Film Review : फिल्म देखने से पहले जानें कैसी है ''ये साली आशिकी''

II उर्मिला कोरी II फ़िल्म : ये साली आशिकी निर्माता : जयंतीलाल गाड़ा, अमरीश पुरी फिल्म्स निर्देशक : चिराग रूपरेल कलाकार : वर्धन पुरी, शिवालिका,सतीश कौशिक और अन्य रेटिंग : एक महान कलाकार अमरीश पुरी के पोते वर्धन पुरी की लॉन्चिंग फ़िल्म ये साली आशिकी है. आम प्रेमकहानी के बजाय उनकी इस डेब्यू फिल्म में […]
II उर्मिला कोरी II
फ़िल्म : ये साली आशिकी
निर्माता : जयंतीलाल गाड़ा, अमरीश पुरी फिल्म्स
निर्देशक : चिराग रूपरेल
कलाकार : वर्धन पुरी, शिवालिका,सतीश कौशिक और अन्य
रेटिंग : एक
महान कलाकार अमरीश पुरी के पोते वर्धन पुरी की लॉन्चिंग फ़िल्म ये साली आशिकी है. आम प्रेमकहानी के बजाय उनकी इस डेब्यू फिल्म में प्रेम में धोखा खाने के बाद बदले की कहानी है. यहां प्यार में धोखा लड़की ने दिया है. आमतौर बहुत कम फिल्मों में लड़की को नकारात्मक दिखाया गया है.
फ़िल्म का विषय उन्होंने भले ही अलहदा चुना लेकिन ट्रीटमेंट के मामले में फ़िल्म बहुत ही कमज़ोर रह गयी है. फ़िल्म की कहानी शिमला में होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे साहिल मेहरा ( वर्धन पुरी) की है. वो अमीर है लेकिन बहुत अकेला है.
उसकी ज़िन्दगी में मीती ( शिवालिका) की एंट्री होती है. वह पहली नज़र में उसको दिल हार बैठता है. मीती और साहिल की प्रेमकहानी शुरू हो जाती है. मालूम पड़ता है कि मीती साहिल से नहीं उसके पैसों से प्यार करती है. कहानी ऐसे मोड़ लेती है कि साहिल पागलों के अस्पताल पहुच जाता है.
इसी बीच साहिल का अतीत भी मालूम पड़ता है कि उसने बचपन में अपने पिता का खून कर दिया था. साहिल मेंटल हॉस्पिटल से निकलकर किस तरह से अपना बदला लेगा. यही आगे की कहानी है. फ़िल्म थ्रिलर होने के बावजूद प्रेडिक्टेबल है. यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है और रही सही कसर फ़िल्म का क्लाइमेक्स कर देता है. जो अति नाटकीय है.
फ़िल्म की कहानी शुरुआत से ही एंगेज करने में असफल रहती है. कई सवालों के जवाब अधूरे हैं. साहिल ने मेंटल हॉस्पिटल में मदद के लिए अपने जुड़वां भाई के बजाय सतीश कौशिक के किरदार को क्यों नहीं बुलाया था. मीती के शारीरिक शोषण के इल्जाम की डॉक्टरी जांच क्यों नहीं हुई.
अभिनय की बात करें तो वर्धन पुरी को खुद पर अभी बहुत काम करने की ज़रूरत है. नकारात्मक भूमिका में फिर भी थोड़े ठीक रहे हैं लेकिन रोमांटिक और इमोशनल दृश्यों में वे बहुत कमजोर रहे हैं. उन्हें अपनी डायलॉग डिलीवरी पर भी काम करने की ज़रूरत है. फ़िल्म के एक दृश्य में उन्होंने अपने दादाजी अमरीश पुरी के दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के कबूतर को दाना डालने वाले सीन को दुहराया है.
नवोदित शिवालिका के एक्सप्रेशन ठीक ठाक रहें लेकिन उनका स्क्रीन प्रेजेंस कमज़ोर है. रुसलान को फ़िल्म में करने को कुछ खास नहीं था. जॉनी लीवर के बेटे जेसी लीवर को भी ज़्यादा मौके नहीं मिले हैं। बाकी के किरदार बस खानापूर्ति भर के लिए हैं. फ़िल्म गीत संगीत के बारे में बात करें तो बैकग्राउंड में बजता सनकी गीत ठीक ठाक है. फ़िल्म के संवाद भी बेअसर है।कुलमिलाकर फ़िल्म पूरी तरह से निराश करती है.
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