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अंटार्कटिका के बर्फ के नीचे छिपे हैं महाविस्फोट के कण, धरती के अतीत की कहानी जानने में जुटे हैं वैज्ञानिक

Updated at : 24 Aug 2019 6:42 AM (IST)
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अंटार्कटिका के बर्फ के नीचे छिपे हैं महाविस्फोट के कण, धरती के अतीत की कहानी जानने में जुटे हैं वैज्ञानिक

नयीदिल्ली : अंटार्कटिका के सघन बर्फ के नीचे पृथ्वी के अतीत की कहानी दबी है, इसकी जानकारी हासिल करने वैज्ञानिक दिन रात जुटे हैं. दरअसल वैज्ञानिकों ने अपने शोध के दौरान अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे महाविस्फोट के कण का पता लगाया है. अपने प्रारंभिक शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि अंतरिक्ष […]

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नयीदिल्ली : अंटार्कटिका के सघन बर्फ के नीचे पृथ्वी के अतीत की कहानी दबी है, इसकी जानकारी हासिल करने वैज्ञानिक दिन रात जुटे हैं. दरअसल वैज्ञानिकों ने अपने शोध के दौरान अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे महाविस्फोट के कण का पता लगाया है. अपने प्रारंभिक शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि अंतरिक्ष में हुए महाविस्फोट के बाद एक आंधी उठी थी, जिसका भीषण असर पृथ्वी पर पर भी पड़ा था. उस आंधी के साथ अंतरिक्ष के धूलकण भी पृथ्वी की सतह पर आये थे. इस महाविस्फोट के कारण पृथ्वी की संरचना और उसके पर्यावरण पर व्‍यापक प्रभाव पड़ा था.

वैज्ञानिकों ने अं‍तरिक्ष से आये धूल कणों को खोज निकाला है, यह कण पृथ्वी के हिस्से नहीं हैं. वे पृथ्वी पर अंतरिक्ष से आये हैं. इस कारण प्रारंभिक चरण में ही इनकी उम्र करीब दो करोड़ साल पूर्व की आंकी गयी है. वैज्ञानिकों ने अपनी प्रारंभिक शोध में बताया है कि उस समय अंतरिक्ष में अचानक किसी बड़े तारे में विस्फोट हो गया था. इस विस्फोट के कारण अंतरिक्ष में कई और विस्फोट हुए थे. यह सब मिलकर एक महाविस्फोट बन गया था.
इन विस्फोटों के कारण अंतरिक्ष में जोरदार आंधी उठी थी. जिसका एक छोटा हिस्‍सा पृथ्वी से भी आ टकराया था. जिससे यहां का पर्यावरण पूरी तरह बदल गया. वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि पृथ्वी की बाहरी संरचना कुछ ऐसी है कि सामान्य किस्म की सौर आंधियों का प्रभाव पृथ्वी के अंदर तक नहीं आता है. लेकिन जब कभी इस किस्म की आंधी प्रचंड वेग से आती है तो धरती के वायुमंडल का कवच टूट जाता है. दो करोड़ साल पहले भी इसी तरीके से पृथ्वी का बाहरी कवच टूट गया था.
जिस स्थान से इन कणों को पाया गया है वे भी इनके प्रभाव में थोड़े भिन्न किस्म के हो गये थे. मजेदार बात तो यह है कि इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि खरबों किलोमीटर की दूरी तय कर पृथ्वी तक पहुंचने वाले किसी भी कण को यहां देख पाना खुद में अच्छी बात है. सोच से भी अधिक दूरी का कोई कण पता नहीं कितने समय की दूरी तय कर यहां तक पहुंचा होगा और तब से यही पड़ा हुआ है.
शोध दल ने अंटार्कटिका स्थित इस जगह की खुदाई सिर्फ इसलिए की क्योंकि इससे पहले कोई वैज्ञानिक शोध दल इस इलाके में नहीं गया था. शोध से पूरी तरह अछूते रहे इस प्राचीन इलाके में परीक्षण के दौरान ही बर्फ के अंदर से लोहे के अंश मिलने लगे. वैज्ञानिकों ने जब उपकरणों से इसकी जांच की गयी है तो पता चला कि यह आयरन 60 है. जबकि‍ धरती पर आम तौर पर आयरन 56 पाया जाता है.इस आयरन 60 की विशेषता यह है कि इसमें अधिक न्यूट्रॉन होते हैं.
इसी शोध की वजह से वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जिस पदार्थ का वे विश्लेषण कर रहे हैं वे दरअसल अंतरिक्ष की आंधी के साथ आने वाले धूलकण ही हैं. पृथ्वी पर अनेक धातु इसी तरीके से आये हैं.
अब वैज्ञानिक इन कणों का गहन विश्लेषण कर उनकी संरचना तथा आयु के बारे में जानकारी हासिल करने में जुटे है. ताकि उस महाविस्फोट के दौरान की परिस्थितियों का पता चल सके. साथ ही वैज्ञानिक अंटार्कटिका के उस स्थान की भी गहन छान-बीन कर रहे हैं, ताकि अंतरिक्ष से आये धूल कणों के अलावा भी कुछ और सुराग हासिल किया जा सके.
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