12 साल से कम उम्र की बच्चियों से रेप पर मौत की सजा, विधेयक को लोकसभा की मंजूरी

Updated at : 30 Jul 2018 9:23 PM (IST)
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12 साल से कम उम्र की बच्चियों से रेप पर मौत की सजा, विधेयक को लोकसभा की मंजूरी

नयी दिल्ली : देश में 12 साल से कम आयु की बच्चियों से बलात्कार के अपराध में मृत्युदंड तक की सजा देने समेत 16 साल से कम आयु की लड़कियों से दुष्कर्म के अपराध में दोषियों को सख्त सजा के प्रावधान वाले एक विधेयक को सोमवार को लोकसभा ने मंजूरी दे दी. लोकसभा ने विधेयक […]

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नयी दिल्ली : देश में 12 साल से कम आयु की बच्चियों से बलात्कार के अपराध में मृत्युदंड तक की सजा देने समेत 16 साल से कम आयु की लड़कियों से दुष्कर्म के अपराध में दोषियों को सख्त सजा के प्रावधान वाले एक विधेयक को सोमवार को लोकसभा ने मंजूरी दे दी.

लोकसभा ने विधेयक पर कुछ सदस्यों को संशोधनों को खारिज करते हुए दंड विधि संशोधन विधेयक 2018 को ध्वनिमत से पारित कर दिया. इसमें भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1972, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 का और संशोधन किया गया है. यह विधेयक इस संबंध में 21 अप्रैल को लागू दंड विधि संशोधन अध्यादेश 2018 की जगह लेगा.

विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि पिछले कुछ समय में बलात्कार की अनेक घटनाएं सामने आई हैं जिसने देश के मानस को झकझोर दिया है. ऐसे में ऐसे जघन्य अपराध के खिलाफ सख्त प्रावधानों वाला यह विधेयक लाया गया है. इसमें 12 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के खिलाफ ऐसे अपराध और 16 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के खिलाफ ऐसे अपराध के सिलसिले में कड़े दंड का प्रावधान किया गया है.

मंत्री ने कहा कि अध्यादेश लाना इसलिए जरूरी समझा गया क्योंकि जब देशभर में छोटी बच्चियों के साथ जघन्य दुष्कर्म की वारदातें सामने आ रही थीं तो सरकार चुप नहीं रह सकती थी. उस समय संसद सत्र भी नहीं चल रहा था इसलिए अध्यादेश लाया गया. रिजिजू ने कहा कि हमारी सरकार इस विधेयक के सख्त प्रावधानों को लागू करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी.

सरकार की प्राथमिकता होगी कि हर मामले में न्याय हो. उन्होंने बताया कि विधेयक में 12 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं के साथ बलात्कार के अपराध के लिये दंड को सात वर्ष के न्यूनतम कारावास से बढ़ाकर 10 वर्ष करने का प्रावधान किया गया है और इसे बढ़ा कर आजीवन कारावास भी किया जा सकता है. सोलह वर्ष से कम आयु की लड़की से बलात्कार के अपराध में सजा 20 वर्ष से कम नहीं होगी और इसे बढ़ाकर आजीवन कारावास किया जा सकेगा.

इसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष जीवनकाल के लिये कारावास से होगा और जुर्माना भी देना होगा. 12 वर्ष से कम आयु की लड़की से बलात्कार के अपराध में सजा 20 वर्ष से कम नहीं होगी और इसे बढ़ाकर आजीवन कारावास किया जा सकेगा. इसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष जीवनकाल के लिये कारावास से होगा और जुर्माना देना होगा. सोलह वर्ष से कम आयु की लड़की से सामूहिक बलात्कार के अपराध के लिये दंड आजीवन कारावास होगा जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष जीवनकाल के लिये कारावास होगा और जुर्माना देना होगा.

12 वर्ष से कम आयु की लड़की से सामूहिक बलात्कार के अपराध के लिये दंड आजीवन कारावास होगा जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष जीवनकाल के लिये कारावास होगा और जुर्माना देना होगा अथवा मृत्यु दंड होगा. इसमें कहा गया है कि बलात्कार के सभी मामलों के संबंध में जांच थाने में जानकारी देने से दो माह की अवधि में पूरी की जाएगी.

बलात्कार के अपराध के मामलों में दोषसिद्धि या दोषमुक्ति के विरूद्ध अपील का, उसे फाइल किये जाने की तिथि से छह माह की अवधि में निपटारा करना होगा. उन्होंने यह भी कहा कि जांच और अभियोजन में लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों को दंडित करने के भी विस्तृत प्रावधान किये गये हैं. रिजिजू ने कहा कि वह मानते हैं कि केवल कानून बनाने से काम नहीं चलेगा. सख्त प्रावधान जरूरी हैं लेकिन उनका क्रियान्वयन भी जरूरी है.

एजेंसियों और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अब संशोधन के बाद प्रावधान बनाया गया है कि 16 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ जघन्य अपराध के आरोपियों को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी. रिजिजू ने कहा कि अभियोजन तंत्र को मजबूत करने के लिए भी राज्यों से कहा जा रहा है. सभी थानों में विशेष फोरेंसिक किट रखने का भी प्रस्ताव है. उन्होंने सोशल मीडिया और इंटरनेट पर अश्लील सामग्री संबंधी कुछ सदस्यों की चिंताओं पर कहा कि इस पर भी नजर रखने पर विचार किया जा रहा है.

रिजिजू ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले चार साल में लगातार समीक्षाओं के दौरान महिला सुरक्षा को पहली प्राथमिकता में रखा है. इसके लिए अलग से महिला सुरक्षा विभाग भी बनाया गया है. रिजिजू ने कहा कि पीड़िताओं को जांच के दौरान होने वाली परेशानियों को देखते हुए प्रावधान किया गया है कि कोई वकील पीड़ित के चरित्र को लेकर सवाल-जवाब नहीं करेगा.

प्रयास किया जाएगा कि मामले की सुनवाई कोई महिला जज करें. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में बंद कमरे में (इन कैमरा) सुनवाई होने से भी पीड़िताओं को बल मिलेगा.

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