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  • Sep 15 2019 10:01AM
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हेलिकॉप्टर पैरेंटिंग : बढ़ती उम्र के साथ बढ़ता शिकंजा

हेलिकॉप्टर पैरेंटिंग : बढ़ती उम्र के साथ बढ़ता शिकंजा

ऐसे अभिभावक, जो अपने बच्चों के जीवन मे अत्यधिक दखलअंदाजी करते हैं. इन्हें 'हेलिकॉप्टर पैरेंट्स' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह हेलिकॉप्टर की तरह निरंतर अपने बच्चों के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं और उनके जीवन के हर पहलw और हर स्थिति पर कड़ी निगरानी रखते हैं. कारण वे अपने बच्चों को लेकर अतिसंरक्षित (over protective) होते हैं और हर वक्त उन्हें संघर्ष, असुविधा, पराजय या निराशा से बचाने की जुगत में रहते हैं. ये पैरेंट्स इतने फिक्रमंद रहते हैं कि अपने संतान के सम्मुख आनेवाली असफलताओं, अवरोधों और चुनौतियों के आगे स्वयं ढाल बन कर खड़े हो जाते हैं. वे अपने बच्चों को अपनी क्षमता के बलबूते चुनौतियों का मुकाबला करने का मौका ही नहीं देते. हेलिकॉप्टर पैरेंट्स अपने संतान की विफलताओं और विकट चुनौतियों से असक्त महसूस करते हैं और वे हर कीमत पर उसे रोकना चाहते हैं. बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ हेलिकॉप्टर पैरेंटिंग का अंत नही होता, बल्कि उसका शिकंजा दिन-ब-दिन कसता ही जाता है. ऐसे अभिभावक चाहते हैं कि उनकी बच्चे उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप चले और उनकी हर आकांक्षाओ पर खरे उतरे. माता-पिता का यही रवैया भविष्य में बच्चों के लिए गंभीर स्थिति उत्पन्न करता है. वे छोटे-छोटे कामों के लिए भी बच्चों को बड़ी-बड़ी सलाह देते रहते हैं. वे नहीं चाहते कि उन्हें अपने जीवन में किसी तरह की परेशानी झेलनी पड़े.

बच्चों के जीवन से खत्म हो जाता है 'नमक'
जो लोग इस तरह के पैरेंटिंग एटिट्यूड को उचित मानते हैं, उसके पीछे उनका तर्क होता है कि वे नहीं चाहते कि जो परेशानियां उन्हें झेलनी पड़ीं, उससे उनके बच्चों को दो-चार होना पड़े. साथ ही, जो चीजें उन्हें नहीं मिलीं, वे अपने बच्चों को देना चाहते हैं, लेकिन प्रॉब्लम यह है कि अपनी इन चाहतों के चक्कर वे अक्सर अपने बच्चों को इतना 'ज्यादा' देने लगते हैं कि उनके बच्चों को बदहजमी होने लगती है. बच्चे के पास अपने दम पर पाने के लिए कुछ बचता ही नहीं, जिससे कि वह अपनी क्षमताओं और संघर्षों को दुनिया के सामने ला सकें. यहां तक कि उन्हें अपने शारीरिक और मानसिक बदलावों को स्वीकार करने में भी कठिनाई होती है.

बाल मनोवैज्ञानिकों की मानना है कि आवश्यकता से अधिक देखभाल बच्चों के मानसिक स्तर को कमजोर कर देता है. इससे उनका मानसिक विकास बाधित होता है. ऐसे बच्चों के आत्मविश्वास का स्तर इतना कम हो जाता है कि वे जीवन की विषम परिस्थितियों मे उचित-अनुचित का निर्णय लेने में खुद को अक्षम महसूस करते हैं. उनमें विशिष्ट 'धैर्य' का नितांत अभाव रहता है. ऐसे बच्चों को जब कभी जीवन में संघर्षों की धूप का सामना करना पड़ता है, तो वे इसकी तापिश को बर्दाश्त नहीं कर पाते और बिखरने लगते हैं. वे भावनात्मक रूप से अस्थिर व असंतुलित हो जाते है. लोगों से दूरी बनाने लगते हैं, लोगों से तारतम्य बिठाने मे असहजता महसूस करते हैं और अंततः एकाकी जीवन जीने लगते हैं. उनके जीवन से जोश, जुनून और संघर्ष खत्म हो जाता है. वे लक्ष्यहीन और संघर्षहीन जीवन जीने के लिये मजबूर हो जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि उनके अभिभावकों ने कभी भी उन्हें जीवन के अहम मुद्दों के बारे में निर्णय लेने का अवसर ही नहीं दिया. उन्हें यह बताया ही नहीं दी कि जीवन की विपरीत परिस्थितियां हमारे बेस्ट टीचर्स होती हैं, जिनसे हमें सीख लेकर आगे का रास्ता तय करना चाहिए. यही तो वो चीजें हैं, जो जीवन को सुस्वादु बनाने में 'नमक' की भूमिका अदा करती हैं.
 
अभावों का एहसास कराना भी है बेहद जरूरी
यह बेहद जरूरी है कि हम बच्चों को अपने दम पर कोशिश करने और गलती करने की अनुमति दें, ताकि भविष्य में वे उनका मुकाबला करने के काबिल बन सकें. उन्हें बताएं कि गलतियां करना स्वाभाविक है, लेकिन बुद्धिमानी इसी में है कि हम अपनी गलतियों से सीख लेकर अपने भविष्य की भावी योजनाएं बनाएं. कई अभिभावक बच्चों को प्रेमवश, मोह में आकर छोटी उम्र में ही जरूरत से ज्यादा सुख-सुविधाएं दे देते हैं. उन बच्चों को 'अभाव क्या है', इसका कभी एहसास ही नहीं हो पाता. ऐसे बच्चे भविष्य मे कमजोर पड़ जाते हैं और मुसीबतों का मुकाबला करने मे असमर्थ हो जाते हैं. बच्चों को अभावों में रहने की तालिम देना बहुत जरूरी है, ताकि जीवन में कर्म और परिश्रम का महत्व समझ सकें.

श्रेष्ठ बनाएं, 'सर्वश्रेष्ठ' बनने का बोझ न डालें
संस्कृत में एक कहावत है- 'अति सर्वत्र वर्जयते' अर्थात अति या अधिकता किसी भी चीज की हो, सही नहीं होती. फिर चाहे वह संतान की परवरिश का मामला ही क्यूं न हो. संत कबीर ने भी कहा है- 
अति का भला न बोलना, 
अति की भली न चुप। 
अति का भला न बरसना, 
अति की भली न धूप।।
जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है श्रेष्ठ माता-पिता बनना. हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनकी संतान हर तरह से सुरक्षित और सफल रहे. लेकिन, इसका यह मतलब नहीं कि हम अपने बच्चों को इतना संरक्षित कर दें कि वे असुरक्षा के नाम से ही डरने लगे. उन्हें इतना सहारा देने लगें कि वे अकेले चलने से भी घबरायें. उम्मीद है मेरी तरह आप भी ऐसा नहीं चाहेंगे, इसलिए...
 
ये भी जानें
-अपने बच्चों के पथ प्रदर्शक बनें, उनका नियंत्रक नहीं
-उन्हें सही-गलत की पहचान करना सिखाएं, उन्हें गलत करने से रोके नहीं.
 
-उन्हें जिंदगी के फैसले खुद लेने के लिए प्रेरित करें, उनके फैसलों आप न लें.
-उनकी गलतियों पर अफसोस न करें, बल्कि उन्हें उनसे सीख लेना सिखाएं.
-बच्चों को अपनी कमियों के साथ जीना  और हमेशा उसमें ही अपना बेस्ट देने के लिए प्रेरित करें. 
-हमेशा याद रखें कि 'बेस्ट' या  'परफेक्ट' जैसी कोई चीज नहीं होती. 'बेहतर' की संभावना हमेशा बरकरार रहती है.
अंत में, अपने बच्चों का सहारा बनें, उनकी बैसाखी नहीं.
 
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