tribal population in jharkhand : आदिवासियों की घटती जनसंख्या दर पर सरकार चिंतित

Updated at : 06 Nov 2020 6:54 AM (IST)
विज्ञापन
tribal population in jharkhand : आदिवासियों की घटती जनसंख्या दर पर सरकार चिंतित

आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड को लेकर गृह विभाग ने जारी किया संकल्प

विज्ञापन

रांची : जनगणना 2021 में राज्य के आदिवासियों के लिए अलग सरना कोड का प्रावधान किये जाने को लेकर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने के लिए गृह विभाग ने संकल्प जारी किया है. राज्य सरकार ने इसमें आदिवासियों की घटती आबादी दर व भाषा संस्कृति को आधार बनाया है.

संकल्प में कहा गया है कि आदिवासियों की घटती हुई जनसंख्या वृद्धि दर एक गंभीर सवाल है. आदिवासी सरना समुदाय पिछले कई वर्षों से अपने धार्मिक अस्तित्व, भाषा व संस्कृति की रक्षा के लिए जनगणना कोड में प्रकृति पूजक सरना धर्मावलंबियों को शामिल करने की मांग को लेकर संघर्षरत है.

जनगणना 2001 के बाद जब आदिवासी आदिवासी जनसंख्या का प्रतिशत फिर एक बार कम हुआ, तो यह प्रतिक्रिया सामने आयी कि आखिर किस वजह से आदिवासियों की संख्या में लगातार कमी हो रही है. पिछले आठ दशकों में जनगणना के आकलन इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि आदिवासी जनसंख्या को प्रतिशत लगातार कम हुआ है.

जबकि, आजादी के बाद से उत्पन्न बड़ी समस्याओं में बढ़ती जनसंख्या देश के सामने बड़ी चुनौती है. वर्ष 1931 से 2011 के आदिवासी जनसंख्या के विश्लेषण से यह पता चलता है कि आठ दशकों में आदिवासी जनसंख्या का प्रतिशत 38.03 से घटकर 2011 में 28.02 फीसदी हो गया.

यानी 12 फीसदी की कमी आयी है. संकल्प में 1931 से 2001 के बीच का आदिवासी व गैर आदिवासी की वृद्धि दर का उल्लेख किया गया है. 1991 से 2001 के बीच आदिवासी जनसंख्या की वृद्धि दर 17.19 फीसदी व अन्य समुदाय की वृद्धि दर 25.65 फीसदी बताया गया है. कहा गया है कि आदिवासियों की जनसंख्या में गिरावट के कारण आदिवासी विकास की नीतियों में प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है. कई वर्षों के पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में से ऐसे जिलाें को हटाने की मांग की जा रही है, जहां आदिवासियों की संख्या में कमी आयी है.

हर 10 साल में 09 फरवरी से 28 फरवरी के बीच होती है जनगणना

प्रत्येक 10 वर्षों में जनगणना का कार्य 09 फरवरी से 28 फरवरी के बीच किया जाता है. उस वक्त यहां के आदिवासी दूसरे राज्यों में काम के लिए चले जाते हैं. जनगणना के दौरान दूसरे प्रदेशों में सामान्य जाति के तौर पर किया जाता है.

इसलिए जरूरी है कि हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई व जैन धर्मावलंबियों से अलग सरना अथवा प्रकृति पूजक आदिवासियों की पहचान के लिए व उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अलग सरना कोड आवश्यक है. इसलिए राज्य सरकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में आदिवासी/सरना धर्म कोड को राज्य में लागू करने के प्रस्ताव को केंद्र सरकार को भेजने की स्वीकृति प्रदान की जाती है.

अपने धार्मिक अस्तित्व, भाषा व संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं आदिवासी

1. सरना धर्मावलंबी आदिवासियों की गिनती स्पष्ट रूप से हो सकेगी. जनसंख्या का स्पष्ट आकलन होगा.

2. पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों, ट्राइबल सब प्लान के तहत मिलनेवाले अधिकारों, विशेष केंद्रीय सहायता के लाभ व भूमि के पारंपरिक अधिकारों सहित अन्य संवैधानिक अधिकार का लाभ मिल सकेगा.

3. आदिवासियों की भाषा, संस्कृति व इतिहास का संरक्षण व संवर्धन होगा.

1961 में हटा आदिवासियों का अलग धर्म कोड

संकल्प में कहा गया है कि 1871 से 1951 तक की जनगणना में आदिवासियों का अलग धर्म कोड था. लेकिन 1961-62 के जनगणना प्रपत्र से इसे हटा लिया गया. वर्ष 2011 की जनगणना में देश के 21 राज्यों में रहनेवाले 50 लाख आदिवासियों ने जनगणना प्रपत्र में सरना धर्म लिखा.

आगे क्या होगा

नियम के तहत गृह विभाग से संकल्प जारी होने के पूर्व संलेख को कैबिनेट से पास कराना होता है. लेकिन कैबिनेट की प्रत्याशा में मुख्यमंत्री का अनुमोदन प्राप्त कर संकल्प जारी किया गया है. आगे इसे विधानसभा के पटल पर रखा जायेगा. इसके बाद वहां से पास होने के बाद इसे राज्यपाल की अनुमति प्राप्त कर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जायेगा.

posted by : sameer oraon

विज्ञापन
Prabhat Khabar News Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar News Desk

यह प्रभात खबर का न्यूज डेस्क है। इसमें बिहार-झारखंड-ओडिशा-दिल्‍ली समेत प्रभात खबर के विशाल ग्राउंड नेटवर्क के रिपोर्ट्स के जरिए भेजी खबरों का प्रकाशन होता है।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola