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Classical

  • Feb 13 2018 11:58AM

'भारत कोकिला' सरोजनी नायडू के जन्मदिन पर विशेष : यहां रोशनी बहुत तेज है...

'भारत कोकिला' सरोजनी नायडू के जन्मदिन पर विशेष : यहां रोशनी बहुत तेज है...

 

-ध्रुव गुप्त-  

 
'भारत कोकिला' के नाम से विख्यात भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अप्रतिम योद्धा स्वर्गीय सरोजनी नायडू अपनी सांगठनिक क्षमता, ओजपूर्ण वाणी और देश की आज़ादी के लिए अपने प्रयासों की वज़ह से अपने दौर की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला रही है. श्रीमती एनी बेसेंट की मित्र और महात्मा गांधी की इस प्रिय शिष्या ने अपना सारा जीवन देश के लिए अर्पण कर दिया था.

अपनी लोकप्रियता और प्रतिभा के कारण वे 1925 में कानपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन की  अध्यक्ष बनीं. 1932 में उन्हें भारत की प्रतिनिधि बनाकर दक्षिण अफ्रीका भेजा गया. भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद वे उत्तरप्रदेश की पहली राज्यपाल बनीं. राजनीति के अलावा सरोजिनी नायडू के जीवन का एक और पक्ष भी रहा था जो आज भी लोगों की नज़र से ओझल है. बहुत कम लोगों को पता है कि सरोजनी नायडू अपने समय की विख्यात कवयित्री भी थीं जिनकी कविताओं के अनुवाद कई भाषाओं में हुए हैं.

मात्र तेरह साल की आयु में उन्होंने 'लेडी ऑफ दी लेक' नाम से अपनी पहली कविता लिखी जो प्रकाशित भी हुई और चर्चित भी. उच्च शिक्षा के लिए जब वे इंग्लैंड गयीं तो कुछ अंग्रेजी के कवियों के प्रभाव में उनकी कविताई परवान चढ़ी. 'गोल्डन थ्रैशोल्ड' उनकी कविताओं का पहला संग्रह था. बाद के दो और कविता संकलनों -  'बर्ड ऑफ टाइम' तथा 'ब्रोकन विंग' ने उन्हें एक चर्चित कवयित्री बना दिया. उनकी कविताओं के फ्रेंच और जर्मन सहित कई भाषाओं में अनुवाद हुए. उनके जन्मदिन (13 फरवरी) पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि, मेरे द्वारा अनुदित उनकी एक छोटी, मगर बहुत प्यारी कविता के साथ !

ओ मेरे प्यार
मूंद दो अथाह आनंद से थकी
और बुझी मेरी आंखों को
यहां रोशनी बहुत तेज है
खामोश कर दो
गीत गाते-गाते थक चुके 
मेरे अधरों को
अपने एक गहरे चुंबन से
बारिश में भींगे
गीले फूल की तरह
वेदना और बोझ से झुकी 
मेरी आत्मा को
कहां पनाह मिल पाएगा
अगर सामने तेरा चेहरा न हो !
 

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