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RIP Arun Jaitley: जितने अच्छे राजनेता... उतने ही धारदार वकील, ये केस रहे सबसे चर्चित

Updated at : 24 Aug 2019 7:13 PM (IST)
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RIP Arun Jaitley: जितने अच्छे राजनेता... उतने ही धारदार वकील, ये केस रहे सबसे चर्चित

भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शनिवार को एम्स में आखिरी सांस ली. उनका जीवन उपलब्धियों से भरा रहा. श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ग्रैजुएट और लॉ फैकल्टी से कानून की पढ़ाई करनेवाले जेटली की गिनती प्रतिभाशाली छात्रों के तौर पर होती थी. LL.B. पास करने के बाद सन् 1977 […]

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भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शनिवार को एम्स में आखिरी सांस ली. उनका जीवन उपलब्धियों से भरा रहा. श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ग्रैजुएट और लॉ फैकल्टी से कानून की पढ़ाई करनेवाले जेटली की गिनती प्रतिभाशाली छात्रों के तौर पर होती थी.

LL.B. पास करने के बाद सन् 1977 में अरुण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी. 1980 के दशक में जेटली ने सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाई कोर्ट में महत्वपूर्ण केस लड़े. 1990 में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट ने सीनियर वकील का दर्जा दिया.

विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में उन्हें एडिशनल सॉलिसिटर जनरल का पद मिला. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर दाग लगानेवाले बोफोर्स घोटाला में जेटली ने 1989 में उस केस से संबंधित पेपरवर्क किया था.

अरुण जेटली ने कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों के लिए कोर्ट रूम में दलीलें दी हैं. उनके क्लाइंट्स की लिस्ट में जनता दल के नेता शरद यादव से लेकर कांग्रेस नेता माधव राव सिंधिया और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी तक रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अरुण जेटली ने ही सोहराबुद्दीन एनकाउंटर में अमित शाह के केस और 2002 गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की तरफ से केस लड़ रहे वकीलों का मार्गदर्शन किया था.

अरुण जेटली ने कोर्ट में दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए भी दलीलें दी हैं. पेप्सीको बनाम कोका कोला केस में उन्होंने पेप्सी की तरफ से केस लड़ा था. वहीं, साल 2004 में वह कोकाकोला कंपनी की तरफ से राजस्थान हाईकोर्ट में पेश हुए. इसी तरह की कई अन्य कंपनियों के लिए भी वह कोर्ट रूम में गये.

अरुण जेटली ने कानून और करंट अफेयर्स पर कई लेख लिखे हैं. इंडो-ब्रिटिश लीगल फोरम के सामने उन्होंने भारत में भ्रष्टाचार और अपराध पर एक पेपर भी पेश किया था. भारत सरकार ने उन्हें जून 1998 में संयुक्त राष्ट्र भेजा.

संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली के इस सत्र में ड्रग्स और मनी लॉन्ड्रिंग कानून से संबंधित डिक्लेरेशन को मंजूरी मिली थी. साल 2009 में उन्होंने वकालत के पेशे से खुद को अलग कर लिया.

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