Advertisement

Columns

  • Nov 9 2018 6:49AM

अंधकार में एक दीया जलायें

मृणाल पांडे
ग्रुप सीनियर एडिटोरियल
एडवाइजर, नेशनल हेराल्ड
mrinal.pande@gmail.com
 
अखबारों में छपनेवाले ‘संपादक के नाम पत्र’ पढ़ जाइए. आप देखेंगे कि भारतीय, खासकर हिंदी पट्टी के पाठक, जागरूक नागरिक बनकर राज-समाज में भ्रष्टाचार और पर्यावरण क्षरण जैसी आपदाओं का विरोध नहीं करते. उनकी चिंता के मुद्दे होते हैं कि अयोध्या में दुनिया की सबसे बड़ी राम की प्रतिमा कब और कहां लगेगी? कौन सी तीर्थनगरी क्योटो या टोक्यो बनेगी? औरतें किस मंदिर में कब जायें या न जायें? उनके अपने जातीय समुदाय को आरक्षण कब मिलेगा? 
 
कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए स्कूल चाहे सिरे से सड़ चुके हों, पर वहां परीक्षा में कुछ अतिरिक्त छूटें क्यों नहीं दी जायें? क्षेत्रीय भाषाओं के घटते मान का शिकायती ठीकरा पहले क्षेत्रीय, फिर राष्ट्रीय नेतृत्व और अंत में नयी पीढ़ी पर फोड़ा जाता है, पर पाठ्यक्रम के स्वरूप और शिक्षा की गुणवत्ता कम हो रही है, इस पर बस हाहाकारी रुदन है. हिंदी पट्टी का आम पाठक खुद को जाने क्यों एक ‘सर्वहारा’ मानता है, जो खुद अपने हाथ से कुछ नहीं कर सकता. चातक की तरह वह सरकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं से ही जलकण पाने की उम्मीद रखता है. 
 
उसका मानना है कि उस पर पेट भरने की चिंता का इतना दबाव है कि उससे नयी सोच या लामबंदी की उम्मीद करना अन्याय है. कभी-कभार हठात् जागकर ‘फलाने तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं’, का नारा लगा देना, या मजमा बनाकर गरीब-कमजोरों को अफवाहों के आधार पर पीट आना उसके लिए पर्याप्त है.
 
टीवी पर शाम की और अखबार में सुबह की खबरें पढ़ने-देखनेवाला भारत का विशाल मध्यवर्ग क्रांति के लिए जितना भी चिल्लाये, दुखद सच यह है कि जमीनी तौर से वह खुद को राज-समाज में सार्थक नागरिक जिम्मेदारियों से कतई मुक्त तथा सरकार से अनंत सब्सिडियों का सबसे बड़ा उम्मीदवार मानता है. टीवी पर राज-समाज तथा मीडिया के कई मुखर एंकर और आलोचक यह नहीं मानते कि आम नागरिकों की बुनियादी विशिष्टताओं और जीवन संघर्ष के दुर्लभ अनुभवों को आदर देते हुए उनको देश की सामुदायिक ताकत बनाकर ही लोकतंत्र तरक्की कर पाते हैं. 
 
अपने इतिहास में हम हजारों जुझारू और आशावंत पात्रों की महान सफलताओं से रूबरू होते हैं, जिन्होंने बीआर आंबेडकर, महात्मा फुले, बाबा आम्टे या जेपी की तरह अंधकार के बीच सियापा नहीं किया, बड़े जतन से सबको राह दिखाने के लिए एक दीया भी जलाया. पर पटेल हों या शिवाजी या राम, सबको हमारे नेता अवतारी पुरुष बताकर उनकी विश्व में सबसे बड़ी मूर्ति लगवाने और हेलीकाॅप्टर से उनको माला चढ़ाने के मौके खोजते रहते हैं. लेकिन, उनके जीवन से सबक नहीं लेते.
 
हिंदी अखबार का मध्यवर्गीय ग्राहक खुद को बौद्धिक रूप से अधिक सजग मानता है. पर वह न तो विज्ञापनों द्वारा अखबारों को सब्सिडी देने और एवज में कंपनियों की दलाली का विरोध करेगा और न ही योजनाबद्ध तरीके से खबरों की जगह झूठ परोसनेवाले प्रकाशनों या चैनलों का बहिष्कार कर मालिकान को बेहतर उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित करेगा. छोटे शहर कुछ अपवाद हैं. 
 
बिहार के किसी छोटे से गांव से बस से शहर आकर रोज स्टाॅल पर रखे अखबारों में अपने काम की खबरों की तादाद चेककर ही अखबार खरीदनेवाला पाठक (इनकी तादाद लाखों में है) गरीब भले हो, पर वह शहरी रुदालियों से अपेक्षया कहीं अधिक जागरूक पाठक और मतदाता है. 
 
चुनाव आने पर भी वह शहरी भेड़धसान की बजाय एकजुट होकर अपनी उम्मीदों और शिकायतों पर सवाल करने का साहस दिखाता है. अगर उम्मीदवार से उसे उम्मीद हो, तो मीलों चलकर वह मतदान का कर्तव्य निभाता है, ताकि उसके जीवन में लोकतंत्र बना रहे. 
 
दिवाली हर बार याद दिला जाती है कि दीये के बूते जीवन के अंधेरों से जूझने की बजाय हम शहरी कहीं-न-कहीं चीनी लड़ियों से घर को सजानेवाले सुविधावादी गाहक होते जा रहे हैं. दिवाली पर भयवश लक्ष्मीपूजन करने और छठ पर एकाध डुबकी लगाकर ‘हर हर गंगे’ का नारा बुलंद करनेवाले नागरिक राष्ट्र से अंधकार नहीं मिटा सकते. 
 
इस वक्त जबकि हिंदी पट्टी भाषा और राजनीति दोनों ही क्षेत्रों में जटिल दौर से गुजर रही है, भरोसा बहाली और उजले स्वस्थ मानदंड दोबारा स्थापित करने के लिए न्यूनतम शर्त यह है कि हम इस किस्म की लीपापोती या सर्वहारावाद की ओट लेकर संपन्न वर्गों और इक्के-दुक्के तरक्कीयाफ्ता लोगों पर हिरसभरी छींटाकशी से बाज आयें और इलाके की बुनियाद से फुनगी तक समग्र बेहतरी पर गंभीरता से चर्चाएं करें. इलाके का नेतृत्व अगले पांच बरस कौन करेगा? इस बाबत हम हिंदी में क्यों न अपने-अपने सार्थक अनुभव भी साझा करें? 
 
हम खुद परिवार और पार्टी, संपादकीय तथा विज्ञापन के बीच वे साफ-सुथरी विभाजक रेखाएं बनाने के लिए जिद क्यों नहीं ठानते, जिनके न होने से राजनीति और पत्रकारिता की जड़ में घुन लगा हुआ है? कुल मिलाकर वह समय आ गया है, जब हम बचकानी खुन-खुन छोड़कर लोकतंत्र को अपने निजी सुख का माध्यम न मानें. उसे एक जीवंत, निरंतर गतिशील जीवनधारा के रूप में भी देखें-समझें. हिंदी पट्टी को गोबर पट्टी और नेताओं को चोर कहकर उसकी दुर्दशा को अमिट मानना बेकार है.  
 
उत्तर भारत की तुलना में दक्षिणी राज्यों को देखें, जिनको अंधकार के प्रदूषण से शिकायत पर वे तुरत भीतरी सफाई में जुटें. आज वहां प्रतिव्यक्ति आय और नागरिकों की शिक्षा तथा स्वास्थ्य का स्तर गवाह है कि बुद्धिमत्तापूर्ण जन सहयोग क्या कुछ नहीं करा सकता? इधर हम हिंदी पट्टीवाले नाराज तो हैं, पर हस्बेबामूल अपनी जिम्मेदारी से पलायन करना चाहते हैं. 
 
इसलिए हम हिंदी भाषा का स्तर बेहतर बनवाने की बजाय निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूल खुलवाकर अपनी नयी पौध को हिंदी भाषा के उत्तरदायित्व से लगभग मुक्त कर देते हैं. फिर कहते हैं कि हाय! बापू का सपना अधूरा रह गया, हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन रही!
 
भारतीय परंपरा में जीवन को परिवर्तनशील माना गया है. ॠतुओं के साथ जीवन का बदलना अनुभव करना, जनप्रिय पर्व मनाना, मानव जीवन में निहित तमाम सारी विविधता और भिन्नताओं- अपरिग्रह और अर्थार्जन, इंद्रिय निग्रह और इंद्रियगत सुखों की जरूरत, जीवन प्रवाह में पहले गृहस्थ जीवन और बाद को वानप्रस्थ की जरूरत को हमारे पर्व खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं. 
 
दीपावली इसका सुंदरतम प्रतीक है. इस दिन हम प्रकाश ही नहीं, अमावस को भी जीवन की परिधि के भीतर नमन कर दोनों का समारोह मनाते हैं. अंधकार को कोसने-नकारने की बजाय हम कम-से-कम एक दीया तो कहीं जलायें?
 

Advertisement

Comments

Advertisement