जगह स्वदेशी कच्चे तेल के इस्तेमाल के दो प्रमुख लाभ हैं- कम आयात का मतलब है रुपये पर कम गिरावट का दबाव, जबकि घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ने का मतलब होगा रॉयल्टी, सेस, पेट्रोलियम से लाभ और आयकर के रूप में सरकार को अतिरिक्त राजस्व की कमाई के अलावा नयी नौकरियां पैदा होना और निवेश में वृद्धि.
एक स्थिर नीति व्यवस्था (जैसा कि हालिया डीएसएफ और ओएएलपी की बोली प्रक्रिया में देखा गया है), कुशल अनुबंध प्रबंधन और शीघ्रता से मंजूरी भारत के तेल खोज और उत्पादन सेक्टर के लिए वैश्विक रुचि और पूंजी को आकर्षित कर सकती है.
तेल की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था पर प्रतिगामी असर डालती हैं, लॉजिस्टिक से जुड़ी इनपुट लागत को बढ़ाती हैं, और अंततः आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं. ईंधन की ऊंची कीमतें बढ़ती मुद्रास्फीति का कारण बनती है और परिवहन की लागत बढ़ने के साथ आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालती हैं. जाहिर है कि तेल की कीमतों में वृद्धि से पिछले कुछ सालों में छोटे किसानों की खेती की इनपुट लागत भी बढ़ गयी है.
भारत के दीर्घकालिक आर्थिक स्वास्थ्य के लिए तेल और गैस पर हमारी मौजूदा निर्भरता पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है. हमें अपनी बढ़ती कार आधारित आर्थिक प्रणाली पर पुनर्विचार करने और पूरे मन से पब्लिक ट्रांसपोर्ट की दिशा को अपनाने की जरूरत है.
Prabhat Khabar Digital Desk
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