Rashtriya Poshan Maah 2020: झारखंड के करीब 48 फीसदी बच्चे कुपोषित, सबसे बुरा हाल पश्चिमी सिंहभूम का, रांची में पोषण जागरूकता रथ रवाना

Published at :07 Sep 2020 9:49 PM (IST)
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Rashtriya Poshan Maah 2020: झारखंड के करीब 48 फीसदी बच्चे कुपोषित, सबसे बुरा हाल पश्चिमी सिंहभूम का, रांची में पोषण जागरूकता रथ रवाना

Rashtriya Poshan Maah 2020: झारखंड देश के सबसे कुपोषित राज्यों में शामिल है. बिहार और मध्यप्रदेश दो ही राज्य ऐसे हैं, जहां झारखंड से अधिक कुपोषित बच्चे हैं. झारखंड में करीब आधे बच्चे (47.8 फीसदी) कुपोषण का शिकार हैं. कुपोषण से जूझ रहे झारखंड में राष्ट्रीय पोषण माह के तहत पोषण जागरूकता अभियान की शुरुआत की गयी है. राज्य के सभी जिलों में इस अभियान को सफल बनाने के लिए स्वास्थ्य सहियाएं एवं आंगनबाड़ी सेविकाएं व्यापक प्रचार-प्रसार कर रही हैं. राजधानी रांची में भी सोमवार को इसकी शुरुआत की गयी.

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रांची : कुपोषण से जूझ रहे झारखंड में राष्ट्रीय पोषण माह के तहत पोषण जागरूकता अभियान की शुरुआत की गयी है. राज्य के सभी जिलों में इस अभियान को सफल बनाने के लिए स्वास्थ्य सहियाएं एवं आंगनबाड़ी सेविकाएं व्यापक प्रचार-प्रसार कर रही हैं. राजधानी रांची में भी सोमवार को इसकी शुरुआत की गयी.

रांची के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पोषण से संबंधित जानकारी देने के लिए उपायुक्त ने पोषण जागरूकता रथ को हरी झंडी दिखाकर सोमवार को रवाना किया. उन्होंने बताया कि जागरूकता रथ के माध्यम से रांची जिला के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को उचित पोषण के बारे में जानकारी दी जायेगी.

लोगों को पोषण अभियान के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर पोस्टर, पम्पलेट, हैंडबिल के माध्यम से जागरूक किया जायेगा. उपायुक्त छवि रंजन ने बताया कि सितंबर महीने को राष्ट्रीय पोषण माह के रूप में मनाया जा रहा है. पौष्टिक आहार और उचित पोषण के प्रति जागरूकता के लिए इस अभियान में सबकी भागीदारी अपेक्षित है.

उन्होंने कहा कि इस महीने में हर व्यक्ति, संस्थान और प्रतिनिधि से उम्मीद है कि वे अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रांची जिला को कुपोषण मुक्त बनाने में सक्रिय भूमिका निभायेंगे. रांची की जिला समाज कल्याण पदाधिकारी सुमन सिंह ने बताया कि गर्भवती महिलाएं, धात्री महिलाएं, बच्चे एवं किशोरियों को पोषक आहार के रूप में क्या-क्या लेना चाहिए, इसके बारे में विस्तृत जानकारी दी जायेगी.

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उन्होंने बताया कि अभियान को सफल बनाने के लिए पंचायत प्रतिनिधि, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व अन्य को अपनी भूमिका से अवगत कराया गया है. आंगनबाड़ी सेविका गर्भवती महिलाओं की गोद भराई रस्म कोरोना महामारी को देखते हुए उनके घर जाकर करेंगी. साथ ही बच्चों का वजन जांच कर, कुपोषित बच्चों को चिन्हित कर कुपोषण उपचार केंद्र में भेजेंगी. सभी को पौष्टिक आहार लेने की सलाह भी दी जायेगी.

पूरे सितंबर महीने तक चलने वाले पोषण अभियान की थीम पोषण के पांच सूत्रों 1. जीवन के प्रथम 1000 दिन, 2. पौष्टिक आहार, 3. एनीमिया की रोकथाम, 4. डायरिया से बचाव और 5. स्वच्छता और साफ-सफाई पर केंद्रित है.

यहां बताना प्रासंगिक होगा कि झारखंड देश के सबसे कुपोषित राज्यों में शामिल है. बिहार और मध्यप्रदेश दो ही राज्य ऐसे हैं, जहां झारखंड से अधिक कुपोषित बच्चे हैं. झारखंड में करीब आधे बच्चे (47.8 फीसदी) कुपोषण का शिकार हैं.

पांच साल से कम उम्र के करीब 45.3 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं, जो राष्ट्रीय औसत से बहुत ज्यादा है. देश में इस उम्र के बच्चों में 38.4 फीसदी ही कुपोषित हैं. उचित पोषक आहार नहीं मिलने से बच्चों का विकास नहीं हो पाता और वे जीवन के हर दौड़ में पीछे रह जाते हैं. झारखंड के 47.8 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम है.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की वर्ष 2015-16 की रिपोर्ट बताती है कि कोल्हान प्रमंडल के पश्चिमी सिंहभूम के बच्चे सबसे ज्यादा कुपोषण का शिकार हैं. 5 साल से कम उम्र के 66.9 फीसदी बच्चों का वजन कम है. 59.4 फीसदी बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ी, तो 37.5 फीसदी का वजन कम रह गया. इस जिला में 13.1 फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जिनकी उनके उम्र के हिसाब से न तो लंबाई बढ़ी, न ही उनका वजन.

संथाल परगना के साहिबगंज के 50.2 फीसदी बच्चों की लंबाई कम रह गयी, तो 49.7 फीसदी का वजन उनकी लंबाई की तुलना में कम रह गया. 24.6 फीसदी की लंबाई नहीं बढ़ी, तो 10.4 फीसदी दोनों पैमाने पर कुपोषित निकले. गोड्डा के 54 फीसदी बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ पायी, तो पाकुड़ के 51.8 फीसदी की.

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राज्य के औद्योगिक जिलों का भी हाल कुछ अच्छा नहीं है. पूर्वी सिंहभूम में 40.6 फीसदी बच्चों की लंबाई उसके वजन के अनुपात में नहीं बढ़ा. 19.9 फीसदी का न तो वजन सही है, न ही उसकी लंबाई. इसी तरह बोकारो जिला में 36.9 फीसदी बच्चे ऐसे मिले, जिनका वजन उनकी लंबाई के हिसाब से पर्याप्त नहीं था, तो 17.6 फीसदी बच्चों की न तो लंबाई पर्याप्त थी, न ही उनका वजन ही उनकी उम्र के मुताबिक था.

पूर्वी सिंहभूम के 49.8 फीसदी बच्चों का वजन कम था, तो बोकारो के 50.8 फीसदी बच्चों का. पूर्वी सिंहभूम में 39.3 फीसदी बच्चों की लंबाई कम थी, तो बोकारो में 39.8 फीसदी का. सिमडेगा, दुमका और खूंटी जिले में भी बच्चों की स्थित कुछ मामलों में अच्छी नहीं है.

सिमडेगा के 36.7 फीसदी बच्चों की लंबाई कम है, तो दुमका में 41.4 और खूंटी में 43 फीसदी बच्चों का. दुमका में 21.8 फीसदी और खूंटी में 27.3 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं. यानी लंबाई और वजन दोनों ही मामलों में उनका उचित विकास नहीं हो पाया है.

Posted By : Mithilesh Jha

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