रिजर्व बैंक गवर्नर के अधिकारों पर चल सकती है कैंची, ''वीटो पावर'' समाप्त करने की तैयारी में मोदी सरकार
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Jul 2015 2:43 PM
नयी दिल्ली : नरेंद्र मोदी सरकार ने नीतिगत दर के निर्धारण में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के निर्णय पर केंद्रीय बैंक प्रमुख के ‘वीटो’ पावर को वापस लेने का प्रस्ताव किया है. इस प्रस्ताव से रिजर्व बैंक प्रमुख की शक्तियां कम हो सकती हैं. वित्त मंत्रालय ने भारतीय वित्तीय संहिता (आइएफसी) के संशोधित […]
नयी दिल्ली : नरेंद्र मोदी सरकार ने नीतिगत दर के निर्धारण में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के निर्णय पर केंद्रीय बैंक प्रमुख के ‘वीटो’ पावर को वापस लेने का प्रस्ताव किया है. इस प्रस्ताव से रिजर्व बैंक प्रमुख की शक्तियां कम हो सकती हैं. वित्त मंत्रालय ने भारतीय वित्तीय संहिता (आइएफसी) के संशोधित मसौदे को आज जारी किया. इसमें यह प्रस्ताव किया गया है कि शक्तिशाली समिति में सरकार के चार प्रतिनिधि होंगे और दूसरी तरफ केंद्रीय बैंक के ‘चेयरपर्सन’ समेत केवल तीन लोग होंगे. संहिता के मसौदे में ‘रिजर्व बैंक के चेयरपर्सन’ का उल्लेख और न कि गवर्नर का. फिलहाल रिजर्व बैंक के प्रमुख गवर्नर हैं.
तैयार मसौदे में क्या है खास
वित्तीय क्षेत्र में बडे सुधार के इरादे से लाये जा रहे आइएफसी में मौद्रिक नीति समिति का प्रस्ताव किया गया है. इस समिति के पास प्रमुख नीतिगत दर के बारे में निर्णय का अधिकार होगा. इसके साथ ही समिति खुदरा मुद्रास्फीति पर नजर रखेगी और खुदरा मुद्रास्फीति का वार्षिक लक्ष्य सरकार हर तीन साल में केंद्रीय बैंक के परामर्श से तय करेगी.
मसौदे में कहा गया है, ‘प्रत्येक वित्त वर्ष के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के संदर्भ में केंद्र सरकार वार्षिक मुद्रास्फीति लक्ष्य का निर्धारण रिजर्व बैंक के परामर्श से तीन-तीन साल में करेगी.’ इस मसौदे पर लोगों से आठ अगस्त तक टिप्पणी मांगी गयी है. संशोधित मसौदे में यह भी कहा गया है कि रिजर्व बैंक को निश्चित रूप से मौद्रिक नीति समिति गठित करनी चाहिए जो मुद्रास्फीति को सीमित रखने का लक्ष्य हासिल करने को लेकर बहुमत वोट के आधार पर नीतिगत दर का निर्धारण करेगी.
अबतक गवर्नर करते थे नीतिगत दरों का निर्धारण
अभीतक जो समिति थी उसके सलाह पर गवर्नर को नीतिगत दरों के निर्धारण का पूरा अधिकार था. हालांकि गवर्नर समिति के सदस्यों की सलाह पर ही दरों का निर्धारण करते थे, लेकिन गवर्नर समिति के बहुमत पर लिये गये फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं थे. फिलहाल रिजर्व बैंक का गवर्नर तकनीकी परामर्श समिति की सलाह लेता है. पहला मसौदा मार्च 2013 में दिया गया था. उसमें भी समिति और बहुसंख्यक वोट की बात कही गयी थी लेकिन उसमें चेयरपर्सन को समिति के निर्णय को बदलने की शक्ति दी गयी थी.
उसमें कहा गया था, ‘अपवादस्वरुप और असामान्य परिस्थितियों में अगर रिजर्व बैंक के चेयरपर्सन मौद्रिक नीति समिति की बैठक में निर्णय से असहमत होते हैं, रिजर्व बैंक चेयरपर्सन के पास उस निर्णय को बदलने का अधिकार होगा.’ लेकिन संशोधित मसौदे में इस प्रावधान को हटा दिया गया है. आइएफसी मसौदे में कहा गया है कि रिजर्व बैंक के चेयरपर्सन की अध्यक्षता में समिति गठित होगी. इसमें रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल के एक कार्यकारी सदस्य, रिजर्व बैंक में कार्यरत एक व्यक्ति तथा केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त चार व्यक्ति होंगे. इस प्रकार, नीतिगत दर के मामले में सरकार का पूरा नियंत्रण होगा.
अधिकतर विकसित देशों में भी गवर्नर की शक्तियां हैं सीमित
लगभग सभी विकसित देशों में रिजर्व बैंक के गवर्नर की शक्तियां सीमित हैं. भारत में शुरू से ही रिजर्व बैंक के गवर्नर को स्वतंत्र रूप से अधिकार है कि वह नीतिगत दरों पर स्वेच्छा से फैसला ले. भारत में सरकारें रिजर्व बैंक के गवर्नर को बदल जरुरी सकती हैं, लेकिन उसे दरों पर फैसला लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकती हैं. हालांकि शुरुआत के दिनों में ये खबरें आ रही थीं कि मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली और रिजर्व बैंक के गवर्नर के बीच संबंध सामान्य नहीं हैं.
लेकिन अरूण जेटली ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया था. अभीतक मौद्रिक समीक्षा बैठक में रिजर्व बैंक ने तीन बार रेट कट किया है. ये अलग बात है कि हर बार बैंकों ने अपने ग्राहकों को इस कटौती का फायदा नहीं दिया. इस बार सात अगस्त को होने वाली समीक्षा बैठक में दरों को अपरिवर्तित रखे जाने का अनुमान लगाया जा रहा है.
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