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  • Nov 8 2018 12:50PM

ईरान का वो तुरुप का पत्ता जिससे पूरा खेल बदल जाएगा

ईरान का वो तुरुप का पत्ता जिससे पूरा खेल बदल जाएगा

ईरान

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ईरान के गैस के ज़ख़ीरे तक यूरोप की पहुंच निस्संदेह यूरोप के हाथ में एक ऐसा तुरुप का पत्ता है जो खेल को पलट सकता है.

ईरान पर अमरीकी पाबंदियों का सिलसिला एक बार फिर से शुरू हो गया है.

अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक ताक़त तो है ही दूसरी तरफ़ उसकी मुद्रा डॉलर की बुनियाद पर दुनिया का 80 फ़ीसदी कारोबार और लेनदेन भी होता है. वह विश्व की एक मात्र राजनीतिक महाशक्ति भी है.

जिस दिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए परमाणु क़रार से बाहर निकलने के फ़ैसले पर दस्तख़त किए तब से ईरान के नेता और अधिकारी लगातार कहते आ रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ प्रतिबंध को रोके जाने के उपाय हैं और परमाणु क़रार अमरीका के बगैर भी जारी रहेगा.

लेकिन इतनी बात तो साफ़ लग रही है कि ईरानी अधिकारियों की गुहार से काम नहीं चलेगा. ईरान पर लगी आर्थिक पाबंदियों के असर को कोई कम कर सकता है तो वो है यूरोपीय संघ.

हालांकि ये सवाल भी अपनी जगह वाजिब है कि अमरीका के ख़िलाफ़ जाकर यूरोप आख़िरकार क्यों इस परमाणु क़रार को बचाने की कोशिश करेगा?

ईरान का परमाणु क़रार

ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी पाबंदियां लागू रहीं तो यूरोपीय देश ईरान के साथ कैसे सियासी रिश्ते रखेंगे और तेहरान के हुक्मरानों को लेकर उनका क्या रुख़ होगा?

परमाणु समझौते को लेकर ईरान और '5+1 समूह' (संयुक्त राष्ट्र संघ के पांच स्थायी सदस्य और जर्मनी) या यूरोप के नज़रिये से '3+3 समूह' (तीन यूरोपीय देश जैसे ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी और सुरक्षा परिषद के तीन ग़ैरयूरोपीय सदस्य जैसे अमरीका, रूस और चीन) के बीच पिछले कुछ सालों से रुक-रुक कर फिर बाद में कुछ महीनों के लिए सघन रूप से लगातार चलने वाली वार्ता इस ओर संकेत करती है कि यूरोप के लिए ये मुद्दा बेहद ख़ास है.

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अब इस समय जर्मनी, फ़्रांस और ब्रिटेन इस कोशिश में हैं कि जो गया सो गया, अब जो भी सामने है, इसको आगे बढ़ाया जाए.

आज यूरोप के सामने जो संकट साफ़ तौर पर दिख रहे हैं और जिनकी आहट सुनी जा रही है, उनसे बाहर निकलने का रास्ता शायद ईरान ही है.



यूरोपीय संघ का इतिहास

आज से लगभग 70 साल से भी अधिक पहले की बात है.

द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद एक बर्बाद और तबाह यूरोप ज़मींदोज़ पड़ा था तो उस वक़्त यूरोपीय देशों के राजनेताओं ने दोबारा अपने क़दमों पर खड़ा होने के लिए कोयले और लोहे से संबंधित एक संगठन की बुनियाद डाली.

रोम समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ ही दिनों बाद यूरोप युद्ध के कारण अपनी अस्तव्यस्त अर्थव्यवस्था को ज़िंदा कर सका.

एक तरह से इतिहास में पहली बार यूरोपीय साझा बाज़ार की नींव पड़ी. यूरोप में शांति और स्थिरता को केवल उस की आर्थिक उन्नति ने ही बहाल किया.

फिर कुछ सालों के बाद जब विश्व पर शीतयुद्ध के बादल मंडराने लगे और विश्व दो महाशक्तियों के बीच दो ध्रुवों में बंट चुका था तो एक बार फिर यूरोप ने अतीत के अनुभवों से सीखते हुए इस बात पर गौर किया कि यूरोप महाद्वीप के छोटे-छोटे देश केवल इत्तेहाद या परिसंघ के ही साये तले विश्व राजनीति के आकाश में अपनी भूमिका निभा सकते हैं.

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आख़िरकार यूरोप वालों की कोशिश रंग लाई और साल 1993 में विधिवत रूप से विश्व राजनीतिक पटल पर यूरोपीय संघ का उदय हुआ, और उसके छह साल बाद यूरोपीय संघ ने अपनी एकल मुद्रा 'यूरो' भी जारी कर दी.

घिरा हुआ यूनियन

अब अपने जन्म के 25 साल बाद यूरोपीय संघ कई चुनौतियों और बुनियादी परेशानियों से घिरा हुआ है और इनमें से कोई भी एक परेशानी या चुनौती इसके अस्तित्व को ख़तरे में डाल सकती है.

इस समय यूरोप विश्व की तीन बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक है लेकिन इसकी हालत बहुत अस्थिर है.

एक दशक पहले आए आर्थिक भूकंप ने यूरोप के कुछ देशों को दीवालिया होने की कगार पर खड़ा कर दिया था.

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स्पेन, पुर्तगाल और इटली ने तो जैसे तैसे ख़ुद को इससे निकाल लिया लेकिन यूनान में संकट और अधिक गहरा गया और लोग सड़कों पर उतर आए, जनता के प्रतिरोध में जानें भी गईं.

अभी यूरोप धीरे-धीरे अपने संकट से उबर ही रहा था कि एक ऐसी आफ़त उसके सामने आ खड़ी हुई जिसकी किसी राजनीतिक गुरु या पंडित ने कल्पना भी नहीं की थी.

ये आफ़त थी, राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में यूरोप के ख़िलाफ़ अमरीका की कारोबारी लड़ाई की घोषणा. जैसे किसी ने घात लगा कर यूरोपीय संघ के अर्थिक शरीर पर आक्रमण कर दिया हो.



सीमाओं के नज़दीक युद्ध और शरणार्थी

मध्य पूर्व का क्षेत्र अपनी अशांति के कारण प्रसिद्ध रहा है.

इस क्षेत्र में और उत्तरी अफ़्रीका में पिछले एक दशक से चली आ रही लड़ाई और मार-काट ने यूरोपीय संघ को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष से बहुत अधिक प्रभावित किया है.

अरब स्प्रिंग, अतिवादी और चरमपंथी समूहों का सिर उठाना, सीरिया की जंग, सीरिया और इराक़ में इस्लामिक स्टेट की मारकाट और लूट खसोट ने यूरोप को गठबंधन सेना के साथ सीरिया के युद्ध में भाग लेते हुए इस झगड़े में दख़ल देना पड़ा.

युद्ध के परिणाम ने भी यूरोप को बुरी तरह प्रभावित किया है.

मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के युद्ध के परिणाम स्वरूप सबसे विकट और बड़ी समस्या ये आई कि लाखों बेघर, विस्थापित लोग शरणार्थी के रूप में यूरोप आने लगे.

शरणार्थियों के मुद्दे पर यूरोपीय संघ के घरेलू संबंधों में मतभेद महसूस किया जाने लगा है और संघ दो भागों में बंटा हुआ दिख रहा है.

इसके अलावा शरणार्थियों के कारण यूरोप की अर्थव्यवस्था पर अर्थिक बोझ बढ़ गया है.

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मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के गृह युद्ध ने यूरोप के सामने एक और समस्या पैदा की है. वो है, इस्लामी चरमपंथियों का यूरोप के भीतर हमले जिनमें बर्लिन, ब्रसल्स से होते हुए लंदन तक आम नागरिकों को निशाना बनाया गया और जानें भी लीं.

ब्रेक्सिट: यूरोपीय संघ की छाती पर तीर

जैसा कि हाल के दशक की घटनाओं से ज़ाहिर है कि आर्थिक अस्थिरता से अतिवादी और चरमपंथी विचारधाराओं को पनपने का मौक़ा मिलता है.

"जब हमारे पास ही खाने की कमी है तो हम अपना खाना किसी दुसरे के साथ क्यों साझा करें?"

इस कहावत का हालांकि हक़ीक़त से कोई संबंध नहीं है और कोई भी अपना खाना और धन किसी दूसरे के साथ साझा नहीं करता है.

लेकिन तब भी लोगों को बरगलाने के लिए राजनेताओं का एक बड़ा तबका इसका इस्तेमाल करता है.

पिछले पांच-छह सालों के दौरान ऐसे राजनेताओं ने यूरोप की कई जगहों पर सिर उठाये हैं.

वे लोगों से वादा करते हैं कि अगर सीमाओं को बंद कर दिया जाए और यूरोपीय संघ बनने से पहले वाली स्थिति में वापस चला जाए तो इसमें हम सब की भलाई है और इसी में हमारा राष्ट्रीय गौरव निहित है.

इसके अलावा राजनीतिक स्तर पर लगे घाव भी उत्प्रेरक का काम करते हैं जिससे पॉपुलिस्ट प्रकार के लीडरों को मनचाहा माहौल मिल जाता है.

इस समय पूरे यूरोप में यूनियन से अलग होने की वकालत करने वाले नेताओं के समर्थकों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है.

यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने के बाद अब एक भयानक दुःस्वप्न ने यूरोप की रातों की नींद हराम कर दी है.

यूरोपीय संघ से अलगाव के लिए उठ रही आवाज़ें एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने खड़ी है.

पुतिन
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रूस की समस्या

साल 2014 में आए क्रेमियन प्रायद्वीप का संकट वास्तव में यूरोप के हृदय में एक युद्ध के समान था.

रूस ने क्रीमिया को अपने कब्ज़े में लिया जबकि अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुसार क्रीमिया यूक्रेन का अंग था.

लेकिन अपने ख़िलाफ़ तमाम विश्व जनमत को ताक़ पर रख कर रूस ने अपने साथ क्रीमिया के विलय को वाजिब ठहराने के लिए 'जनमत संग्रह' कराया.

अपने संकटों से जूझ रहा यूरोप अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूस पर निर्भर है और इस वजह से क्रीमिया के मुद्दे पर वह कोई ठोस क़दम नहीं उठा पाया.

यूरोप की ख़ामोशी केवल कुछ रस्मी किस्म की बयानबाज़ी से आगे नहीं बढ़ पाई.

बाक़ी तमाम सियासी संबंधों के अलावा एक हक़ीक़त ये भी है कि रूस एक परमाणु ताक़त है और यूरोप के उद्योग और रोज़मर्रा की ज़िंदगी रूस के गैस पर निर्भर है.

अर्थात रूस के हाथ गैस की पाइपलाइन तलवार की तरह यूरोप के गले पर लटक रही है.

अब यूरोप को अपना यूनियन या गैस दोनों में से क्या चाहिए, ये फ़ैसला करना है.



ईरान: रिहाई की चाबी

ईरान की अर्थव्यवस्था का अपना एक अलग मॉडल है जिससे उन का ये ढांचा चलता है.

एक ताज़ा और बड़ा बाज़ार जिसको ईरान ने क्रांति के बाद 30 सालों में हासिल किया है.

इसके कुछ अलग कारण और कारक हैं. ईरान के गैस के ज़ख़ीरे तक यूरोप की पहुंच निस्संदेह यूरोप के हाथ में एक ऐसा तुरुप का पत्ता है जो खेल को पलट सकता है.

रूस के बाद विश्व में ईरान के पास सब से बड़ा गैस का ज़ख़ीरा है.

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि ईरान के पास इससे भी ज़्यादा गैस है जितना कि अनुमान लगाया गया है.

ईरान
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ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरू आयतुल्लाह ख़ामनेई के शीर्ष सलाहकार अली अकबर विलायती से मॉस्को में हाथ मिलाते पुतिन

तकनीकी कमी के कारण उनके बहुत बड़े संभावित गैस के भंडार का सही सही आकलन नहीं किया जा सका है.

इसके अलावा ईरान की अहम ज़रूरतें जैसे हवाई जहाज की ख़रीद, ऑटोमोबाइल और ऑटोमोबाइल टेक्नॉलॉजी की ख़रीद यूरोप से पूरी हो सकती है.

इससे यूरोप की आर्थिक हालत में चमक पैदा हो सकती है.



'क्रांति निर्यात' की नीति

मगर यूरोप की ये उम्मीद उस समय से धूमिल होती नज़र आने लगी है जब अमरीका ने ईरान के साथ परमाणु करार से बाहर आने के फ़ैसले पर दस्तखत किए.

ईरान की भूराजनीतिक स्थिति भी उसे ख़ास बना देती है. चाहे इस्लामी क्रांति से पहले की बात हो या क्रांति के बाद का ईरान, इस क्षेत्र की भूराजनीतिक स्थिति ईरान को को इस क्षेत्र का सबसे बड़ा खिलाड़ी बना देती है.

तेहरान की बहुआयामी राजनीति और उनकी सेनाओं का क्षेत्र में खुली और ढकी-छुपी गतिविधियाँ एक ऐसी हक़ीक़त है कि विश्व उसको देख रहा है.

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चाहे वह ईरान की 'क्रांति निर्यात' की नीति हो जिसके तहत वह हिज़बुल्लाह जैसे संगठन को आर्थिक सहायता देता है, या कुछ ईरानी अधिकारियों का इसराइल के ख़िलाफ़ कठोर अंदाज़ का बयान, या ईरान पर ये आरोप कि वह इसराइल की सीमा तक एक शिया इस्लामी घेराबंद बनाने का प्रयास कर रहा है, ऐसी तमाम बातों से विश्व समुदाय अवगत है.

इससे ये ज़ाहिर होता है कि ईरान अपनी स्थिति को सामने रखकर फ़ैसला लेने में सक्षम है.

अब इसका निदान केवल ये है कि जैसे अमरीका ईरान को सज़ा देने की रणनीति बनाए या फिर यूरोप की तरह किसी परिणाम तक पहुंचने के लिए वार्ता के मेज़ पर दोबारा बैठने की नीति पर यक़ीन रखे.


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यूरोप का भरोसा

यूरोप के राजनेता लगातार ये कहते आए हैं कि परमाणु हथियारों से लैस ईरान उनके लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा है.

ईरान यूरोप की सीमा के बहुत पास है और उन लोगों का ये भी मानना है कि ईरान के साथ परमाणु क़रार ने इस ख़तरे को टाल दिया है.

उनका ये भी मानना है कि केवल समझौते से ही इस पेचीदा और ख़तरनाक मुद्दे को हल किया जा सकता है और ये समझौता एक प्रस्थान बिंदु होगा आगे की दूसरी वार्ता के लिए, जैसे ईरान और इसराइल का संबंध.

ईरान के साथ समझौते को जारी रखने पर यूरोप का विश्वास इतना दृढ़ है कि अमरीका को नज़रअंदाज़ करते हुए ईरान के साथ कारोबारी संबंध को जारी रखने के नए रास्ते की तलाश की जा रही है ताकि ईरान को समझौते पर बने रहने के लिए पाबंद रखा जाए.

हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि ये कोशिश कितनी सफल होगी और उधर बहुत प्रयास के बाद भी यूरोपीय कंपनियां, संस्थान और बैंक ईरान में टिके रहने और अपनी गतिविधि को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं दिख रहीं हैं.

ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि जब ईरान पर अमरीकी आर्थिक प्रतिबंध पूर्ण रूप से लागू हो जाएंगे तो ईरान और यूरोप अपने इसी टूटे-फूटे, टेढ़े-मेढ़े संबंध आगे जारी रखेगा.

दोनों पक्ष की रणनीति एक ही प्रकार की और मिलती-जुलती दिखती है, अर्थात जब तक डोनल्ड ट्रंप हैं तब तक इसी तरह चलती रहे और अगले राष्ट्रपति चुनाव में जब ट्रंप हार जाएंगे तो फिर व्हॉइट हाउस में कोई रास्ता निकाला जाएगा.

अगर आख़िरी तीर निशाने पर लगा तो शायद उस समझौते की तारीख़ आ पहुंचेगी जिसे कूटनीति का फल कहा गया था.

और उसके बाद राजनीतिक घटनाक्रम यूरोप में, मध्य पूर्व और ईरान में भी आज के रास्ते से हट कर किसी और दिशा में चलना आरंभ कर चुका होगा.

मगर तब तक ईरान के आर्थिक संकट के कारण उसके घरेलू हालात इतने ख़राब हो जाएंगे और आवाम का असंतोष इतना बिगड़ जाएगा कि जो परिणाम सामने आएगा, अभी उसकी कल्पना भी करना संभव नहीं है.

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