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  • Nov 18 2019 7:59PM
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In PICS: हिजाब से कुछ यूं आजाद हाे रहीं तुर्किश महिलाएं

In PICS: हिजाब से कुछ यूं आजाद हाे रहीं तुर्किश महिलाएं
सभी फोटो सोशल मीडिया से साभार.

लगभग सौ साल पहले मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की को आधुनिक, सेक्युलर और प्रगतिशील बनाने की जो कोशिश की थी, आज का तुर्की उससे बहुत अलग है. वहां के समाज में इस्लाम की वापसी तेजी से हो रही है.

 

अब महिलाओं के हिजाब या हेडस्कार्फ पहनने की परंपरा को ही ले लीजिए. तुर्की में हिजाब पहनने को लेकर वहां की महिलाएं हमेशा से दुविधा में रही हैं और यह लंबे समय से विवादित मसला रहा है.

मुस्लिम महिलाओं द्वारा दौर-ए-उस्मानिया (ऑटोमन एंपायर) में ऐतिहासिक रूप से पहना जानेवाला हिजाब सन 1925 के दौरान मुस्तफा कमाल अतातुर्क के शासन काल में प्रतिबंधित कर दिया गया था.

दशकों तक सार्वजनिक संस्थानों में हिजाब पहनने पर सालों से प्रतिबंध लगा हुआ था और स्टूडेंट्स को हिजाब के साथ विश्वविद्यालय जाने की मनाही रही. लेकिन, पिछले कुछ सालों में राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प अर्दोआन ने धीरे-धीरे इन प्रतिबंधों में ढील दी है.

आपको बता दें कि हिजाब में बाल, कान, गला और छाती को कवर किया जाता है. इसमें कंधों का कुछ हिस्सा भी ढका हुआ होता है, लेकिन चेहरा दिखता है. हिजाब पहनने का तरीका एक-सा होता है, लेकिन रंग अलग-अलग हो सकते हैं.

मॉडर्न इस्लाम में हिजाब का अर्थ है पर्दा. कुरान में हिजाब का ताल्लुक कपड़े के लिए नहीं, बल्कि एक पर्दे के रूप में किया गया है, जो औरतों और आदमियों के बीच हो. कुरान में मुसलमान आदमियों और औरतों, दोनों को ही शालीन कपड़े पहनने की हिदायत दी गई है.

यहां कपड़ों के लिए खिमर (सिर ढकने के लिए) और जिल्बाब (लबादा) शब्दों का जिक्र है. हिजाब के अंतर्गत औरतों और आदमियों, दोनों को ही ढीले और आरामदेह कपड़े पहनने को कहा गया है, साथ ही अपना सिर ढकने की बात कही गई है.

धर्मनिरपेक्षतावादी लोग हिजाब को राजनीतिक और धार्मिक कट्टरता के चिह्न के तौर पर देखते हैं और अर्दोआन पर धार्मिक एजेंडा चलाने का आरोप लगाते हैं. तुर्की में अब यह धर्म का कम राजनीतिक महत्व का मामला अधिक बन गया है.

धर्मनिरपेक्षतावादी लोग हिजाब को राजनीतिक और धार्मिक कट्टरता के चिह्न के तौर पर देखते हैं और अर्दोआन पर धार्मिक एजेंडा चलाने का आरोप लगाते हैं. तुर्की में अब यह धर्म का कम राजनीतिक महत्व का मामला अधिक बन गया है.

ऐसे में कई महिलाओं को सामाजिक दबाव के चलते हिजाब पहनना पड़ता है. इस संबंध में उठती आवाजों के कारण ये मसला तुर्की में उठता रहा है. इसी क्रम में पिछले दिनों सोशल मीडिया पर छाये '10 इयर चैलेंज' के बहाने तुर्की की महिलाओं ने अपने देश में हिजाब प्रथा को भी आईना दिखाया.

तुर्की में महिलाओं ने एक दूसरे को यह चैलेंज देकर अपनी दस साल पुरानी हिजाब पहने हुए तस्वीर की आज की तस्वीर से तुलना की. इन तस्वीरों का मकसद उम्र का अंतर दिखाना नहीं, बल्कि हिजाब पहनने और उसे छोड़ने का अंतर दिखाना रहा. इनमें हिजाब की कुछ तस्वीरें एक ही साल पुरानी हैं क्योंकि उन महिलाओं ने हाल ही में हिजाब छोड़ने का फैसला लिया है.

इस सोशल चैलेंज के तहत महिलाओं ने अपनी दो तस्वीरें डाली, जिनमें से एक हिजाब पहने हुए और दूसरी बिना हिजाब के साथ. इसके साथ ही महिलाओं ने हिजाब छोड़ने के कारण भी बताये. जब कई महिलाएं ऐसा करने लगीं, तो यह सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा भी बना. इसी बहाने हिजाब छोड़ने को लेकर ज्यादा से ज्यादा महिलाओं में जागरूकता भी आयी.

तुर्की में हिजाब पहनने और न पहनने को लेकर महिलाओं के लिए आजादी की वकालत करता एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म 'यू विल नेवर वॉक अलॉन' समय-समय पर मुहिम चलाता रहता है. इसके लिए काम करनेवाली 22 साल की युवती आयसे कहती हैं, एक रूढ़िवादी पले-बढ़े होने के नाते 11 साल की उम्र से मुझ पर हिजाब पहनकर ही घर के बाहर निकलने का दबाव था. लेकिन पहली बार जब में बिना हिजाब के घर से निकली, उस खुशनुमा एहसास को शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है.

आयसे कहती हैं, 11-12 साल की उम्र में किसी को भी वह पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए जो ताउम्र उनके साथ बना रहने वाला है. हिजाब को पहनना या ना पहनना मेरा अपना चुनाव है.

(Input: The Sunday Indian, The Telegraph, Twitter, BBC)

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