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"सिद्धो और कान्हू की गिरफ्तारी, उनको दी गयी फांसी के बारे में ब्रिटिश दस्तावेजों में लिखा है": सोना झारिया मिंज

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
सिद्धो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की नवनियुक्त कुलपति सोनाझारिया मिंज
सिद्धो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की नवनियुक्त कुलपति सोनाझारिया मिंज

1855 में ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों सहित साहूकारों, महाजनों और जमींदारों के खिलाफ पहले संताल आदिवासी विद्रोह हूल की याद में प्रत्येक साल झारखंड में हूल दिवस मनाया जाता है. क्योंकि इसी तिथि को वर्तमान में साहिबगंज जिले के बरहेट प्रखंड स्थित भोगनाडीह गांव में चार भाइयों सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने क्रांति का बिगुल फूंका था. हूल क्रांति, वर्तमान में आदिवासी जनमानस में हूल क्रांति के प्रभाव और समझ, हूल क्रांति में सिद्धो-कान्हू की बहन फूलो-झानो की भूमिका और झारखंड के गौरवशाली इतिहास को लेकर प्रभात खबर के संवाददाता सूरज ठाकुर ने सिद्धो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की नवनियुक्त कुलपति सोनाझारिया मिंज से बात की. पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश...........

1855 में हुई हूल क्रांति को पूरे 145 साल बीत चुके हैं. आप इस क्रांति और इसके प्रभाव को किस तरह देखती हैं?

सोना झारिया मिंज (वीसी, एसकेएमयू)- मैंने जब बतौर कुलपति सिद्धू कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका ज्वॉइन किया था, उसके एक सप्ताह बाद ही भोगनाडीह का दौरा किया जहां सिद्धो, कान्हू चांद, भैरव और उनकी बहनों फूलो-झानों का जन्म हुआ था. मैं पंचकठिया भी गयी थी जहां कान्हू मुर्मू को फांसी दी गयी. जितना मैं आंदोलन के बारे में जानती हूं, उसके मुताबिक ये केवल महाजनों के खिलाफ किया गया आंदोलन नहीं था. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी जब इस इलाके में आई तो उन्होंने वहां जमीनों की नीलामी की. जमींदारों को उसे ठेके पर दिया. संताल आदिवासियों से वहां खेती का काम करवाया गया. पहले वहां वस्तु विनिमय की व्यवस्था थी लेकिन कंपनी सरकार ने लगान को पैसे में वसूलना शुरू किया. इसकी वजह से संताल आदिवासी महाजनों पर निर्भर हो गये. लगान को लेकर ऐसा जाल बुना गया कि आदिवासियों को पता ही नहीं चला कि कब उनकी जमीन उनके हाथ से निकल गयी.

जब उन्हें समझ आया कि उनका किन-किन तरीकों से शोषण किया जा रहा है तो उन्होंने महाजनों, साहूकारों और जमींदारों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया. इन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी का संरक्षण मिला हुआ था इसलिये आदिवासी क्रांतिकारियों की सीधी टक्कर कंपनी सरकार से हो गयी. इस आंदोलन की रूपरेखा, सिद्धो और कान्हू की गिरफ्तारी, उनको दी गयी फांसी के बारे में ब्रिटिश दस्तावेजों में लिखा है. इसलिये ये किवदंती नहीं बल्कि 1857 के सैनिक विद्रोह से पहले आदिवासियों द्वारा छेड़ी गयी क्रांति का एतिहासिक साक्ष्य है.

वर्तमान आदिवासी समाज में हूल क्रांति की प्रेरणा नहीं दिखती. उसका प्रभाव भी नहीं दिखता. आज भी काफी पिछड़ापन है?

सोना झारिया मिंज (वीसी, एसकेएमयू)- देखिये, इसके कई आयाम हैं. कारण जो भी रहा हो, आज भी वहां अशिक्षा है. यहां अशिक्षा से मेरा मतलब केवल निरक्षरता से नहीं है बल्कि सामाजिक स्तर पर जानकारी से है. आप पायेंगे कि आदिवासी समाज एक नागरिक के तौर पर अपने हक और अधिकारों को लेकर सजग नहीं है, क्योंकि उन्हें इसके बारे में पता ही नहीं है. इसका कारण आर्थिक भी है. एक आम आदिवासी का पूरा समय ये सोचने में निकल जाता है कि दो जून की रोटी का इंतजाम कैसे किया जाये. वैसे में वो कहां अपने नागरिक अधिकारों की समझ रख पायेगा. इसलिये, इस दिशा में प्रयास किये जाने चाहिये. मूलभूत सुविधायें मिले. उनकी आर्थिक स्थिति सुधरे. उनके गौरवशाली अतीत और सामाजिक व्यवस्था से उनको अवगत करवाया जाये. तभी बदलाव आयेगा. तभी वो जान पायेंगे कि उनके पूर्वजों द्वारा किये गये संघर्ष के मायने क्या हैं.

रही बात पिछड़ापन की तो मुझे ये विरोधाभाषी शब्द लगता है. मैं समझ नहीं पाती हूं कि इस आदिवासियों के लिये इस शब्द का प्रयोग किस संदर्भ में किया जा रहा है. यदि ये उनके सामाजिक परिवेश, खानपान, रहन सहन और आवास के संदर्भ में है तो फिर मुझे इससे आपत्ति है. क्योंकि ये सभी चीजें आदिवासियों की संस्कृति, उनकी पहचान और अस्तित्व से जुड़ी हैं. हां यदि इस शब्द का प्रयोग अशिक्षा के संदर्भ में किया जा रहा है तो हां ये सच है कि शिक्षा के दृष्टिकोण से थोड़ा पिछड़ापन है. इसमें सुधार की जरूरत है.

कहा जाता है कि हूल क्रांति में फूलो-झानो की भी अहम भूमिका थी लेकिन उन्हें इसका श्रेय नहीं मिलता. महिलाओं को इतिहास में नजरअंदाज क्यों किया जाता है?

सोना झारिया मिंज (वीसी, एसकेएमयू)- फूलो-झानों का ज्यादा उल्लेख क्यों नहीं मिलता, मैं इसकी ठोस वजह तो नहीं जानती. लेकिन जब मैं भोगनाडीह गयी थी तो मुझे बताया गया कि कंपनी सरकार, सहित महाजनों और साहूकारों के खिलाफ संघर्ष करना चाहिये, इसका आइडिया फूलो और झानो का ही था. मुझे ये बात दिलचस्प लगी. हालांकि इस बात का अभी तक कोई लिखित प्रमाण नहीं है लेकिन मैं कोशिश करूंगी कि मेरे कार्यकाल में इस बारे में विस्तृत रिसर्च हो. विस्तार से इस बारे में लिखा जाये.

झारखंड में औपनिवेशिक सत्ता के दौरान किये गये संघर्षों को बड़े इतिहासकारों ने बहुत कम जगह दी है. आपके कार्यकाल में क्या इस दिशा में कुछ प्रयास किये जायेंगे.

सोना झारिया मिंज (वीसी, एसकेएमयू)- इतिहासकारों ने विस्तार से जगह क्यों नहीं दी, मैं इसकी आलोचना या इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती. इतिहास लेखन करते वक्त हर व्यक्ति का अपना प्वॉइंट ऑफ व्यू होता है.

जहां तक बात झारखंड के इतिहास की है तो मैंने ज्वॉइन करने के बाद कई लोगों से इस बारे में बात की है. मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि झारखंड के गौरवशाली इतिहास, भौगोलिक स्थिति से उसका संबंध और वर्तमान में उसके प्रभाव पर विस्तृत अध्ययन और शोध हो. ब्रिटिश दस्तावेजों में जो भी लिखा है उन्हें ढूंढ़ा जाये, कई स्त्रोतों से जानकारी इकट्ठा करके उसे टेस्ट बुक्स की शक्ल दी जाये. अलग-अलग नजरिये यानी कि एतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से छात्रों को पढ़ाया जाये.

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