हेल्थकेयर के क्षेत्र में हो रहे बड़े बदलाव, इन तकनीकों से संवरेगी सेहत की दुनिया

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए वर्ष 2023 उम्मीदों से लबालब है. समय के साथ हेल्थकेयर को एडवांस बनाने में डिजिटाइजेशन व तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.
स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए वर्ष 2023 उम्मीदों से लबालब है. समय के साथ हेल्थकेयर को एडवांस बनाने में डिजिटाइजेशन व तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इसी क्रम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक के बढ़ते प्रयोग के साथ अपने देश में 5जी नेटवर्क की एंट्री से इस वर्ष हेल्थकेयर के क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. साथ ही सेहत से जुड़े कई शोधों ने गंभीर बीमारियों के सरल उपचार की उम्मीद भी जगायी है. वर्षारंभ विशेष में कुछ ऐसी ही उम्मीदों पर डालते हैं एक नजर…
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम डाटा के बड़े हिस्से को संभाल सकता है व उपचार के सर्वोत्तम उपाय सुझा सकता है. कैंसर जैसे रोगों का पता लगाना शुरू में कठिन होता है. एआइ से इसका पता जल्द लगाया जा सकता है. स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) खासकर मशीन लर्निंग टूल्स के इस्तेमाल में इस वर्ष काफी तेजी आयेगी. फोर्ब्स पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में हेल्थ सेक्टर में मशीन लर्निंग टूल्स का बाजार 20 मिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. एआइ पर आधारित एल्गोरिदम, जैसे- कंप्यूटर विजन, नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग और पैटर्न रिकॉग्निशन आदि का प्रयोग विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवा को पर्सनलाइज करने के लिए किया जा रहा है. इनका प्रयोग विकासशील देशों में और बढ़ने की उम्मीद है. इसकी मदद से रोगियों को समय पर उचित उपचार मिल सकेगा. अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, भविष्य में आपको होने वाले कई रोगों का पता एआइ से चल सकेगा. यानी हृदय कैसे काम करेगी, इसका अनुमान एआइ तकनीक से लगाया जा सकेगा.
5जी नेटवर्क के आने के बाद वर्ष 2023 में रिमोट हेल्थकेयर सुविधा में विस्तार की उम्मीद की जा रही है. इससे दूर बैठे चिकित्सक क्लीनिकल व नॉन क्लीनिकल सेवाएं दे सकेंगे. गांवों में भी बेहतर इलाज पाने की उम्मीद है. कोरोना महामारी के समय से दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाओं (टेली हेल्थ या टेली कंसल्टेशन) में काफी वृद्धि हुई है. जब सभी अस्पताल व क्लीनिक बंद थे, तब टेली हेल्थ ने डॉक्टरों से जुड़ पाना संभव बना दिया. इससे मरीज के लिए स्वास्थ्य सेवा को पाना अधिक किफायती व सुलभ हुआ है. 5जी नेटवर्क के आने के बाद वर्ष 2023 में इस सुविधा में विस्तार की उम्मीद की जा रही है. स्मार्ट मेडिकल डिवाइसेज और वियरेबल के जरिये हार्ट रेट या ब्लड ऑक्सीजन की जानकारी को दूर बैठे चिकित्सक को भेजकर उपचार कराया जा सकेगा. टेलीमेडिसिन की मदद से विकसित देशों में रिमोटली रोबोटिक सर्जरी तक की जा रही है. अपने देश में भी इसके सफल प्रयोग हो चुके हैं, जिसको वर्ष 2023 में तेजी से विस्तार मिलने की उम्मीद है.
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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मंडी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसे ड्रग मॉलिक्यूल की पहचान की है, जिसका उपयोग डायबिटीज के उपचार में किया जा सकता है. पीके-2 नामक यह अणु अग्न्याशय (पैन्क्रियाज) द्वारा इंसुलिन के स्राव को ट्रिगर करने में सक्षम है. खाने वाली दवा के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है. अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं के अनुसार, मधुमेह के लिए उपयोग की जाने वाली एक्सैनाटाइड और लिराग्लूटाइड जैसी दवाएं इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं, जो महंगी होने के साथ-साथ अस्थिर होती हैं.
टाइप-1 डायबिटीज बच्चों और किशोरों में होने वाली गंभीर बीमारी है. टाइप-1 डायबिटीज में पैन्क्रियाज में इंसुलिन बनता ही नहीं है, इसलिए यह बीमारी अचानक होती है. अब दुनिया में पहली बार टाइप-1 डायबिटीज की दवा बनकर तैयार हो गयी है. बीते वर्ष नवंबर के महीने में अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने इसको मंजूरी भी दे दी है. इस प्रीवेंटिव दवा का नाम टेपलीजुमैब (Teplizumab) है. उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष टाइप-1 डायबिटीज की यह दवा दुनिया के लिए हकीकत बन जायेगी. यह दवा एक प्रकार से इम्युनोथेरेपी है.
चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करके विकसित किये गये नैनो आकार के रोबोट अब दंत नलिकाओं के अंदर बैक्टीरिया को मारने में मदद कर सकते हैं. इससे रूट कैनाल उपचार की सफलता की दर को बढ़ा सकते हैं. भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) और इसके द्वारा इनक्यूबेटेड स्टार्टअप- थेरानॉटिलस के शोधकर्ताओं द्वारा किये गये एक अध्ययन में यह बात उभरकर आयी है. शोध पत्रिका एडवांस्ड हेल्थकेयर मैटेरियल्स में प्रकाशित अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने आयरन के साथ लेपित सिलिकॉन डाइऑक्साइड से बने नैनोबॉट तैयार किये हैं, जिन्हें चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने वाले डिवाइस की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है.
लोगों ने अपने हर दिन के फिजिकल रूटीन को ट्रैक करने के लिए बीते साल वियरेबल टेक्नोलॉजी का बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया. इसकी मदद से स्पीड, तय की गयी दूरी, हार्ट रेट व अपने फिटनेस परफॉरमेंस पर नजर रखा जा सकता है. इस वर्ष इनके उपयोग में और तेजी आयेगी. हेल्थकेयर में वियरेबल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल एक मरीज की हार्ट बीट, ब्लड प्रेशर, शरीर का तापमान और अन्य महत्वपूर्ण मापदंडों को ट्रैक करने के लिए किया जाता है.
स्ट्रोक की सटीक और किफायती निदान को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) मंडी के शोधकर्ताओं ने एक वियरेबल उपकरण को डिजाइन और उसका विकास किया है. यह उपकरण आकार में छोटा है, जो नियर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी डायोड के उपयोग से इस्केमिक स्ट्रोक का पता लगाने के लिए 650 एनएम से 950 एनएम रेंज में प्रकाश उत्सर्जन करता है. यह प्रकाश हीमोग्लोबिन जैसे रक्त के रंगीन घटकों से प्रतिक्रिया रक्त के विशेष लक्षणों को उजागर कर सकता है. इस्केमिक स्ट्रोक का जल्द पता लगाने के लिए यह पोर्टेबल और आसान उपकरण है.
शिथिल पड़ चुके अंग को सक्रिय बनाने में फिजियोथेरेपी का सहारा लिया जाता रहा है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जोधपुर के शोधकर्ताओं ने ऐसा रोबोटिक प्रशिक्षक डिजाइन किया हैं, जिसका उपयोग शरीर के निचले अंगों की अक्षमताओं के इलाज के लिए की जाने वाली फिजियोथेरेपी में किया जा सकता है. इस अध्ययन के निष्कर्ष को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एडवांस्ड रोबोटिक सिस्टम्स में प्रकाशित किया गया है. इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने एक ऐसे रोबोट की रूपरेखा प्रस्तुत की है, जो बिना थके इस काम को करने में सक्षम होंगे. रोबोट प्रशिक्षक पहनने योग्य उपकरण की तरह होंगे, जैसे कि एक्सोस्केलेटन, जो पैर को सहारा देता है. डिजाइन किये गये रोबोटिक प्रशिक्षक की उपयोगिता की पुष्टि कंप्यूटर आधारित स्टिमुलेशन और गति नियंत्रण योजना के साथ चिकित्सीय उपयोग के लिए की गयी है. दरअसल अंग विकलांगता अपने देश में एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है, जो उम्र, बीमारियों, दुर्घटनाओं, स्ट्रोक, पोलियो आदि के कारण होती है.
वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने वर्ष 2023 की शुरुआत में ही महिलाओं को होने वाली बीमारी सर्वाइकल कैंसर का टीका लाने की घोषणा की है. यानी देश के पहले स्वदेशी रूप से विकसित क्वाड्रिवेलेंट ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) सेरवावैक वैक्सीन का उत्पादन 2023 की पहली तिमाही में शुरू हो जायेगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सर्वाइकल कैंसर दुनिया में महिलाओं में होने वाला चौथा आम कैंसर है. अपने देश में 23 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की मौत का कारण सर्वाइकल कैंसर है. यही वजह है कि इस वैक्सीन को भारतीय हेल्थकेयर सेक्टर के लिए गैमचेंजर वैक्सीन माना जा रहा है.
वर्ष 2023 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष के रूप में मनाने का संकल्प लिया गया है. मोटे अनाजों में मुख्य रूप से बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, सांवा, कोदो, कंगनी, कुटकी, जौ आदि शामिल हैं. ये हर दृष्टि से सेहत के लिए लाभदायक होते हैं. खासकर, कोरोना काल में मोटे अनाज इम्युनिटी बूस्टर के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं. इन्हें सुपर फूड कहा जाने लगा है. पोषक तत्वों की दृष्टि से ये गुणों की खान हैं. प्रोटीन व फाइबर की प्रचुरता की वजह से मोटे अनाज डायबिटीज, हृदय रोग आदि का खतरा कम करते हैं.
प्रस्तुति : विवेकानंद सिंह
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By Prabhat Khabar News Desk
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