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हाइवे : हमसफर भी और मंजिल भी

Updated at : 24 Nov 2019 9:19 AM (IST)
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हाइवे : हमसफर भी और मंजिल भी

हवा से बतियाते, धूल उड़ाते और फिल्मी तर्जों पर बने बेसुरे हॉर्न बजाते हुए जब ट्रक और बसें हाइवे पर गुजरती हैं, तो फुटपाथ पर सोते लोगों और सड़क किनारे खड़े मकानों की बुनियादें तक थरथरा जाती हैं. ऐश्वर्या ठाकुर, ब्लॉगर एवं आर्किटेक्ट कलकत्ता से काबुल को जोड़ती हुई जीटी रोड जब बनायी गयी होगी, […]

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हवा से बतियाते, धूल उड़ाते और फिल्मी तर्जों पर बने बेसुरे हॉर्न बजाते हुए जब ट्रक और बसें हाइवे पर गुजरती हैं, तो फुटपाथ पर सोते लोगों और सड़क किनारे खड़े मकानों की बुनियादें तक थरथरा जाती हैं.

ऐश्वर्या ठाकुर, ब्लॉगर एवं आर्किटेक्ट
कलकत्ता से काबुल को जोड़ती हुई जीटी रोड जब बनायी गयी होगी, तो न जाने कितने चक, कितने खित्ते और कितने खेत-खलिहान इस एक सड़क की जद में आ गये होंगे. जीटी रोड की ही तर्ज पर तब से आज तक गांवों-कस्बों, शहरों-जंगलों के एकांत को चीरते हुए हाइवे कितने ही मकानों, खलिहानों और मैदानों की कब्रों पर काबिज हो चुके हैं और रफ्तार की एक नयी इबारत गढ़ रहे हैं. ये हाइवे रोज चश्मदीद बनते हैं मीलों लंबे सफर के, अगणित यात्राओं के, पैदल और सवारियों के संघर्ष के, राहगीरों के इंतजार के और दिशाओं-दूरियों का हिसाब रखते मील-पत्थरों के भी.
हाइवे के साथ जुड़े ढाबों, धर्मकांटों, शराब की दुकानों, गैरेज और पान-बीड़ी की दुकानों ने मिल-जुलकर अपनी एक अलग संस्कृति विकसित कर ली है. इसी ‘हाइवे-संस्कृति’ को कई शोधकर्ताओं, पत्रकारों, लेखकों और छायाकारों ने अपना विषयवस्तु बनाकर करीब से देखा-दिखाया है. हाइवे की बात हो, तो इन तेज-रफ्तार लंबे रास्तों का राजा माने जानेवाले ट्रक, लॉरियां, टैंकर और बसों का जिक्र आना भी लाजमी है. हवा से बतियाते, धूल उड़ाते और फिल्मी तर्जों पर बने बेसुरे हॉर्न बजाते हुए जब ये ट्रक-बसें गुजरती हैं, तो फुटपाथ पर सोते लोगों और सड़क किनारे खड़े मकानों की बुनियादें तक थरथरा जाती हैं.
अकेले ट्रक-कल्चर की ही बात करें, तो भी कहने-सुनाने को कितना कुछ है. चलते-फिरते आर्ट गैलरी जैसे दिखनेवाले ट्रक अपनी बॉडी पर अपने चालक की पूरी कहानी सजाये फिरते हैं. रंग-बिरंगी लिखावट में उकेरे हुए जीवन के जटिल फलसफे इन ट्रकों की काया पर छपे गोदने जैसे लगते हैं. परदेसियों से प्रीत न लगाने की सीख, तो कभी फकीरी में मौज ढूंढ़ती यायावरी की मस्ती लिये ये पंक्तियां ट्रक ड्राइवरों और चित्रकारों की सरलता और समझ का परिचय भी दे जाती हैं. परांदियों, चूड़ियों, शीशों और फिल्मी सितारों की तस्वीरों से सजे ये ट्रक इन ड्राइवरों का चलता-फिरता घर होते हैं, जिनमें वे अपनी यादों और सपनों के टुकड़े संजो कर रखते हैं.
बाबा नागार्जुन की कविता ‘गुलाबी चूड़ियां’ में भी ड्राइवर ऐसे ही गियर के ऊपर कांच की चार चूड़ियां टांगे रहते हैं, जो उसे लंबे उदास सफर में अपनी नन्हीं बेटी की याद दिलाती रहती हैं. बुरी नजर से बचने का टोटका भी जूती या शैतान के चित्र के रूप में ट्रक के पीछे लटकता रहता है. खलासी को बगल में बैठा कर ट्रक ड्राइवर इन्हीं आभासी उम्मीदों के सहारे मीलों लंबे हाइवे पर महीनों बढ़े चले जाते हैं. रास्ते में मिलकर गुजरते जाते हैं भेड़-बकरियों के झुंड, गति-नियंत्रण के साइनबोर्ड और कितने ही रहगुजर, मगर उनके साथ दौड़ते रहते हैं चांद-सूरज-तारे. हाइवे पर गाड़ियों में सवार होकर गुजरती चली जाती है जिंदगी और सुनने-सुनाने को इकट्ठे होते जाते हैं कितने ही भूतों-प्रेतों के किस्से, नाके-बैरियरों की कहानियां और हादसों की निशानियां. लंबे इंतजार, थकावटों और नींद के थपेड़ों से बोझिल करनेवाले हाइवे पर ड्राइवरों-राहगीरों के लिए नशे और जिस्मफरोशी के विकल्प भी अंधेरे में चुपके से खड़े मिल जाते हैं.

जोजिला की जानलेवा खाइयों पर ऐहतियात से खड़ा नेशनल हाइवे-1 हो या किन्नौर की मुश्किल घाटियों पर किसी करिश्मे सा दिखनेवाला नेशनल हाइवे नंबर-5, सुस्ताते ढाबों के बगल से गुजरकर अटारी बॉर्डर तक जाता हाइवे नंबर-3 हो या शिपिंग-कंटेनर लादकर बंदरगाहों तक पहुंचानेवाला हाइवे नंबर-16, दोराहे-चौराहे और गर्द-ए-राह लिये ये हाइवे अपने आप में मुसाफिरों के लिए हमसफर भी हैं और मंजिल भी.

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