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आजादी की खातिर खूब लड़े शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date

नसीम अहमद

झारखंड की कोख ने अमर शहीद शेख भिखारी व टिकैत उमराव सिंह को जन्म दिया, जिन्होंने देश को स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों की अनेक बर्बर यातनाएं सहीं और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया. छोटनागपुर की वीर भोग्या धरती के अमर लाल शहीद शेख भिखारी के पिता शेख बिलंदु अपने समय के नामी बहादुर थे. उस समय अंनगड़ा थाना क्षेत्र में औरागढ़ नामक राजा के बेटे ने हिरणी के दूध की इच्छा व्यक्त की. शेख बिलंदु ने जंगल से एक हिरणी को पकड़ कर पेश कर दिया. रानी ने खुश होकर एक शाही तलवार और पगड़ी के साथ-साथ 12 गांव की जमींदारी उन्हें प्रदान की. कहा जाता है कि वह तलवार अभी जरिया गढ़ गोविंदपुर में है.

शेख भिखारी का जन्म 1819 में ओरमांझी प्रखंड के पूर्वी इलाके खुदिया लोटवा गांव में हुआ था. 1857 में इनकी की उम्र 38 साल थी. बचपन से ही सैन्य संचालन में दक्षता थे. पश्चिमी इलाके में टिकैत उमराव सिंह का जन्म खंटगा गांव में हुआ था. राजा टिकैत उमराव सिंह ने उनकी बुद्धिमता से प्रभावित होकर ही उन्हें दीवान नियुक्त किया. ठाकुर विश्वनाथ शाही बड़कागढ़ हटिया ने शेख भिखारी को मुक्ति वाहिनी का सदस्य बनाया, जिसमें ठाकुर विश्वनाथ साहू ,पांडे गणपत राय, जय मंगल पांडे, नादिर अली खान, टिकैत उमराव सिंह, बृजभूषण सिंह, श्यामा सिंह, शिव सिंह, रामलाल सिंह, बिरजू राम, राम लाल सिंह आदि थे. शेख भिखारी टिकैत उमराव सिंह के दीवान थे. 1857 की क्रांति में राजा उमराव सिंह उनके छोटे भाई घासी सिंह और शेख भिखारी ने जिस शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन किया था, उनकी अनुगूंज आज भी सुनाई पड़ती है.

रांची में डोरंडा की सेना ने 31 जुलाई, 1857 को विद्रोह किया था. उसकी रहनुमाई जमादार माधव सिंह और सूबेदार नादिर अली खान ने किया था. इसका केंद्र चुटूपालू घाटी व ओरमांझी बना. शेख भिखारी इस संग्राम में शामिल थे. रण कुशल एवं दूरदर्शी शेख भिखारी ने सूबेदार नादिर अली, जमादार माधव सिंह को हर संभव अनेक प्रकार से सहायता प्रदान की.

2 अगस्त, 1857 को 2:00 बजे दिन में चुटूपालू की सेना ने रांची नगर पर अधिकार कर लिया. उस समय छोटनागपुर का आयुक्त इटी डाल्टन, जिला अधिकारी डेविस, न्यायाधीश ओकस तथा पलामू के अनुमंडल अधिकारी बच थे. सभी कांके पिठौरिया के रास्ते से बगोदर भाग गये. तब चाईबासा व पुरुलिया में क्रांति को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने सिख सैनिकों से सहायता ली. हजारीबाग में 2 सितंबर से 4 सितंबर 1857 तक सिख सैनिकों ने पड़ाव डाला. इसी बीच शेख भिखारी हजारीबाग पहुंचे. उन्होंने ठाकुर विश्वनाथ शाही सहदेव का पत्र सिख सेना के मेजर विष्णु सिंह को दिया और राजनीतिक सूझबूझ से मेजर विष्णु सिंह को अपने पक्ष में कर लिया.

शेख भिखारी ने संताल परगना में संताल विद्रोह के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया, जिसके फलस्वरूप वहां क्रांति की गति शुरू हुई. 1855 में ही सिद्धू- कान्हू ने हूल का बिगुल बजाया. शेख भिखारी का महत्वपूर्ण कदम चुटूपालू घाटी की नाकेबंदी था. अब टिकैत उमराव सिंह और शेख भिखारी की ओर अंग्रेजों का ध्यान गया. 10 अगस्त, 1857 को जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह की अपील डोरंडा पहुंची. 11 सितंबर को क्रांतिकारियों ने बाबू कुंवर सिंह की मित्र वाहिनी की सहायता करने का निर्णय लिया. मुक्ति वाहिनी क्रांतिकारी दस्ता डोरंडा से चला और कुडू चंदवा बालूमाथ होता हुआ चतरा पहुंचा. दस्ता डाल्टनगंज के मार्ग से रोहतास जाना चाह रहा था, किंतु रास्ता दुरूह था. लिहाजा, दस्ता चतरा से जगदीशपुर के लिए प्रस्थान कर गया.

चुटिया के जमींदार भोला सिंह साथ हो गये. सलंगी बालूमाथ के जगन्नाथ शाही, जो कुंवर सिंह के भाई दयाल सिंह के दामाद थे, रास्ते में मुक्ति वाहिनी के साथ हो गये. 30 सितंबर, 1857 को यात्रा फांसिहरी तालाब पहुंची. मंगल तालाब के पास पड़ाव डाला गया. दस्ते में उस समय लगभग 3,000 क्रांतिकारी थे. उधर, ब्रिटिश सेना का 53वां पैदल दस्ता 150 सैनिकों के साथ, 70वीं बंगाल पैदल दस्ता 20 सैनिकों के साथ और रैटरी सिख दस्ता 150 सैनिक के साथ शहर में प्रवेश कर गया.

चतरा का निर्णायक युद्ध 2 अक्तूबर, 1857 को लड़ा गया. मुक्ति वाहिनी जगदीशपुर न पहुंच सकी और उनका मुकाबला ब्रिटिश सेना से हो गया. इस युद्ध के नायक सूबेदार जय मंगल पांडे और सूबेदार नादिर अली खा थे. शेख भिखारी इस युद्ध में शामिल थे. एक घंटे तक यहां संघर्ष चला, जिसमें अंग्रेज विजय रहे. 150 देसी सैनिकों को 3 अक्तूबर को फांसी दे दी गयी. 77 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी देने के बाद एक गड्ढे में दफन कर दिया गया. जय मंगल पांडे एवं नादिर अली खान, दोनों सुबेदार को 4 अक्तूबर, 1857 को फांसी दी गयी.

ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पांडे गणपत राय एवं जमींदार माधव सिंह चतरा युद्ध से बच निकले थे. शेख भिखारी चुटूपालू घाटी की ओर प्रस्थान कर गये. शेख भिखारी ने अपनी मुहिम जारी रखी. वहीं, संताल विद्रोह को कुचलने के बाद मद्रास फौज के कप्तान मेजर मैकडोनाल्ड को बंगाल के गवर्नर ने आदेश दिया कि वह चुटूपालूू घाटी की तरफ बढ़े और शेख भिखारी की फौज का मुकाबला करे.

इधर, शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह भी चुटूपालू पहुंच गये और अंग्रेजों का रास्ता रोका लिया. उन्होंने घाटी की तरफ जाने वाले रास्ते पर अवरोध बनाया. पेड़ों की मोटी-मोटी डालियां काट कर सड़क पर डाल दी गयीं. जब अंग्रेजी सेना घाटी में पहुंची, तो पहाड़ों के ऊपर से उन्होंने अपने साथियों के साथ उस पर गोलियां चलानी शुरू कीं. जब गोलियां समाप्त हो गयीं, तब ऊपर से पत्थर लुढ़काना शुरू किया, किंतु अंग्रेज गुप्त मार्ग से उनके पास पहुंच गये. गोलियां तो पहले ही समाप्त हो चुकी थीं. साथी पकड़े गये, जिन्हें बाद में मृत्युदंड दिया गया.

इधर, स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों को भयभीत करने के लिए टिकैत उमराव सिंह और शेख भिखारी को कठोर सजा देने का अंग्रेजों ने फैसला किया. दोनों को पकड़ लिया गया. इस खबर से लोगों का आक्रोश और बढ़ा गया. चुटूपालू घाटी में भीड़ बढ़ने लगी. भीड़ और लोगों के आवेश से भयभीत होकर मैकडोनाल्ड ने रांची-ओरमांझी रास्ते में मोराबादी टैगोर हिल के निकट एक बरगद के पेड़ पर लटा कर दोनों के प्राण ले लिये गये. बाद में दोनों के शव को चुटूपालू घाटी में एक पेड़ पर टांग दिया गया.

हालांकि, कुछ इतिहासकारों का कहना है कि चुटूपालू घाटी में ही इन्हें फांसी दी गयी थी, जिसके कारण आज भी उस बरगद के पेड़ को फंसियारी बरगद कहा जाता है, जबकि दूसरी और मोराबादी के इस ऐतिहासिक स्थल को आज भी लोग टोनगरी फांसी कहते हैं. इस प्रकार 8 जनवरी, 1858 को इन अमर शहीदों ने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने प्रणों को निछावर कर दिया. दुखद यह है कि शेख भिखारी और नादिर अली खान की शहादत की अब भी इतिहासकार अनदेखी कर रहे हैं. वहीं शासन भी संवेदनहीन है. नजीता है कि रांची नगर के किसी चौराहे पर इन शहीदों कई प्रतिमा नहीं है.

शेख भिखारी व टिकैत उमराव सिंह :स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों को भयभीत करने के लिए टिकैत उमराव सिंह और शेख भिखारी को कठोर सजा देने का अंग्रेजों ने फैसला किया. दोनों को पकड़ लिया गया. इस खबर से लोगों का आक्रोश और बढ़ा गया. चुटूपालू घाटी में भीड़ बढ़ने लगी. भीड़ और लोगों के आवेश से भयभीत होकर मैकडोनाल्ड ने रांची-ओरमांझी रास्ते में मोराबादी टैगोर हिल के निकट एक बरगद के पेड़ पर लटा कर दोनों के प्राण ले लिये गये.

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