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स्मृति शेष : बसंत कुमार बिरला ने 15 साल की उम्र में संभाला करोबार, ले गये बुलंदियों तक, राजनीति से भी रहा है जुड़ाव

Updated at : 04 Jul 2019 7:27 AM (IST)
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स्मृति शेष : बसंत कुमार बिरला ने 15 साल की उम्र में संभाला करोबार, ले गये बुलंदियों तक, राजनीति से भी रहा है जुड़ाव

कोलकाता/रांची : बीके बिरला का जन्म घनश्याम बिड़ला के घर 12 जनवरी,1921 को हुआ था. घनश्याम दास बिरला के सबसे छोटे बेटे बसंत कुमार बिरला ने महज 15 साल की उम्र में कारोबार संभालना शुरू कर दिया था. उन्होंने केसोराम इंडस्ट्रीज एक वार्षिक बैठक में कहा था कि वह 90 साल की उम्र में रिटायर […]

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कोलकाता/रांची : बीके बिरला का जन्म घनश्याम बिड़ला के घर 12 जनवरी,1921 को हुआ था. घनश्याम दास बिरला के सबसे छोटे बेटे बसंत कुमार बिरला ने महज 15 साल की उम्र में कारोबार संभालना शुरू कर दिया था.
उन्होंने केसोराम इंडस्ट्रीज एक वार्षिक बैठक में कहा था कि वह 90 साल की उम्र में रिटायर होना चाहते हैं. वह अपना बचा हुआ समय आर्ट और कल्चर जैसे कार्यों में देना चाहते थे. बीके बिरला चाहते थे कि उनकी सभी कंपनियों की चेयरमैनशिप कुमार मंगलम बिरला ले लें, पर कुमार मंगलम बिरला ने उन्हें उनके पद पर बने रहने के लिए कहा. बीके बिरला अप्रैल में पिलानी इन्वेस्टमेंट बोर्ड से बाहर हो गये थे. बीके बिरला आदित्य बिरला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम बिरला के दादा थे. उन्होंने केसोराम इंडस्ट्रीज में 1940 में डायरेक्टर का पद संभाला था. कारोबार जगत में उनके पास करीब 70 साल का अनुभव था.
वह केसोराम इंडस्ट्रीज, जयश्री टी, सेंचुरी टेक्सटाइल समेत कई दूसरी कंपनियों की अगुवाई कर रहे थे. उनके प्रयासों से ही सेंचुरी टेक्सटाइल्स कंपनी को खड़ा कर कारोबार को बुलंदियों पर पहुंचाया गया. बीके बिरला कई चैरिटेबल ट्रस्ट और शिक्षा संस्थानों से भी जुड़े हुए थे. 1995 में कुमार मंगलम बिरला के पिताजी आदित्य विक्रम बिरला का 1995 में निधन हो गया था. वह बसंत कुमार बिरला के इकलौते पुत्र थे. उनके परिवार में दो बेटियां जयश्री मोहता और मंजूश्री खेतान हैं.
राजनीति से भी रहा है जुड़ाव
बिरला परिवार का राजनीति से भी जुड़ाव रहा है. आमतौर पर यह परिवार हमेशा कांग्रेस के साथ ही खड़ा दिखता था. हालांकि, वह दौर भी आया, जब भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के साथ भी बिरला परिवार के सदस्यों की निकटता बढ़ी.
खास कर बीके बिरला की. इन नेताओं के बारे में बीके बिरला की राय थी कि ऐसे लोग दूसरी पार्टियों में नहीं थे. एक बार लालकृष्ण आडवाणी जब कोलकाता आये थे, तो बीके बिरला के घर ‘बसंत विहार’ में ही उनका ठहरना हुआ था. वहीं पर मीडिया के लोग भी उनसे मिलने आये थे.
एकदम सादा जीवन जीते थे दादोजी : कुमार मंगलम
मैं तब 15 वर्ष का था. किसी चीज की तलाश में दादोजी के कपबोर्ड में ताक-झांक कर रहा था. तब यह देख कर चौंक गया कि वहां केवल उनकी कोई 10 धोतियां पड़ी हुई थीं.
लगभग इतने ही सूट और इससे भी कम टाई. वह व्यक्ति, जो तब अपने लिए अपनी इच्छा के अनुसार, बेस्ट हासिल कर सकता था, पर उसने अपने पास केवल यही आवश्यक चीजें रखी थी. दरअसल, दादोजी सादा जीवन और उच्च विचार के पोषक थे, धनी थे. ऐसे इंसान, जो अपने वक्त से काफी आगे का था. दादोजी का जीवन बहुआयामी था. धर्म, अध्यात्म, गीत-संगीत, क्रीड़ा, कला व संस्कृति सभी उनके जीवन में सर्वदा रचे-बसे रहे.
(कुमार मंगलम बिरला के एक लेख पर आधारित)
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