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  • Jul 18 2015 2:08AM

कमला की संतानें पद्म से वंचित क्यों?

कमला की संतानें पद्म से वंचित क्यों?

कमला नदी का कमल से गहरा रिश्ता है और कमल का एक पर्याय ‘पद्म’ भी है. यह पद्म दिल्ली में खिलता है. मगर, आश्चर्य कि आज तक कमला की संतानों को एक भी पद्म अलंकरण नहीं मिला.

 
गंगा जब बिहार में सोन नद से मिल कर आगे बढ़ती है, तब उत्तर से आनेवाली तीन प्रमुख नदियां अपने शुद्ध जल से उसकी गोद भरती हैं- कोसी, कमला और बागमती. देवी-भक्त लोग इन तीनों को साधारण नदी न मान कर क्रमश: महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती मानते हैं, जिनकी यशोगाथा ‘दुर्गासप्तशती’ कहती है. शुद्ध जल  इसलिए कहा कि गंगा-यमुना आदि सारी पवित्र नदियों का जल प्रदूषित हो चुका है, मगर इन नदियों का जल गंगा से मिलने तक शुद्ध ही रहता है. कोसी का महाकाली रूप सभी जानते हैं. कब वह क्रुद्ध होकर संहार करने लगे, कहा नहीं जा सकता. चीन की ह्वांगहो नदी की तरह, भारत की कोसी नदी अपनी विध्वंसलीलाओं के कारण कुख्यात है. वर्षा ऋतु में जब यह उफनती है, तो अपनी चपेट में गांव के गांव गाय-भैंसों के झुंड और फूस की छप्पर पर गुहार लगाते स्त्री-पुरुषों और बच्चों को लील जाती है. एक लोकगीत भी है-
 
जकरो दुअरिया हे रानो, कोसी बहे धार, सेहो कैसे सूते निचिंत!
कोसी नदी को शांत करने के लिए उन जनपदों की स्त्रियां उफनती कोसी में सिंदूर फेंकने लगती हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि कुमारी कन्या होने के कारण कोसी सिंदूर से चिढ़ कर पीछे हट जायेंगी.
 
बागमती उस अंचल की स्वाभाविक नदी है, क्योंकि वह सरस्वती की तरह जिधर बही है, गांव के गांव विद्वानों से भर गये हैं. ‘वाराह पुराण’ कहता है कि इसका जल गंगाजल से भी पवित्र है, क्योंकि इसकी उत्पत्ति भगवान शंकर के (शैलेश्वर) शरीर से हुई है. इसीलिए नेपाल राजवंश के लोगों का दाह-संस्कार बागमती तट पर ही होता है. ‘पुरुष-परीक्षा’ में महाकवि विद्यापति बताते हैं कि मिथिला-नरेश राजा भव सिंह ने हायाघाट के पास बागमती के तट पर शिव का ध्यान करते हुए देह-त्याग किया था. विद्यापति का गांव बिसफी भी बागमती के तट पर ही है. इसी तरह, महर्षि याज्ञवल्क्य के आश्रम के लिए प्रसिद्ध ‘जगवन’ और मैथिली गद्य साहित्य के जनक ज्योतिरीश्वर ठाकुर का गांव ‘पाली’ भी इसी नदी के तट पर है. इसलिए लोग ठीक ही कहते हैं कि विद्या की देवी सरस्वती इसी बागमती की धार में बह कर मिथिला के गांवों में आयी थी.
 
कोसी के बाद जिस नदी का सबसे ज्यादा रुतबा है, वह है कमला नदी. यह नाम कमल पुष्प पर निवास करनेवाली लक्ष्मी का है- कमला कमल-दल-निवासिनी. कहते हैं कि कमला जिधर अपनी बाढ़ की चुनरी फैलाती है, उधर धरती लहलहा उठती है. इसकी उत्पत्ति नेपाल में महाभारत पर्वत-श्रृंखला से होती है और धनुषा के बाद जयनगर में प्रवेश करती है. मिथिलांचल में, गत दो सौ वर्षो में यह पश्चिम से लगभग 25 मील पूरब आ गयी है. इसी क्रम में, जब यह जीबछ नदी से मिली, तो इसका नाम जीबछ-कमला हो गया. जब यह बलान से मिली, तो कमला-बलान कहलायी. वहीं पर प्रसिद्ध कंदर्पीघाट है, जिसे मिथिला की हल्दीघाटी कहा जाता है. सन् 1753 में वहां मिथिला-नरेश नरेंद्र सिंह और बंगाल के नवाब अलीवर्दी खां के बीच भयंकर युद्ध हुआ था, जिसमें मिथिला-नरेश की जीत हुई थी. कमला तट की वह जीत आज भी कंदर्पीघाट बड़े गर्व से आते-जाते लोगों को सुनाना चाहता है, मगर किसी को सुनने की फुरसत ही नहीं. सब परेशान हैं अपनी-अपनी चिंताओं से. कमला कहने के लिए ही वहां सुख-समृद्धि की देवी हैं. वस्तुत: नदी के रूप में वह जिधर जाती हैं, उधर रेत भरती जाती हैं. पूरा मधुबनी जनपद कमला नदी की रेत से पटा पड़ा है.
 
कमला जिस अंचल से होकर गुजरती है, वह विद्या और कला का केंद्र जरूर है, मगर भौतिक समृद्धि का कतई नहीं, यह सभी जानते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में जब नरेंद्र मोदीजी मिथिलांचल में चुनाव-प्रचार करने आये थे, तब यही बात कही थी कि मिथिला की प्रतिभा और गुजरात की पूंजी मिल कर नया इतिहास बनायेगी. वह बात अब स्वयं इतिहास हो गयी, क्योंकि उसके बाद किसी को वह याद भी नहीं रही, सिर्फ उन श्रोताओं को छोड़ कर, जिनके मन में उस एक वाक्य ने फिर से संघर्ष करने का हौसला भर दिया था. उन लोगों ने जिस उत्साह से पाग पहनाया था, वह भी अपने भाग्य को रो रहा होगा. यही होता है. सर्वे गुणा: कंचनमाश्रयन्ति.. यदि आपके पास पूंजी है, तो प्रतिभाएं हाथ जोड़ कर आपके सामने खड़ी रहेंगी.
 
कमला नदी का कमल से गहरा रिश्ता है और कमल का एक पर्याय ‘पद्म’ भी है. यह पद्म दिल्ली में खिलता है. मगर आश्चर्य कि आज तक कमला की संतानों को एक भी पद्म अलंकरण नहीं मिला. मैं भाषा और साहित्य के दायरे में रह कर बात कर रहा हूं. मुङो मालूम है कि मिथिला चित्रकला की कई विभूतियों के साथ-साथ संगीत में भी कुछ विभूतियों को पद्म अलंकरण मिल चुका है. मगर जिस मैथिली को संविधान में राष्ट्रीय भाषा का स्थान मिला हुआ है, उसके एक भी रचनाकार को इस योग्य क्यों नहीं पाया गया?
थोड़ा पीछे चलते हैं, तो इसी अंचल के एक गांव के थे डॉ सुभद्र झा, जिनका 14 भाषाओं पर अधिकार था और जिन्होंने जर्मनी में भाषा विज्ञान पर जो नया काम किया था, उस पर उन्हें वहां डी. लिट. की डिग्री मिली थी. भाषा-विज्ञान में उनका स्थान वही था, जो सुनीति कुमार चटर्जी का था. मगर सुनीति बाबू को पद्मभूषण से अलंकृत किया गया और सुभद्र झा मखान की माला पहने ही दुनिया से विदा हो गये.
 
हमारे सामने ही आचार्य सीताराम झा, छेदी झा ‘द्विजवर’, कविशेखर बदरीनाथ झा, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, कविचूड़ामणि काशीकांत मिश्र ‘मधुप’, ईशनाथ झा, वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ (नागाजरुन), सुरेंद्र झा ‘सुमन’, कांचीनाथ झा ‘किरण’, आरसी प्रसाद सिंह, मणिपद्म, मायानंद मिश्र, मरकडेय प्रवासी जैसे बड़े रचनाकार तिरोहित हो गये. निश्चय ही, उन्हें पद्म अलंकरण मिलने से इस अलंकरण की प्रतिष्ठा बढ़ती. ऐसा क्यों होता है कि इस अलंकरण के दाताओं का उत्साह क्रिकेट के बल्लों और तबले-घुंघरुओं को पद्म बांटते-बांटते इतना शिथिल पड़ जाता है कि जुझारू कलमों तक जाते-जाते वह मुरझा जाता है. यह मैथिली भाषा के लिए नहीं, पद्म अलंकरण के लिए कलंक की बात है कि उसने पूरी की पूरी एक समृद्ध राष्ट्रीय भाषा को नजर अंदाज कर दिया! आज भी, इस भाषा में गोविंद झा, चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’, चंद्रभानु सिंह, कीर्तिनारायण मिश्र, भीमनाथ झा जैसे अनेक वरेण्य साहित्यकार हैं, जो कम-से-कम पद्मश्री के हकदार तो हैं ही. क्या आशा की जाये कि अब तक मैथिली के साथ जो अन्यायपूर्ण उपेक्षा हुई है, उसे सुधारने पर ‘डिजिटल इंडिया’ विचार करेगा?
 
डॉ बुद्धिनाथ मिश्र
वरिष्ठ साहित्यकार
buddhinathji@gmail.com
 
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