छऊ को संरक्षण नहीं प्रमोशन कि जरूरत: संदीप मुरारका

/रफोटो9एसेकेल2- संदीप मुरारकासरायकेला. विश्व स्तर पर अपनी अमिट छाप रखने वाली छऊ को संरक्षण नहीं अपितु प्रमोशन की आवश्यकता है. ताकि इस कला का और विकास हो सके और कला से जुड़े कलाकार रोजगार प्राप्त कर सके .उक्त बातें सृजन वेलफेयर सोसाइटी के निदेशक संदीप कुमार मुरारका ने कही. उन्होंने कहा कि झारखंड कि कलानगरी […]
/रफोटो9एसेकेल2- संदीप मुरारकासरायकेला. विश्व स्तर पर अपनी अमिट छाप रखने वाली छऊ को संरक्षण नहीं अपितु प्रमोशन की आवश्यकता है. ताकि इस कला का और विकास हो सके और कला से जुड़े कलाकार रोजगार प्राप्त कर सके .उक्त बातें सृजन वेलफेयर सोसाइटी के निदेशक संदीप कुमार मुरारका ने कही. उन्होंने कहा कि झारखंड कि कलानगरी सरायकेला में दो वस्तुएं ऐसी हैं जिसके कारण इसकी अलग ही पहचान है. इसमें छऊ दूसरा लड्डु है. खाने पीने कि बात करें तो आगरा का पेठा, गया का तिलकूट, मुंबई का बड़ापाव, दिल्ली की चाट,पटना का लिट्टी, जयपुर का घेवर, चेन्नई का रेसम बडी काफी प्रसिद्ध है, तो सरायकेला का लड्डु क्यों और अधिक प्रसिद्ध नहीं हो सकता है. पूरे झारखंड में सरायकेला छऊ एक मात्र कला है, जहां के छह कलाकार को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है. इस कला के संरक्षण हेतु सरकार संवेदनशील है इसके लिए अकादमी स्थापित कर चुकी है. इस कला को थोड़ी और प्रमोशन कि जरूरत है. श्री मुरारका ने कहा कि सरायकेला का छऊ विश्व प्रसिद्ध है परंतु इस कला से जुड़े कलाकार अभाव कि जिंदगी जीते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सरायकेला शैली छऊ में मुखौटा का प्रयोग होता है. सरायकेला खरसावां जिला में वृहत्तम इंडस्ट्री हैं. अगर सभी औद्योगिक घराने उपहार स्वरूप छऊ मुखौटा का प्रयोग करते हैं तो मुखौटा से जुड़े कलाकारों को रोजगार भी मिल सकता है.
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