संघ को सत्ता की राजनीति के चश्मे से न देखें

Published at :17 Apr 2014 3:40 AM (IST)
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संघ को सत्ता की राजनीति के चश्मे से न देखें

।। बल्देव भाई शर्मा।। (पूर्व संपादक, पांचजन्य) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खबरों के लिहाज से हमेशा ‘हॉट इश्यू’ रहता है. चुनावों के दौरान तो कुछ ज्यादा ही. भारतीय जनता पार्टी की हर गतिविधि और फैसले में संघ की भूमिका तलाशी जाती है और उसके पीछे संघ का दबाव बताया जाता है. लगता है कि मीडिया संघ […]

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।। बल्देव भाई शर्मा।।

(पूर्व संपादक, पांचजन्य)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खबरों के लिहाज से हमेशा ‘हॉट इश्यू’ रहता है. चुनावों के दौरान तो कुछ ज्यादा ही. भारतीय जनता पार्टी की हर गतिविधि और फैसले में संघ की भूमिका तलाशी जाती है और उसके पीछे संघ का दबाव बताया जाता है. लगता है कि मीडिया संघ को सत्ता की राजनीति से जोड़ कर देखने का अभ्यस्त हो गया है, मानो सत्ता ही संघ की संजीवनी हो. अब कुछ खबरें आ रही हैं कि 16वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनावों में भाजपा की जीत और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने की संभावनाएं देख संघ की शाखाओं की संख्या बढ़ने लगी है. यानी सत्ता का आकर्षण उसे मजबूत बना रहा है. इस ‘सत्य’ को उद्घाटित करने के लिए 2004 से 2013 तक के आंकड़े दिये जा रहे हैं.

इसका सीधा अर्थ है कि मीडिया अपनी सुविधा के अनुसार संघ के क्रिया-कलापों या विचारों को संदर्भो से काट कर प्रस्तुत करते हुए सनसनी फैलाने में ज्यादा रुचि लेता है. संघ के मूल स्वरूप, उद्देश्यों और गतिविधियों को समझ कर उसका विवेचन करने की कोशिश शायद ही कभी की गयी है. यही वजह है कि आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार की शह पर मीडिया के एक बड़े हिस्से में संघ कार्यालयों से बड़ी मात्र में असलहे की बरामदगी को दुष्प्रचारित किया गया, जिसमें तलवारों और छुरों का विशेष उल्लेख था. जबकि वास्तव में ये लकड़ी की थीं, जिनका उपयोग स्वयंसवकों के आत्मविश्वास व शारीरिक क्षमता को बढ़ाने के लिए व्यायाम के दौरान होता था. लाठी को तो संघ की हिंसक मानसिकता का प्रतीक बना दिया गया है, जबकि लाठी भारतीय समाज में बहुत पहले से आत्मरक्षा के लिए एक सर्वसुलभ साधन के रूप में इस्तेमाल की जाती रही है. गिरधर कवि ने तो लाठी की उपयोगिता पर एक कुंडली ही लिख दी और कहा ‘लाठी में गुण बहुत हैं सदा राखिये संग.’ यह संघ के प्रति मीडिया के बड़े हिस्से के दुराग्रह और सच्चाई से आंखें मूंदने की प्रवृत्ति को ही दर्शाता है.

हिंदू जीवन प्रद्धति और हिंदू धर्म इस देश की पहचान रहे हैं. इसी पहचान को स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर, 1893 को शिकागो विश्व धर्म संसद में मानव धर्म कह कर विश्व कल्याण और शांति, सद्भाव का मार्ग बताया. यह पहचान है तो भारत है. अर्नाल्ड टायन्बी जैसे प्रख्यात ब्रिटिश इतिहासकर भी इसी पहचान के कारण भारत को वैश्विक मानवता का केंद्र बताने में नहीं हिचकते. भारत के सनातन धर्म, संस्कृति और जीवन दर्शन की यही पहचान कालांतर में हिंदू नाम से जानी गयी. इसलिए हिंदू कहते ही भारत के राष्ट्रीयत्व का बोध होता है. हज यात्र पर जानेवाले कुछ प्रमुख मुसलिम नेताओं के अनुभव बताते हैं कि भारत का होने की वजह से वहां उन्हें हिंदू पहचान मिलती है. देश के शिक्षा मंत्री रहे मोहम्मद करीम छागला तो अक्सर अपनी हिंदू पहचान पर गर्व करते देखे गये. इस पहचान के संरक्षण, संवर्धन का अर्थ किसी दूसरे समुदाय को नकारना या उसका अहित करना नहीं हो सकता. लेकिन मजहबी कट्टरवाद के चलते देश में जहां भी इस पहचान को षड्यंत्रपूर्वक खत्म करने की कोशिशें हुईं और आबादी के अनुपात में हिंदू कम होते गये, वहां-वहां राष्ट्र विरोधी गतिविधियां, आतंकवाद और उग्रवाद जैसे संकट, यहां तक कि देश के विभाजन की परिस्थितियां भी पैदा हो गयीं. पूर्वोत्तर के कई राज्य और कश्मीर घाटी इसका ताजा उदाहरण हैं.

इसलिए देश में हिंदू का सबल और संगठित होना भारत की सुरक्षा, अखंडता और शांति-सद्भाव का पर्याय है. कांग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वी तो अकसर कहते सुने और देखे गये हैं कि भारत में धर्मनिरपेक्षता बहुसंख्यक हिंदू समाज की वजह से है. दरअसल हिंदू जीवन मूल्य सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत पर टिके हैं. इनमें कहीं भी अन्याय, उत्पीड़न या मजहबी भेदभाव जैसी अमानवीय विकृतियां नहीं हैं. धर्मनिरपेक्षता और शांति-सद्भाव तो हिंदू मन का संस्कार है. संघ उसी को और सुदृढ़ करने में लगा है. यह विशुद्ध राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रयास है, जिसे पूर्ण करने के लिए संघ 88 वर्षो से राष्ट्र सेवा कर रहा है. इसमें सांप्रदायिकता या मुसलिम विरोध अथवा सत्ता की राजनीति के निहितार्थ ढूंढ़ना राजनीतिक दुराग्रह और सत्ता स्वार्थो की दुष्प्रेरणा ही कही जायेगी.

संघ पर गांधी हत्या से लेकर दंगे कराने और देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को तहस-नहस करने जैसे घृणित आरोप उसी वामपंथी, कथित सेकुलर और कांग्रेसी मानसिकता के परिचायक हैं, जो भारत की पहचान को खत्म कर इसे जाति-मजहब और जनजातीय समूहों में विभाजित कर अपने राजनीतिक स्वार्थों को साधने में लगी हैं. धर्मनिरपेक्षता का मतलब केवल मुसलिम हितों की पैरोकारी कैसे हो सकता है? प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि मोदी धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा हैं और इसका मुकाबला करने के लिए सेकुलर दलों को एकजुट हो जाना चाहिए, तब साफ हो जाता है कि यह जमात मोदी या भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मुसलिम समुदाय को डर दिखा कर एक चुनावी मोहरे के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है. वोट के लिए मुसलिमों को बरगलाने की कोशिशें पूरे समुदाय को देश की मुख्यधारा में समरस न होने देने की साजिश ही कही जायेगी. इस अलगाव की भावना से ही पाकिस्तान का जन्म हुआ था. एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू-मुसलमान के बीच विभाजक रेखा खींचने की कोशिशें राष्ट्र हित तो कतई नहीं है.

देश पर आयी हर आपदा में स्वयंसेवक मजहबी भेदभाव किये बिना, सेवा के लिए आगे रहे हैं. भारत-चीन युद्ध के दौरान सरहद पर जान की परवाह किये बिना सेना की मदद के लिए स्वयंसेवकों की देशभक्ति देख नेहरू ने 26 जनवरी, 1963 की परेड में स्वयंसेवकों की एक टुकड़ी शामिल करने का आग्रह किया था. राजपथ पर परेड में स्वयंसेवकों का संघ के बैंड के साथ संचलन उन नेहरू ने कराया, जो संघ के घोर आलोचक थे. ऐसे कई गौरवशाली पृष्ठ संघ के इतिहास में जुड़े हैं, जिन्हें सांप्रदायिकता का आरोप लगा कर नकारने की कोशिश बेमानी है.

संघ की साखा मनुष्य निर्माण की फैक्ट्री कही जाती है, जहां लाखों की संख्या में मानवीय गुणों से युक्त और भारत के लिए जीने-मरने के संकल्प वाले नागरिकों का निर्माण किया जाता है. शाखा ही संघ कार्य के विस्तार और शक्ति का आधार है. शाखाओं को मजबूत व व्यापक बनाने के लिए संघ को सत्ता की अनुकूलता की जरूरत कभी नहीं रही, बल्कि संघ की शाखाओं का विस्तार तो प्रतिबंध जैसी कठिनाइयों के बीच ही ज्यादा हुआ है. सत्ता संघ का लक्ष्य कभी नहीं हो सकती. इसलिए सत्ता की अनुकूलता या प्रतिकूलता संघ के लिए ज्यादा मायने नहीं रखतीं, बल्कि देशभक्त और संगठित समाज का निर्माण ही उसका अभीष्ट है. सत्ता की राजनीति के चश्मे से संघ के मर्म को नहीं समझा जा सकता.

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