प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक

Updated at : 01 Aug 2018 6:35 AM (IST)
विज्ञापन
प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक

कहने को तो प्रेमचंद युग 1917 से 1936 को कहा जाता है, पर समाज में फैली कुरीतियों को देखें, तो उनका युग आज भी जारी है. उनकी रचनाएं आज प्रासंगिक हैं. जिन समस्याओं को उन्होंने अपने साहित्य के द्वारा उकेरा था, वे आज ज्वलंत स्वरूप में हमारे सामने खड़ी हैं. वह एक दूर-द्रष्टा थे. उन्होंने […]

विज्ञापन
कहने को तो प्रेमचंद युग 1917 से 1936 को कहा जाता है, पर समाज में फैली कुरीतियों को देखें, तो उनका युग आज भी जारी है. उनकी रचनाएं आज प्रासंगिक हैं. जिन समस्याओं को उन्होंने अपने साहित्य के द्वारा उकेरा था, वे आज ज्वलंत स्वरूप में हमारे सामने खड़ी हैं. वह एक दूर-द्रष्टा थे. उन्होंने अभी की समस्याओं को पहले ही भांप लिया था.
उन्हें यूं ही उपन्यास सम्राट का दर्जा नहीं प्राप्त है. उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, रुढ़िवादिता, शोषण, अशिक्षा, अंधविश्वास आदि को चित्रित किया, जो आज भी व्याप्त हैं. उनके अनुसार इन सब समस्याओं में ज्ञान ही हमारा पथ-प्रदर्शक बन सकता हैं. उनकी रचनाओं को सिर्फ पढ़ने की नहीं, बल्कि जरूरत है आत्मसात करने की.
सीमा साही , बोकारो
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola