अब लड़ने लगे हैं नेताओं के फैन भी

Published at :25 Mar 2014 5:42 AM (IST)
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अब लड़ने लगे हैं नेताओं के फैन भी

।। दक्षा वैदकर ।। प्रभात खबर, पटना लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, हर जगह चर्चाएं बढ़ती जा रही हैं. घर, ऑफिस, कॉलेज, बस स्टैंड, ट्रेन, यहां तक कि स्कूलों में भी इसी विषय पर चर्चा हो रही है. बड़े तो बड़े, युवा और स्कूली बच्चे भी अलग-अलग पार्टियों व लोगों को सपोर्ट कर […]

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।। दक्षा वैदकर ।।

प्रभात खबर, पटना

लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, हर जगह चर्चाएं बढ़ती जा रही हैं. घर, ऑफिस, कॉलेज, बस स्टैंड, ट्रेन, यहां तक कि स्कूलों में भी इसी विषय पर चर्चा हो रही है. बड़े तो बड़े, युवा और स्कूली बच्चे भी अलग-अलग पार्टियों व लोगों को सपोर्ट कर रहे हैं. एक तरफ नेता एक-दूसरे की बात काट रहे हैं, उन्हें नीचा दिखा रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनके फैन्स भी आपस में भिड़ रहे हैं. एक कॉलेज की पार्किग में जब मैं कुछ देर खड़ी रही, तो युवाओं की चर्चा सुनी.

एक ने कहा, ‘मोदी की सरकार एक बार आने दो, देखो फिर पूरा देश गुजरात की तरह चमक उठेगा.’ दूसरे ने कहा, ‘कभी गुजरात गये हो? नहीं न.. फिर फालतू बातें न करो. वहां की असलियत, तो वहां के लोग ही बता सकते हैं. अभी भी वहां गरीबी है. टीवी, सोशल मीडिया तो केवल गुजरात के विकास की झूठी तसवीर दिखा रहा है.’ तीसरे युवा ने कहा, ‘चलो मान लिया कि गुजरात ने ज्यादा तरक्की नहीं की, लेकिन कांग्रेस के राज में पूरे देश ने कौन-सी तरक्की कर ली? हर जगह भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी है.

कम-से-कम मोदी से हमें उम्मीद तो जगी है. क्या शानदार भाषण देता है वो’. चौथे ने कहा, ‘यार वो बहुत बड़ा फेंकू है. हर भाषण में एक ही राग अलापता है, मेरा गुजरात, मेरा गुजरात. उसको बस भाषण देना आता है. वो भी गलत फैक्ट वाले’ पांचवे युवा ने कहा, ‘भाई, कम-से-कम वो भाषण तो दे सकता है. तुम्हारा राहुल बाबा तो वो भी नहीं कर सकता. विदेश से पढ़ाई-लिखाई करने से देश चलाना थोड़े ही आ जाता है. बड़ा आया शहजादा कहीं का. एक पत्रकार के सवालों का जवाब तो ठीक से दे नहीं पाया.. देश क्या चलायेगा.’

थोड़ी देर रुक कर वह फिर बोला, ‘तुम्हारे फेंकू को यूएस का वीसा तो मिला नहीं. बेचारे का सपना अधूरा ही रह गया.’ पहले युवा ने फिर कहा, ‘हमारा देश कोई इटली का व्यक्ति नहीं चलायेगा. वो तो चाय बेच कर संघर्ष कर आगे बढ़ने वाला ही चलायेगा.’ दूसरे युवा ने तपाक से जवाब दिया, ‘देश क्या चलायेगा, अपनी पत्नी का साथ तो निभा नहीं पाया. बेचारी इंतजार कर-कर के मायके चली गयी. उसकी कोई खैर-खबर भी नहीं ली उसने.’ बहुत देर से चुप बैठे एक युवा ने कहा, ‘दोनों पार्टियां मतलबी व करप्ट हैं.

देश को केजरीवाल जैसा ईमानदार आम आदमी ही बचायेगा.’ बाकी युवा उस पर हंसे. बोले, ‘केजरीवाल या ट्रेजिडीवाल? उसका कोई भरोसा नहीं कि कब धरना देने बैठ जाये. बड़ा कन्फ्यूज आदमी है. ऐसे व्यक्ति पर तो भरोसा करना ही बेकार है. अभी तो मोदी के पीछे पड़ गया है. जहां से मोदी लड़ेगा, वहीं से मैं लड़ूंगा.. उसने ठान ली है. बेचारी दिल्ली की जनता वहां उम्मीद लगाये बैठी है. ट्रेजिडीवाल को उनकी तो परवाह नहीं है.’ बहस इसी रफ्तार में जारी रही, तो मैंने वहां से घिसक लेना ही सही समझा.

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