विजय दिवस : प्रभात खबर कार्यालय आये सेना व बीएसएफ के अफसरों ने किया 1971 को याद

By Prabhat Khabar Digital Desk
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वीरों के स्मरण से मिलता है प्रोत्साहन

वर्दी को सम्मान देने व युवाओं को सेना में शामिल होने का किया आह्वान
कोलकाता : 16 दिसंबर, 1971 को ही भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को हार का मुंह दिखाया था. इसी दिन करारी शिकस्त का सामना करते हुए 92 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह दूसरा मौका था, जब हजारों की तादाद में किसी देश के सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया.
इसी के साथ पूर्वी पाकिस्तान आजाद होकर बांग्लादेश कहलाया. पूर्वी पाकिस्तान की आजादी का मसला हो या आजादी के लिए संग्राम करनेवाले मुक्ति वाहिनी योद्धा के प्रशिक्षण का, भारतीय थल, वायु और नौसेना के साथ ही सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की भी भूमिका काफी अहम रही. पूरे देश में 16 दिसंबर ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.
विजय दिवस के उपलक्ष्य में शनिवार को प्रभात खबर के कोलकाता कार्यालय में विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें भारतीय सेना और बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे, जिन्होंने विजय दिवस और सेना की अहम भूमिका को लेकर अपने विचार को साझा किया.
सभी इस बात पर एकमत रहे कि भारतीय सेना व बीएसएफ किसी भी हालात से निबटने में पूरी तरह से सक्षम है, चाहे वह देश की सुरक्षा का मामला हो या फिर देश हित में किसी के खिलाफ कार्रवाई करने का. अधिकारियों ज्यादा से ज्यादा युवाओं को सेना में शामिल होने की भी अपील की है. आइये जानते हैं सेना के वरिष्ठ अधिकारियों की कही बातें :
कमांडर अशोक ढाका, एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, इंडियन नेवी, कोलकाता : किसी भी देश को सुपर पावर बनाने में नौसेना की भूमिका भी काफी अहम होती है. विश्व में करीब 75 प्रतिशत व्यापार समुद्र मार्ग से होता है. सुरक्षा की दृष्टिकोण से भी जल मार्ग महत्वपूर्ण है. सुपर पावर बनने के लिए बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और आर्थिक स्थिति का मजबूत होना जरूरी है. कहा जा सकता है कि समुद्र पर राज करना जरूरी है. पड़ोसी देशों की बात करें तो चीन ने अपनी सेनाओं के विस्तार व आधुनिकीकरण पर जोर दिया है.
इस क्रम में भारतीय नौसेना भी पीछे नहीं है. मौजूदा समय में हिंद महासागर में होने वाली हर गतिविधियों पर नजर रखने व निबटने में भारतीय नौसेना सक्षम है. बात यदि 1971 में पाकिस्तान से लड़े गये युद्ध की हो तो भारतीय नौसेना ने युद्ध सोचे-समझे व निर्णायक तरीके से लड़ा. पाकिस्तान की सप्लाई लाइन काट दी गयी. पाकिस्तान को पहली चोट कराची बंदरगाह की बर्बादी से मिली.
उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि भारतीय नौसेना इतने अंदर घुस कर हमला कर पायेगी. हमले में पाकिस्तान के युद्धपोत निकल भी नहीं पाये थे और हार्बर में डूबो दिये गये थे. उनके आयल फील्ड को भी काफी क्षति पहुंची. इस शुरुआत से पूरी भारतीय सेना को मनोबल मिला. भारतीय नौसेना ने युद्ध के दो मोर्चे संभाल रखे थे. एक था बंगाल की खाड़ी में पूर्वी पाकिस्तान और दूसरा पश्चिमी पाकिस्तान का अरब सागर की ओर से मुकाबला करना. युद्ध ऐसे योजनाबद्ध तरीके से लड़ा गया कि पाकिस्तान कुछ समझ ही नहीं पाया कि आखिर उसे करना क्या था. यह जीत ऐतिहासिक है. देश में ज्यादा से ज्यादा युवा नौसेना में शामिल हों.
विंग कमांडर राजेश शर्मा, सीओ, नंबर 1 एयर एनसीसी स्कार्डन :
देश के हर बच्चे को एनसीसी के सी सर्टिफिकेट का कोर्स जरूर करना चाहिए. भले ही वह सेना में शामिल हो या नहीं. इससे वे अच्छे नागरिक जरूर बन पायेंगे. हालांकि हर युवा को अपने देश की सेना और उससे जुड़ने के प्रति जागरूक होना चाहिए. सभी सेना की वर्दी का सम्मान करें. 1971 में हुए युद्ध का विशेष महत्व है. यह काफी निर्णायक रहा. तीन दिसंबर को पाकिस्तान ने पठानकोट समेत देश की पश्चिमी सीमा पर हमला किया, ताकि पूर्वी पाकिस्तान से सेना का ध्यान भटकाया जा सके.
पाकिस्तान ने 11 एयरफोर्स स्टेशन पर हमला किया. युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना भारतीय थलसेना के समानान्तर कार्य कर रही थी. ऑपरेशन कैक्टस भी महत्वपूर्ण था. 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं. बैठक के दौरान ही भारतीय वायु सेना के चार मिग विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी. इस हमले ने पाकिस्तान को लगभग तोड़ दिया और भारत ने महज 13 दिनों में पाकिस्तान को शिकस्त दे दी.
ब्रिगेडियर बलबीर सिंह, भारतीय थल सेना (सेवानिवृत्त) : 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के हर मंसूबे को असफल कर दिया. भारत ने पूर्वी पाकिस्तान की जनता की इसलिए भी मदद की कि क्योंकि वहां से लाखों की तादाद में लोग भाग कर हमारे देश आने लगे थे. सुरक्षा और आर्थिक रूप से देश पर दबाव बढ़ने लगा था.
युद्ध से सात महीने पहले हुई कैबिनेट बैठक में युद्ध के प्रस्ताव पर जनरल सैम मानेक शॉ सहमत नहीं हुए थे. उन्होंने कहा था, अभी हम इसके लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने बताया कि कुछ ही दिनों में मानसून आनेवाला है और उस इलाके में मूसलधार बारिश होती है. नदियां समुद्र बन जाती हैं.
एक किनारे से दूसरा किनारा नहीं दिखता. वायुसेना हमारी मदद नहीं कर सकती. हम अगर युद्ध करेंगे तो युद्ध हार जायेंगे. मानेक शॉ ने उनसे युद्ध की तैयारी के लिए वक्त मांगा था. यह एक निर्णायक और देश के हित में लिया गया फैसला था. उसके सात महीने बाद ही पाकिस्तान ने भारत पर युद्ध कर दिया और भारतीय सेना ने निर्णायक भूमिका निभाते हुए पाकिस्तान को शिकस्त दे दी. विजय दिवस के मौके पर ऐसे वीर जवानों को याद कर हमें प्रोत्साहन मिलता है, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दे दी.
प्रवीण कुमार, कमांडेंट, बीएसएफ साउथ बंगाल फ्रंटियर : 1971 के मार्च महीने से ही पाकिस्तान से युद्ध के हालात बन गये थे. बीएसएफ का गठन 1965 में हुआ था. उन्हें युद्ध करने की नहीं, बल्कि रक्षात्मक कार्य की जिम्मेदारी मिली थी, हालांकि 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में बीएसएफ ने कई जगहों पर हमले भी किया.
युद्ध के पहले से ही बीएसएफ ने अपने पक्ष में आधार मजबूत करना शुरू कर दिया था. बांग्लादेश के मुक्ति वाहिनी को प्रशिक्षण देने और उन्हें तैयार करने में बीएसएफ की भूमिका काफी अहम रही थी. इसकी वजह है कि वे पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बांग्लादेश) के लोगों के साथ करीबी संपर्क में थे. पाकिस्तान से तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की हवाई सेवा बंद करने और पाकिस्तानी सेना को स्पलाई सेवा कमजोर करने के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बीएसएफ ने उठायी.
युद्ध के समय यदि सेना की जरूरी आपूर्ति (सप्लाई) बंद हो जाये तो दुश्मन की कमर टूट जाती है. 1971 के युद्ध में बीएसएफ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही और उसके बाद ही इसके विस्तार पर और जोर दिया गया. मौजूदा समय में बीएसएफ थल, वायु और जल तीनों स्थानों में दुश्मन से मुकाबले के लिए सक्षम है.
प्रभात कुमार सिंह, डिप्टी कमांडेंट, बीएसएफ साउथ बंगाल फ्रंटियर : 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के पहले ही बीएसएफ की ओर से तैयारी शुरू कर दी गयी थी. पाकिस्तान के आधार को कमजोर करने के लिए बीएसएफ ने अहम भूमिका निभायी. बांग्लादेश के मुक्ति वाहिनी और भारतीय सरकार के बीच संपर्क का जरिया भी बीएसएफ था. इस युद्ध में भारतीय सेना के साथ बीएसएफ ने निर्णायक भूमिका निभायी थी.
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