धर्मांतरण निषेध कानून देशभर में लागू किया जाये : सरना समिति

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धर्मांतरण निषेध कानून देशभर में लागू किया जाये : सरना समिति

सरना सम्मेलन : रांची में जुटे विभिन्न प्रदेशों से आये सैकड़ों प्रतिनिधि रांची : केंद्रीय सरना समिति के ‘सरना सम्मेलन’ में आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड लागू करने, पूरे देश में धर्मांतरण निषेध कानून लागू करने व धर्मांतरित व्यक्तियोंको अनुसूचित जनजाति का लाभ नहीं देने की मांग की गयी. सम्मेलन में झारखंड सहित विभिन्न […]

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सरना सम्मेलन : रांची में जुटे विभिन्न प्रदेशों से आये सैकड़ों प्रतिनिधि
रांची : केंद्रीय सरना समिति के ‘सरना सम्मेलन’ में आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड लागू करने, पूरे देश में धर्मांतरण निषेध कानून लागू करने व धर्मांतरित व्यक्तियोंको अनुसूचित जनजाति का लाभ नहीं देने की मांग की गयी. सम्मेलन में झारखंड सहित विभिन्न प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल हुए.
मोके पर केंद्रीय सरना समिति की नयी कार्यकारिणी की घोषणा भी हुई. समिति की महिला शाखा का गठन भी हुआ़ आयोजन मंगलवार को सेलिब्रेशन सभागार, करम टोली में हुआ़
आदिवासियों का धर्म व उनकी संस्कृति अलग-अलग नहीं : कार्यकारी अध्यक्ष बबलू मुंडा ने कहा कि आदिवासी समाज का धर्म व उनकी संस्कृति अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि ये एक ही सिक्के के दो पहलू है़ं
उनके नृत्य-गीत, लोक-कथाएं, पर्व-त्योहार, रीति-रिवाज, परंपराएं, सभी उसी ईश्वर रूपी प्रकृति की आराधना है़ं यही आदिवासियों का धर्म है़ आदिवासियों का कोई धर्म नहीं है, ऐसा कह विदेशी शक्तियां आदिवासी समाज को दिगभ्रमित कर रही है़ं ईसाई-मिशनरियों द्वारा आदिवासियों काे प्रलोभन व दबाव देकर लगातार उनकी धर्म परिवर्तन की साजिश की जा रही है.
धर्मांतरण किया है, तो गोत्र भी छोड़ना होगा
अंडमान निकाेबार द्वीप समूह से आये कैलाश उरांव ने कहा कि हमें भारतीय सनातन संस्कृति व देश की रक्षा के लिए एकजुट होना है. हमारे पूर्वज हनुमान की पूजा करते आये है़ं जो महादेव को मानता है, वही आदिवासी है़ जिन्होंने धर्मांतरण कर लिया है, उन्हें अपना गोत्र भी छोड़ना चाहिए़ यह चर्च से नहीं, बल्कि परंपरा से मिली पहचान है़
सरना-ईसाई का विवाद चर्च ने शुरू किया
मेघा उरांव ने कहा कि स्व कार्तिक उरांव ने धर्मांतरण, धर्मांतरित आदिवासियों का दोहरा लाभ लेने जैसी बातों का मुखर विरोध किया था़ पर उनके नाम पर चलने वाले कुछ संंगठन इसके विपरीत बातें करते है़ं आरोप लगाया जाता है कि हम सरना-ईसाई की बात कर दो भाइयों को लड़ाते हैं, पर यह काम तो चर्च के लोगों ने ही नेम्हा बाइबल सहित कई पुस्तकें प्रकाशित कर शुरू की, जिसमें प्रकृति पूजक आदिवासियों के बारे में अनर्गल बातें लिखी है़ं
इस अवसर पर तीन साल के लिए नयी समिति बनायी गयी़ इसमें फूलचंद तिर्की अध्यक्ष, बबलू मुंडा कार्यकारी अध्यक्ष, विश्वास उरांव, नरेश पाहन, भीखा उरांव व लक्ष्मी नारायण भगत उपाध्यक्ष, डबलू मुंडा सचिव, संजय तिर्की महासचिव, संजय हेमरोम उपसचिव, गौतम मुंडा कोषाध्यक्ष व संजय तिर्की उप कोषाध्यक्ष चुने गये़
इनका कार्यकाल तीन वर्षों का होगा़ वहीं महिला शाखा का गठन भी हुआ, जिसमें शोभा कच्छप अध्यक्ष, अंजू टोप्पो उपाध्यक्ष व नीरा टोप्पो सचिव बनायी गयी है़ं संदीप उरांव, सुनील फकीरा कच्छप व लोरेया पाहन संरक्षक होंगे. वहीं जगलाल पाहन को केंद्रीय पाहन का दर्जा दिया गया़
सरकार से यह भी मांग की गयी कि सरना, मसना, पहनई, भुईंहरी, जतरा टांड़ व आस्था के अन्य केंद्रों को चिन्हित कर सुरक्षित किया जाये़
आदिवासी माता व गैर आदिवासी पिता से उत्पन्न संतान को आदिवासियत का लाभ न मिले़ झारखंड के वीरों की जीवनी माध्यमिक व उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल की जाये़ पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संवैधानिक अधिकार दिये जाये़ं अनूसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक ग्रामसभा का गठन हो़ पंचायत चुनाव में धर्मांतरित आदिवासियों को आरक्षण न मिले़ जिला रोस्टर के आधार पर विभिन्न पदों पर आदिवासियों की बहाली जल्द की जाये़
सरहुल, करम, सोहराई, माघे जैसे आदिवासी पर्व-त्योहारों पर राजकीय अवकाश दिया जाये, राज्य के सड़क, चौक- चौराहों व पार्क के नाम आदिवासी शहीदों व महापुरुषों के नाम पर रखे जाये़ं पाहनों व प्रधानों को संवैधानिक अधिकार दिया जाये़ सम्मेलन में फूलचंद तिर्की, हांदु भगत, गोविंद कुजूर, कैला उरांव, सुनील फकीरा कच्छप, संदीप उरांव, जगलाल पाहन, भीखा उरांव, माधुरी भगत, गौरी उरांव, सरस्वती उरांव, बहादुर उरांव, गोविंद कुजूर सहित अन्य लोग मौजूद थे.
सहयोग मिला, तो असम में भी बनेंगी सरना समितियां
असम से आये जुगेश्वर उरांव ने कहा कि असम में भी बड़ी संख्या में सरना धर्मावलंबी है़ं 1961 में वहां उरांव संगठन बना़ यदि झारखंड से सहयोग मिला, तो वहां भी सरना समिति जैसे संगठन बन सकते है़ं हमें अपने रीति-रिवाजों का विश्लेषण भी करना चाहिए, ताकि और धर्मांतरण न हो़
निशा भगत ने कहा कि धर्मांतरण रोकने की पहल गांव-गांव में होनी चाहिए़ कई वक्ताओं ने कहा कि अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का 75 प्रतिशत लाभ धर्मांतरित ईसाई ले रहे है़ं उन्हें अल्पसंख्यकों का लाभ भी मिल रहा है़ यह मूल आदिवासियों के साथ अन्याय है़
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