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ranchi

  • Feb 21 2019 9:09AM
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VIDEO : मातृभाषा के लिए बांग्ला भाषियों ने पाकिस्तान से यूनेस्को तक किया संघर्ष

VIDEO : मातृभाषा  के लिए बांग्ला भाषियों ने पाकिस्तान से यूनेस्को तक किया संघर्ष

अरुणांशु बनर्जी

बांग्ला भाषा बोलने वालों के मातृभाषा के प्रति अनुराग की वजह से ही आज दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है. इसके लिए इन्हें पश्चिमी पाकिस्तान से लेकर यूनेस्को तक संघर्ष करना पड़ा. मातृभाषा के प्रति प्रेम ही था कि अपनी इस मांग को मनवाने के लिए छात्रों ने पुलिस की गोली खाने से भी गुरेज नहीं किया. कुल 16 लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हुए, लेकिन अपनी मातृभाषा को मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा.

यह तो सभी जानते हैं कि सन् 1947 में अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत धर्म के आधार पर भारत को दो टुकड़ों में बांट दिया. इस्लाम के नाम पर भारत से अलग होकर पाकिस्तान नाम का नया राष्ट्र अस्तित्व में आया. लेकिन, बंटवारे की तह में जायेंगे, तो पता चलेगा कि 14 अगस्त, 1947 को भारत के दो नहीं, तीन टुकड़े हुए थे. जी हां. तीन टुकड़े. मुस्लिम आबादी के आधार पर भारत से टूटकर पाकिस्तान बना. यह पाकिस्तान भाषायी तौर पर अघोषित रूप से दो टुकड़ों में बंटा था. बांग्ला और उर्दू भाषा बोलने वालों की बहुलता के आधार पर पाकिस्तान में पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान बन चुके थे.

पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हजारों मील की दूरी तो थी ही, दोनों प्रांतों की भाषा संस्कृति और तहजीब में काफी फर्क था. पाकिस्तान की राजधानी इस्लमाबाद पश्चिमी पाकिस्तान में था. इसलिए यहां उर्दू का दबदबा था, जबकि पूर्वी पाकिस्तान के लोग बांग्ला बोलते, लिखते और पढ़ते थे. पाकिस्तान में सरकारी कामकाज की भाषा उर्दू होने की वजह से पूर्वी पाकिस्तान या यूं कहें कि बांग्लाभाषी लोगों को सरकारी नौकरी नहीं मिलती थी. इसकी वजह से पूर्वी पाकिस्तान में धीरे-धीरे विद्रोह के स्वर उठने लगे. लोगों ने बांग्ला को पूर्वी पाकिस्तान की राजभाषा का दर्जा देने की मांग कर दी.

इस मांग को दबाने के लिए पाकिस्तान के प्रणेता मोहम्मद अली जिन्ना ने 22 मार्च, 1948 को सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि राज-काज की भाषा उर्दू होगी. पाकिस्तान में रहने वाले सभी लोगों के लिए यह भाषा (उर्दू) सीखना अनिवार्य है. पूर्वी पाकिस्तान के ढाका स्थित रेसकोर्स में जिन्ना की इस घोषणा से बांग्लाभाषियों का गुस्सा उबल पड़ा. उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया. अपनी मातृभाषा को मान्यता दिलाने के लिए बांग्ला भाषा के पैरोकारों ने पूर्वी पाकिस्तान में आंदोलन छेड़ दिया.

लोगों ने जुलूस निकाले, धरना दिया. प्रदर्शन किये. यह सिलसिला करीब चार साल तक चलता रहा. 21 फरवरी, 1952 को ढाका विश्वविद्यालय से छात्रों की एक विशाल रैली निकालने की योजना बनी. जुलूस को रोकने के लिए पुलिस ने पूरे विश्वविद्यालय की घेराबंदी कर दी. आंदोलनकारी भी कहां मानने वाले थे. पुलिस बैरिकेडिंग को तोड़ते हुए छात्रों ने विशाल जुलूस निकाला. जुलूस यूनिवर्सिटी के गेट से बाहर निकला ही था कि पुलिस ने छात्रों पर गोलियां बरसा दीं.

विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर ही चार विद्यार्थियों की मृत्यु हो गयी. इनके नाम रफीक-उद्दीन अहमद, अब्दुल बरकत, अब्दुल जब्बार और अब्दुस सलाम थे. चार छात्रों की मौत की खबर देखते ही देखते पूरे ढाका में फैल गयी. बांग्ला भाषा के लिए होने वाले आंदोलन को इस तरह से कुचले जाने से लोगों का गुस्सा भड़क उठा. लगातार दो दिन तक ढाका के कोने-कोने में हंगामे होते रहे. आंदोलन के दमन के लिए पुलिस ने भी कमर कस ली थी. जहां भी बांग्ला भाषा के समर्थक आंदोलन करते पाये गये, उन पर जमकर लाठियां बरसायी गयीं. गोलियां चलाने से भी पुलिस ने गुरेज नहीं किया. सिर्फ दो दिन में ढाका में पाकिस्तान की पुलिस ने 12 लोगों को मौत की नींद सुला दी.

यह पहला मौका था, जब किसी देश में अपनी भाषा के लिए इतना बड़ा आंदोलन हुआ. 16 लोग भाषा के लिए शहीद हो गये. आंदोलनकारियों की शहादत रंग लायी. पाकिस्तान में धीरे-धीरे उर्दू की बाध्यता खत्म हो गयी. पाकिस्तान में बांग्ला भाषा को भी तवज्जो मिलने लगी. इसके बाद बांग्लाभाषी समुदाय ने इस दिन को ‘भाषा शहीद दिवस’ का दर्जा दिया और हर साल इस दिन विशेष आयोजन होने लगे.

वर्ष 1971 में गृह युद्ध के बाद पाकिस्तान से अलग होकर जब बांग्लादेश अलग राष्ट्र बना, तो वर्ष 1972 में बांग्ला को इस देश की राजभाषा का दर्जा दिया गया. सरकारी तौर पर 21 फरवरी को ‘भाषा शहीद दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा भी कर दी गयी. बांग्ला भाषियों के लिए यह बहुत बड़ा दिन था. उन्होंने वो हासिल कर लिया था, जिसके लिए उनके समुदाय के 16 लोगों को अपनी जान देनी पड़ी. उन्होंने अपनी मातृभाषा को प्रतिष्ठित कर लिया था. अब उन्होंने दुनिया भर के लोगों में मातृभाषा के प्रति प्रेम जगाने के लिए एक अनूठा अभियान शुरू किया. अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को मान्यता दिलाने का अभियान.

इसके लिए बांग्लादेश की सरकार ने अपने अधिकारियों के साथ-साथ वहां के बुद्धिजीवियों से कहा कि वे दुनिया भर के देशों से इस संबंध में पत्राचार करें. इस अभियान में उनकी मदद लें, ताकि दुनिया भर के देश एक दिन एक साथ अपनी-अपनी मातृभाषा को महत्व दें. उस भाषा में लिखें, पढ़ें, बोलें. इसके लिए अपने-अपने देश के लोगों को जागरूक करें. अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को मान्यता दिलाने के लिए बांग्लादेश कई बार यूनेस्को (यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन) में गया. यूनेस्को ने बार-बार उसके प्रस्ताव को खारिज किया.

बांग्लादेश ने हार नहीं मानी. धीरे-धीरे उसे कुछ और देशों का समर्थन मिला. विश्व भाषा परिषद के 29 देशों का समर्थन जुटाने के बाद उसने संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था UNESCO (United Nations of Educational, Scientific, Organisation) को मजबूर किया कि 21 फरवरी को ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ का दर्जा दिया जाये. 17 नवंबर, 1999 को बांग्लादेश अपने इस अभियान में कामयाब हुआ. यूनेस्को को बांग्लादेश समेत 29 देशों की मांग माननी पड़ी और ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ को मान्यता देनी पड़ी. इसके बाद से ही दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाने लगा.

इस दिन बांग्लादेश की राजधानी स्थित ढाका विश्वविद्यालय में बहुत बड़ा आयोजन होता है. विशाल शहीद स्मारक पर पुष्प-मालाएं अर्पित की जाती हैं. विश्वविद्यालय प्रांगण में साहित्य और सांस्कृतिक मेला लगता है. इसमें देश-दुनिया के साहित्यानुरागियों के अलावा बड़े पैमाने पर पर्यटक भी शामिल होते हैं.

भारत में भी हर साल ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है. भारत में अच्छी बात यह है कि हर भाषा के लोग अपनी मातृभाषा के प्रति इस दिन अनुराग प्रदर्शित करते हैं. शिक्षण संस्थानों में राजभाषा हिंदी के बारे में बच्चों को विशेष रूप से बताया और पढ़ाया जाता है. सरकारी कार्यालयों में हिंदी में कामकाज पर बल दिया जाता है. वहीं, विभिन्न सामाजिक संगठन आयोजनों के जरिये अपनी-अपनी मातृभाषा के बारे में, उसके साहित्य और उससे जुड़े साहित्यकारों के बारे में चर्चा-परिचर्चा करते हैं. झारखंड सरकार ने भी इस वर्ष शिक्षण संस्थानों में मातृभाषा दिवस मनाने के निर्देश दिये हैं.

ज्ञात हो कि यूनेस्को ने इस वर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ का थीम ‘विकास, शांति और समन्वय में देसी भाषाओं का योगदान’ रखा है. UNESCO के डायरेक्टर जेनरल ऑड्रे अजूले ने इस दिवस के लिए जारी अपने संदेश में कहा है कि आदिम जनजातियों के अधिकारों पर जारी संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र में कहा गया है कि सभी लोग अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा पाना चाहते हैं. चूंकि वर्ष 2019 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ इंडिजिनस लैंग्वेजेज है, इस वर्ष के अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की थीम ‘विकास, शांति और मेल-मिलाप में आदिम भाषाओं की भूमिका’ रखी गयी है.

दुनिया भर में 37 करोड़ आदिम जनजातियां हैं. इनके बारे में माना जाता है कि अपने-अपने क्षेत्र में ये लोग सबसे पहले आये. धरती पर मौजूद ऐसी जनजातियों के लोगों की लगभग 7,000 भाषाएं हैं. इन समुदायों में भारी संख्या में लोग बेहद पिछड़े हैं, गंभीर भुखमरी और भेदभाव का शिकार हैं. इतना ही नहीं, इनके मानवाधिकारों की भी रक्षा नहीं की जाती. इसलिए यूनेस्को ने इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संयुक्त राष्ट्र से जुड़े संगठनों, यूनेस्को के सदस्य देशों एवं शिक्षण संस्थानों से अपील की है कि आदिम जनजातियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठायें.

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