पंडित नेहरू की संसदीय सीट रहे फूलपुर में कांग्रेस के लिए पांव जमाना आसान नहीं

Updated at : 05 May 2019 3:00 PM (IST)
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पंडित नेहरू की संसदीय सीट रहे फूलपुर में कांग्रेस के लिए पांव जमाना आसान नहीं

प्रयागराज:स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कर्मभूमि रही फूलपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़़ रही है. देश के राजनीतिक नक्शे में खास जगह रखने वाले यूपी की फूलपुर संसदीय सीट पर इस बार भी मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के बीच है. चुनावी मैदान में कांग्रेस […]

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प्रयागराज:स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कर्मभूमि रही फूलपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़़ रही है. देश के राजनीतिक नक्शे में खास जगह रखने वाले यूपी की फूलपुर संसदीय सीट पर इस बार भी मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के बीच है. चुनावी मैदान में कांग्रेस कहीं नजर नहीं आ रही है. फूलपुर को कभी वीआईपी सीट कहा जाता था क्योंकि आजादी के बाद पहली बार 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में पंडित जवाहरलाल नेहरू फूलपुर संसदीय सीट से जीते थे. फिर उन्होंने 1957 और 1962 में भी इस सीट पर जीत दर्ज की.

2009 के चुनाव में फूलपुर से बसपा के पंडित कपिल मुनि करवरिया चुनाव जीते थे. 2004 में सपा के अतीक अहमद और 1999 में सपा के ही धर्मराज पटेल ने यह सीट जीती थी. बहरहाल, वर्ष 2014 के आम चुनाव में मोदी लहर के चलते पहली बार भाजपा ने इस सीट पर कब्जा किया. तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य फूलपुर सीट से विजयी रहे. उनके इस्तीफे के बाद खाली हुई यह सीट 2018 में हुए उपचुनाव में सपा के पास चली गई.

फूलपुर तहसील के शुक्लाना मोहल्ले के निवासी राम गोपाल मौर्य का कहना है कि मुख्य लड़ाई भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के बीच है. कांग्रेस का कोई नाम लेने वाला नहीं है. उन्होंने कहा कि फूलपुर में यादव और मुस्लिमों की संख्या अधिक है. इनमें से कुछ लोग तो जरूर मोदी सरकार को वोट करेंगे क्योंकि इतनी बिजली और अन्य सुविधाएं पहले कभी नहीं मिलीं. फूलपुर में केंद्र की योजनाओं के तहत लाभ देने में कथित भेदभाव को लेकर स्थानीय लोगों खासकर अनुसूचित जाति के लोगों में आक्रोश है.

अनुसूचित जाति के 46 परिवारों की बस्ती वाले वार्ड संख्या दो के निवासी गुलाब चंद गौतम का आरोप है कि इस बस्ती के लगभग सभी लोग भाजपा को वोट देते हैं फिर भी केंद्र की योजनाओं के लाभ से इन्हें दूरा रखा गया. इस हरिजन बस्ती में एक-दो परिवारों को छोड़कर सभी भूमिहीन किसान हैं और सभी के घर की महिलाएं बीड़ी बनाने का काम करती हैं.

झूंसी के कोहना गांव के निवासी अजय त्रिपाठी का कहना है कि यह चुनाव बहुत हद तक जातिवाद पर आधारित है. बहरहाल, मुख्य लड़ाई भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के बीच है इसलिए कांग्रेस को वोट दे कर कोई अपना वोट खराब नहीं करना चाहता. फूलपुर तहसील के मलाका गहरपुर गांव के निवासी रामलाल विश्वकर्मा ने कहा कि अभी तक राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने यहां प्रचार नहीं किया है. इससे लोगों में पार्टी को लेकर कोई उत्साह नहीं है.

उन्होंने आरोप लगाया कि गांव का प्रधान बसपा से है और सपा से गठबंधन के बाद उन्होंने गांव के उन सभी लोगों के नाम लाभार्थियों की सूची से कटवा दिए जो भाजपा समर्थक हैं. नेहरू की वजह से वीआईपी सीट कहलाने वाले फूलपुर संसदीय क्षेत्र से, 1964 में नेहरू के निधन के बाद उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने फूलपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा और सांसद बनीं.आखिरी बार 1984 में फूलपुर सीट से कांग्रेस के टिकट पर रामपूजन पटेल चुनाव जीते थे. लेकिन रामपूजन पटेल बाद में जनता दल में शामिल हो गए.

1996 से 2004 के बीच हुए चार लोकसभा चुनावों में इस सीट से सपा के उम्मीदवार जीतते रहे.2018 के उपुचनाव में भी यहां से सपा ही जीती. फूलपुर में सबसे बड़ी आबादी पटेलों की हैं और यादवों एवं मुस्लिमों की संख्या भी इसके आस-पास ही है. सपा-बसपा गठबंधन ने पंधारी यादव को अपना प्रत्याशी बनाया है वहीं भाजपा ने केशरी देवी पटेल को अपना प्रत्याशी बनाया है.

कांग्रेस के प्रत्याशी पंकज निरंजन पटेल हैं. 1984 से यह सीट कांग्रेस की पहुंच से दूर हो गई. बीते 35 साल से इस संसदीय सीट को जीतने के लिए जी..तोड़ कोशिश कर रही कांग्रेस इस बार भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती. इस सीट पर 12 मई को मतदान होगा.

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