राजनीति सुधरेगी?

Published at :05 Jan 2014 6:03 AM (IST)
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राजनीति सुधरेगी?

– हरिवंश – ‘आप’ (आम आदमी पार्टी) के उदय के बाद भी हमारे नेता समझने को तैयार नहीं हैं कि लोग उनके अहंकार, चाल-चलन, बोल, फूहड़ता और अकड़ से नफरत करने लगे हैं. कांग्रेस या अन्य दलों ने गांधी को छोड़ मैकियावेली को अपना लिया है. मैकियावेली की दृष्टि में धूर्तता, छल-कपट, शासक के श्रेष्ठतम […]

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– हरिवंश –

‘आप’ (आम आदमी पार्टी) के उदय के बाद भी हमारे नेता समझने को तैयार नहीं हैं कि लोग उनके अहंकार, चाल-चलन, बोल, फूहड़ता और अकड़ से नफरत करने लगे हैं. कांग्रेस या अन्य दलों ने गांधी को छोड़ मैकियावेली को अपना लिया है. मैकियावेली की दृष्टि में धूर्तता, छल-कपट, शासक के श्रेष्ठतम गुण या आभूषण हैं. परंतु गांधी ने मूल्यों के स्तर पर मैकियावेली को चुनौती दी. प्रश्न है कि क्या बदलती हवा में हमारी राजनीति गांधी की राह पकड़ेगी और मूल्यों की ओर लौटेगी?

मुलायम-लालू संवाद

दंगों से प्रभावित लोगों के राहत शिविर देखने लालू प्रसाद, मुजफ्फरनगर गये. मुलायम सिंह उन पर बरस पड़े. उम्र और शब्द का संयम भी न रहा. उन्हें चाटुकार कहा. कांग्रेस के तलवे चाटनेवाला कहा.

हालांकि लालू प्रसाद इसी तरह की भाषा का प्रयोग, उसी दिन अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ कर चुके थे, पर मुलायम सिंह के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा था. लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुलायम सिंह फूट पड़े. गुस्से में कहा कि जेल से छूट कर लालू प्रसाद यहां भागे-भागे आ रहे हैं.

दरअसल, हम इस विस्तार में नहीं जाते कि किसने क्या कहा? पर हमारे राजनेताओं या ऐसे जनाधारवाले नेताओं को यह बात कब समझ में आयेगी कि राजनीति में मर्यादा, शुचिता और शिष्टता की एक जगह है? लोकतंत्र में विरोधियों के प्रति भी संयम, धैर्य और आदर की जरूरत है.

आप विचारों के विरोधी हों, पर विरोधियों के प्रति संयम खो देंगे, फूहड़-शर्मनाक शब्दों का इस्तेमाल करेंगे, तो वैसा ही व्यवहार आपके खिलाफ भी होगा. फिर जंगलराज होगा. लोकतंत्र में सबकी जिम्मेदारी है कि वे मिल कर, राजनीति की गरिमा को ऊपर उठायें. ‘आप’ (आम आदमी पार्टी) के उदय के बाद भी नेता समझने को तैयार नहीं हैं कि लोग उनके अहंकार, चाल-चलन, बोल, फूहड़ता और अकड़ से नफरत करने लगे हैं. आज सार्वजनिक जीवन में छल, प्रपंच, उजड्डता, असभ्य और अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल, धूर्तता और कुटिलता जैसी चीजें अवगुण न होकर गुण के रूप में पूजित हैं.

इमरजेंसी में रिहायशी इलाकों में बुलडोजर चलाने की सूचनाएं आयी थीं. वही स्थिति मुजफ्फरनगर राहत शिविरों में दोहरायी गयी. आरोप है कि दंगों से प्रभावित ये लोग, सरकारी लाभ ले चुके थे.

और दोबारा लाभ के लोभ में शिविरों में टिके थे. यह सच हो सकता है, पर लोगों को दान पर जीना, लोभी होना किसने सिखाया? प्रसंग जो भी हो, पर सार्वजनिक जीवन के बड़े मापदंड तय करनेवाले अगुवा सड़क छाप व्यवहार करते हैं? खुद मुलायम सिंह अपने कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि जो सामाजिक बदलाव हो रहे हैं, उनसे सीखिए. अब गुंडई नहीं चलेगी. ‘आप’ को देखिए. जनता गुंडई नहीं पसंद करती. पर देश के बड़े नेता, जो प्रधानमंत्री होने की दौड़ में हैं, उनकी सार्वजनिक बातचीत इतनी फूहड़, अश्लील और इस स्तर की हो, तो वे देश-समाज को क्या दिशा दे पायेंगे?

सादगी का दौर!

सार्वजनिक जीवन में सादगी सीखने को कोई तैयार नहीं है. पर नये नेताओं पर इसका असर है. गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर सत्तारूढ़ होने के बाद से ही बहुत सामान्य तौर-तरीके से रहते हैं.

हवाई जहाज की इकानॉमी क्लास से सफर करते हैं. अपनी छोटी मारुति गाड़ी को खुद चला कर ऑफिस आते-जाते हैं. इससे भी बड़ी चीज, इसका कभी प्रचार नहीं किया. यह ‘आप’ के उदय से पहले की घटना है. वह आइआइटी से पढ़े-लिखे हैं. उन्होंने सत्ता संभालते ही पेट्रोल की कीमतों से लेकर अनेक चीजों में काफी सुधार किये. भाजपा में रहते हुए कैथोलिक चर्च से सपोर्ट पाया. पर उनकी सादगी-काम, पर देश की निगाह तब गयी, जब दिल्ली में ‘आप’ का उदय हुआ. ताजा सूचना है कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इसी रास्ते पर हैं.

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार तो आदर्श उदाहरण हैं. ‘आप’ के जन्मने के बहुत पहले से. पर ‘आप’ के उदय ने सार्वजनिक जीवन में सादगी-शिष्टता की संस्कृति को फिर राष्ट्रीय बहस में प्रासंगिक कर दिया है. यह सिर्फ भारतीय हवा नहीं है. 28.12.2013 को चीन के राष्ट्रपति सी जिनपिंग चीन के एक पारंपरिक रेस्त्रां में लाइन में खड़े हो गये. फिर सामान्य लंच का ऑर्डर दिया.

बिना किसी पूर्व सूचना के दोपहर बाद वह वहां पहुंचे थे. लगभग 3.40 डॉलर (यानी 21 यूआन) का लंच किया. उनके वहां रहने तक कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी. होटल मैनेजर ने बताया कि इस रेस्त्रां में आनेजानेवाले बिना रोक-टोक के आ-जा सकते थे. बहुत से लोगों ने जिनपिंग के साथ फोटो खिंचवायी और सोशल मीडिया पर डाली. मार्च, 2013 में वह चीन के राष्ट्रपति बने, तब से लगातार सामान्य लोगों के संपर्क में हैं. अप्रैल मे खबर आयी थी कि बीजिंग में वह टैक्सी में घूमे (हालांकि बाद में चीन सरकार ने इसका खंडन किया). आज चीन के राष्ट्रपति, अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा के समकक्ष माने जाते हैं. उतने ही ताकतवर, उतने ही प्रभावशाली.

एक तरफ यह दृश्य है. दूसरी तरफ भारत के नेताओं को देखिए. सुरक्षा उनके लिए स्टेटस सिंबल है. फिजूलखर्ची, शानोशौकत से रहना वगैरह जन्मसिद्ध अधिकार. अभी महाराष्ट्र से खबर आयी (28.12.2013 को) कि वहां 2010 से 2013 के बीच, मंत्रियों के बंगलों की सजावट, उनके गार्डेन का सौंदर्य बढ़ाने, खूबसूरत फर्नीचर व परदे लगाने वगैरह पर 21 करोड़ रुपये खर्च किये गये. इसमें से 15 करोड़ का खर्च, 2010 से 2011 के बीच का है. दिल्ली के लुटिएंस जोन स्थित बड़े बंगलों के रखरखाव पर तो अब अकल्पित खर्च हो गये हैं. यह सब गांधी के उस देश में हो रहा है, जहां उन्होंने कल्पना की थी कि आजाद भारत के मंत्री सामान्य घरों में रहेंगे. सामान्य नागरिक की तरह रहेंगे. पर भारत का शासकवर्ग यह सब भूल गया. अब नयी पीढ़ी या लोग इस शानोशौकत, रईसी और सत्तामद से नफरत करते हैं, कम से कम अपने हित में नेताओं को यह जान लेना चाहिए.

अनुशासन

बगैर अनुशासन न जीवन में कुछ होता है, और न परिवार, समाज या देश में. सिंगापुर एक कछार, दलदल और अति पिछड़े द्वीप से, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में कैसे तब्दील हो गया? अनुशासन, कर्म, विजन और देशप्रेम की पूंजी के बल. ऐसा मुल्क जिसके पास कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं, पर दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है.

इसी सिंगापुर में एक वारदात हुई. 08.12.2013 को. एक बस का भारतीय इलाके (लिटिल इंडिया के नाम से मशहूर) में एक्सीडेंट हुआ. एक व्यक्ति की मौत हो गयी. इस लिटिल इंडिया में दक्षिण एशिया के देशों के अनेक कामगार रहते हैं. इसके बाद दंगा हो गया. सिंगापुर के 40 साल के इतिहास में यह पहला भीषण दंगा था. सिंगापुर ने तुरंत कार्रवाई की. 56 भारतीयों और बांग्लादेशियों को देश से बाहर निकाला. सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने कहा, ऐसे दंगे अक्षम्य हैं. कई लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हुई है. होगी. वहां के प्रधानमंत्री ली सीन लुंग ने कहा है कि जो बाहरी यहां रह रहे हैं, उन्हें हमारी सलाह है कि हमारे कानूनों का कड़ाई से पालन करें.

आप सोचिए भारत में आतंकवाद है. खुलेआम विदेशों से आकर लोग रहते हैं. उपद्रव करते हैं. झगड़े करते हैं. दंगे फैलाये जाते हैं. अपहरण होते हैं. पर हम क्या कार्रवाई करते हैं? इंटेलिजेंस सूत्रों से खबर आयी है कि आतंकवादी भटकल को छुड़ाने के लिए इंडियन मुजाहिदीन भारतीय यात्री विमान का अपहरण करने की योजना पर काम कर रहा है. उधर सूरत में परमाणु बम विस्फोट की योजना का खुलासा भी मुजाहिदीन के एक आतंकवादी ने किया है. दो दिन पहले की खबर है कि चीन ने पाकिस्तान को 6.5 बिलियन डॉलर की पूंजी परमाणु अस्त्र वगैरह विकसित करने के लिए दी है. सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार चेता रहे हैं कि भारत घिर गया है. पर भारत सरकार का पिछले दस वर्षों में बाहरी-आंतरिक सुरक्षा पर क्या चेहरा काम कर रहा है? विकास और प्रगति के लिए बाहरी या भीतरी कानून-व्यवस्था का सर्वश्रेष्ठ होना अनिवार्य है. 2014 के चुनावों का पहला सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि यह मुल्क सुरक्षित रहेगा या नहीं?

‘आप’ की सीमा

‘आप’ का उदय ही नैतिक भूमि से है. इसलिए वह नैतिकता, मर्यादा, श्रेष्ठ मूल्यों, अनुकरणीय आचार संहिता और स्वानुशासन की चौहद्दी में बंधी है. कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया कि अरविंद केजरीवाल को बिना बहुमत साबित किये नीतिगत फैसले नहीं करने चाहिए थे. मसलन, बिजली दरों का पुनर्निर्धारण या दिल्ली के हर घर को मुफ्त पानी देने का निर्णय. अंतत: बहुमत प्राप्त सरकार ही नीति बना सकती है. बड़े फैसले कर सकती है. यह तर्क उठानेवालों ने यह भी कहा कि अगर तीन महीने में बिजली पर दो सौ करोड़ से ढाई सौ करोड़ के बीच सब्सिडी देते हैं, तो साल भर में यह राशि आठ सौ करोड़ से हजार करोड़ के बीच होगी. बिजली दर में कटौती के साथ-साथ सरकार अगर यह भी बताती कि यह पैसे कहां से आयेंगे, तो इसका गहरा असर होता. एक देशभक्त सरकार से तो यह भी अपेक्षा है कि वह बड़ी राहत के पीछे की अर्थनीति को भी साफ करे, ताकि देश या समाज दिवालियापन की ओर न बढ़ जाये? याद रखिए, देश में 1991 का अर्थसंकट, लोक-लुभावन नीतियों और नारों से चुनाव जीतने की जिस राजनीति पर कांग्रेस पार्टी 1971-72 के बाद चली, उसका परिणाम था. तब भारत, दुनिया के बाजार में कंगाल होते-होते बचा. अगर हर चीज मुफ्त और राहत के तौर पर मिलने लगे, तो क्या वह अर्थव्यवस्था टिकेगी? ‘आप’ को यह देर-सबेर साफ करना होगा. ‘आप’ से लोगों को यह अपेक्षा है. ‘आप’ का सर्वश्रेष्ठ पक्ष है कि वह बिल्कुल सादगी से जनता के बीच रह कर काम करना चाहती हैं. पर राज-काज का चलना, अर्थनीतियों पर टिका है. किन अर्थनीतियों के बल ‘आप’ मुफ्तखोरी की अर्थव्यवस्था को सपोर्ट कर पायेगी, यह देश को भी जानना जरूरी है? नहीं तो अचानक किसी दिन देश ही संकट में होगा.

गांधी की नीति पर जो चलते हैं, उनसे अपेक्षा होती है कि स्वत: अपनी बात-कर्म में तालमेल रखेंगे. कांग्रेस या अन्य दलों ने गांधी को छोड़ मैकियावेली को अपना लिया. मैकियावेली का आदर्श है, ‘‘यह सिखाना कि वह भला आदमी कैसे न रहे?’’ इसमें धूर्तता, छल-कपट, शासक के श्रेष्ठतम गुण या आभूषण हैं. परंतु गांधी ने मूल्यों के स्तर पर पश्चिमी विचारक मैकियावेली को चुनौती दी. दोनों दो ध्रुव हैं. दो स्तर पर विरोधी मूल्य प्रणालियां. विचारक गणेश मंत्री अपने एक लेख में उल्लेख कर गये- ‘‘गांधी और मैकियावेली! दो इतिहास पुरुष. लेकिन दो विपरीत ध्रुव भी, दो परस्पर विरोधी मूल्य प्रणालियां. जैसे पुराण और जीवन में सत्-असत्, दैवी-आसुरी प्रवृत्तियों का सतत् संघर्ष रहा है, वैसे ही राजनीतिक चिंतन और कर्म में भी गांधी-मैकियावेली का शाश्वत संघर्ष रहा है.’’

आज ‘आप’ में गांधी के रास्ते की झलक मिलती है. इसलिए ‘आप’ को स्वत: पारदर्शी तरीके से चलना होगा. मसलन अरविंद केजरीवाल ने विश्वास मत के बाद कहा (प्रत्युत्तर में) कि शीला दीक्षित के खिलाफ भाजपा नेता डॉ हर्षवर्धन आरोप लायें, जांच व कार्रवाई होगी. लेकिन अरविंद केजरीवाल को यह याद रखना होगा कि उन्होंने व उनकी टीम ने शीला दीक्षित व उनकी सरकार पर गंभीर आरोप लगाये थे. अगर वह ‘आप’ की राजनीति में ‘सच’ के रास्ते पर हैं, तो उनकी अग्नि परीक्षा है कि वे स्वत: अपने पुराने आरोपों-वायदों को याद कर, उस पर चलेंगे. किसी को उन्हें याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. ‘आप’ इस रास्ते को न छोड़े, इसी में नयी राजनीति के उदय की संभावना है. अन्यथा ‘आप’ भी भीड़ में शरीक होगी व उस पर सबसे गंभीर आरोप यह होगा कि वह कांग्रेस की ‘बी टीम’ है.

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