मानिकतला बमकांड में गिरफ्तार किये गये थे 39 क्रांतिकारी
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 02 Jun 2022 10:08 AM
वर्ष 1908 में आजादी की लड़ाई में बंगाल के युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. उस दौरान काफी युवक अनुशीलन समिति नामक संगठन की शाखाओं से जुड़ कर क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे.
वर्ष 1908 में आजादी की लड़ाई में बंगाल के युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. उस दौरान काफी युवक अनुशीलन समिति नामक संगठन की शाखाओं से जुड़ कर क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे. वर्ष 1908 में ही फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक रूसी क्रांतिकारी गुप्त तरीके से दुनियाभर के क्रांतिकारियों को बम बनाने और हथियार चलाने के लिए ट्रेनिंग दे रहा था.
ट्रेनिंग लेने के लिए संगठन के सक्रिय नेता हेमचंद्र कानूनगो को फ्रांस भेजा दिया गया. जब वे ट्रेनिंग लेकर भारत लौटे, तो संगठन के प्रमुख नेता अरबिंदो घोष के पिता सिविल सर्जन कृष्णधन घोष की कोठी के परिसर में ही गुप्त तरीके से बम बनाने की एक फैक्टरी स्थापित कर दी गयी. मगर ब्रिटिश अधिकारियों को इसकी भनक लग गयी.
इस कांड में करीब 39 क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए, जिनमें अरबिंदो घोष के छोटे भाई वारींद्र कुमार घोष भी थे. पुलिस ने 2 जून, 1908 को अरबिंदो घोष को भी पकड़ लिया. इस मामले में देशबंधु चितरंजन दास ने अरबिंदो का बचाव किया. केस में सरकारी गवाह बने नरेंद्र गोसाई की क्रांतिकारी कन्हाई लाल दत्त और सत्येंद्र बोस ने हत्या कर दी थी.
अरबिंदो घोष का जन्म 15 अगस्त, 1872 को कलकत्ता में हुआ था. वह एक योगी, द्रष्टा, दार्शनिक, कवि और भारतीय राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने आध्यात्मिक विकास के जरिये पृथ्वी पर दिव्य जीवन के दर्शन को प्रतिपादित किया. उनकी प्रारंभिक शिक्षा दार्जिलिंग के एक क्रिश्चियन कॉन्वेंट स्कूल में शुरू हुई.
अरबिंदो के पिता कृष्णधन घोष एक चिकित्सक थे और ब्रह्म समाज से जुड़े हुए थे. वह अपने बेटे को उच्च प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहते थे, इसलिए बचपन में ही इन्हें भाइयों के साथ इंग्लैंड भेज दिया. वहां महज 18 वर्ष की उम्र में ही इन्होंने प्रशासनिक सेवा के लिए जरूरी आइसीएस की परीक्षा पास कर ली. उन दिनों इस सेवा के लिए घुड़सवारी की परीक्षा में उत्तीर्ण होना जरूरी था, लेकिन देशभक्ति का ऐसा जज्बा इनके अंदर जगा कि इन्होंने जान-बूझकर घुड़सवारी की परीक्षा देने से मना कर दिया. इनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश काफी प्रभावित हुए और उन्होंने अरबिंदो को अपने यहां शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया.
अरबिंदो को भारतीय एवं यूरोपीय दर्शन और संस्कृति का अच्छा ज्ञान था. उनका मानना था कि भारत को स्वतंत्रता मिलने पर यह देश विश्व में एक नया इतिहास रचेगा. इन्होंने युवाओं को आजादी और क्रांति की शिक्षा दी और अंग्रेजी दैनिक ‘वंदे मातरम्’ का प्रकाशन किया. ब्रिटिश चीजों का खुल कर बहिष्कार किया और लोगों को सत्याग्रह आंदोलन के लिए तैयार रहने को कहा. आजादी की बात करने पर अंग्रेजों ने इन्हें एक साल के लिए जेल भेज दिया.
कारावास के दौरान अरबिंदो घोष ने योग और ध्यान में अपनी रुचि को विकसित किया. जेल से बाहर निकलते ही प्राणायाम करना और ध्यान लगाना शुरू कर दिया. इसके बाद वह कोलकाता छोड़कर पांडिचेरी में अपने दोस्त के साथ रहने लगे. यहीं आश्रम स्थापित किया.
1914 में अरबिंदो ने आर्य नामक दार्शनिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया. इसमें गीता का वर्णन, वेदों के रहस्य, उपनिषद आदि कई चीजों को शामिल किया. अरबिंदो का केवल एक ही लक्ष्य था कोई भी व्यक्ति बेड़ियों में न रहे. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश सेवा और अध्यात्म में बिता कर 5 दिसंबर, 1950 को हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं.
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