अयोध्या विवाद : अदालत से बाहर विवाद सुलझाने को कई फॉर्मूले लाये गये, पर नहीं बन सकी बात

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 09 Nov 2019 3:58 AM

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अयोध्या विवाद को कोर्ट के बाहर सुलझाने की भी भरपूर कोशिशें हुईं. इसके लिए कई फॉर्मूले लाये गये, मगर कामयाबी नहीं मिली. सुब्रमण्यम स्वामी का फॉर्मूला : भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने फॉर्मूला दिया था कि विवादित स्थल पर राम मंदिर बने और सरयू नदी के उस पार मुस्लिम मस्जिद बना लें. इलाहाबाद हाइकोर्ट के […]

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अयोध्या विवाद को कोर्ट के बाहर सुलझाने की भी भरपूर कोशिशें हुईं. इसके लिए कई फॉर्मूले लाये गये, मगर कामयाबी नहीं मिली. सुब्रमण्यम स्वामी का फॉर्मूला : भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने फॉर्मूला दिया था कि विवादित स्थल पर राम मंदिर बने और सरयू नदी के उस पार मुस्लिम मस्जिद बना लें.
इलाहाबाद हाइकोर्ट के रिटायर्ड जज का फॉर्मूला : इलाहाबाद हाइकोर्ट के ही रिटायर्ड जज पलोक बसु ने फॉर्मूला सुझाया था कि जो हिस्सा राम लला विराजमान को मिला है, उस पर राम मंदिर बने. बाकी जमीन निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास रहे, पर मुस्लिम पक्ष उस जमीन को छोड़ कर 200 मीटर दूर ‘युसूफ की आरा मशीन’ की जमीन पर मस्जिद बनाए. इस फॉर्मूले पर ज्यादातर हिंदू संगठन और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी एकमत नहीं हुए.
अखाड़ा परिषद के प्रमुख महंत और हाशिम अंसारी का फॉर्मूला : इसे अखाड़ा परिषद के प्रमुख महंत ज्ञान दास और अयोध्या केस के पक्षकार हाशिम अंसारी ने मिल कर बनाया था. इस फॉर्मूले में था कि विवादित परिसर में मंदिर और मस्जिद दोनों बनें, लेकिन उनको 100 फुट ऊंची दीवार से बांट दिया जाए. यह फॉर्मूला हाशिम अंसारी के निधन के बाद ठंडे बस्ते में चला गया.
श्री श्री रविशंकर का फॉर्मूला : अयोध्या मामले में मध्यस्थता करने की पहल करने वाले आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने भी एक फाॅर्मूला पेश किया था. इस फॉर्मूले में सुझाया गया था कि विवादित जगह पर राम मंदिर बने और मस्जिद अयोध्या में ही कहीं और बनायी जाए.
शिया वक्फ बोर्ड का फॉर्मूला : एक फॉर्मूला शिया वक्फ बोर्ड की तरफ से भी आया था. इसमें सुझाव था कि अयोध्या में विवादित जगह पर राम मंदिर बनाया जाए और मस्जिद लखनऊ में बने. रविशंकर और शिया वक्फ बोर्ड के फॉर्मूले भी किसी पक्ष को मंजूर नहीं हुए.
…तब दिया था मध्यस्थता का प्रस्ताव
21 मार्च 2017 : सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने कहा कि अयोध्या विवाद मामले को आपसी बातचीत से सुलझा लेना चाहिए. उन्होंने कहा था कि वह बातचीत की मध्यस्थता कर सकते हैं. उनके इस सुझाव का लालकृष्ण आडवाणी सहित भाजपा के कई नेताओं ने स्वागत किया.
07 अगस्त 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में इलाहाबाद हाइकोर्ट के दिये गये इस्माइल फारूकी फैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के लिए तीन जजों की बेंच का गठन किया.
08 अगस्त 2017: यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अयोध्या में विवादित जमीन से कुछ दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनायी जा सकती है
11 सितंबर 2017: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाकोर्ट को निर्देश देते हुए कहा कि अयोध्या में राम जन्मभूमि की निगरानी के लिए 10 दिनों के अंदर दो जजों को बतौर पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाए.
20 नवंबर 2017 : यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मंदिर अयोध्या में और मस्जिद लखनऊ में बनायी जा सकती है.
01 दिसंबर 2017: 32 कार्यकर्ताओं ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के 2010 के फैसले को चुनौती देने के लिए हस्तक्षेप आवेदन दिये.
अयोध्या के प्रामाणिक इतिहासकार थे लाला सीताराम ‘भूप’
आधुनिक भारत में अयोध्या के प्रामाणिक इतिहासकार लाला सीताराम ‘भूप’ हैं. इनकी पुस्तक ‘अयोध्या का इतिहास’ राम जन्मभूमि प्रकरण में इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले में भी सबसे ज्यादा उद्धृत है. वह अयोध्या के मूल निवासी थे और अपने नाम से पहले ‘अवध वासी’ लिखा करते थे.
नाकाम रही मध्यस्थता
सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले को सुलझाने के लिए पहले मध्यस्थता के मार्ग को भी चुना. 11 मार्च, 2019 को तीन सदस्यों वाली मध्यस्थता समिति गठित की गयी. समिति ने एक अगस्त को अपनी पहली रिपोर्ट अदालत को पेश की थी, मगर पक्षकारों ने मध्यस्थता को नाकाम करार दिया. इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने छह अगस्त से खुली अदालत में सुनवाई शुरू की. इससे पहले कोर्ट ने हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच आम सहमति बनाने के लिए अयोध्या मध्यस्थता पैनल को 31 जुलाई तक का समय दिया था. पैनल में पूर्व न्यायाधीश एफएमआई कलीफुल्ला, श्री श्री रविशंकर और श्रीराम पंचू थे.
निजी तौर पर भी हुई कोशिश
सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता कमेटी के अलावा भी कई लोग निजी तौर पर मध्यस्थता में शामिल लोगों को सुलह के लिए समझाने का काम कर रहे थे.
इनमें सेंटर फॉर ऑब्जेक्टिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट के डायरेक्टर अतर हुसैन भी थे, मगर असफल रहे. उनका कहना था कि सुलह के लिए रिप्रजेंटेरेटिव सूट वाले दोनों पक्षकारों का इसमें राजी होना जरूरी था, लेकिन वक्त कम होने की वजह से जमीयत उलेमा-ए-हिंद को इसके लिए मनाया नहीं जा सका. थोड़ा वक्त और मिल जाता, तो सुलह हो जाती. वक्त कम होने से हमारी पूरी मेहनत जाया हो गयी.
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