रांची : बालू व पत्थर खदानों की पर्यावरण स्वीकृति पर रोक

Updated at : 23 Dec 2018 6:34 AM (IST)
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रांची  : बालू व पत्थर खदानों की पर्यावरण स्वीकृति पर रोक

एनजीटी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को नयी गाइडलाइन जारी करने का दिया निर्देश जेएसएमडीसी के 14 बालू घाटों का मामला फंसा सुनील चौधरी रांची : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेशानुसार, अब जिला स्तर पर पत्थर खदानों और बालू घाटों को पर्यावरण क्लियरेंस प्रदान करने पर रोक लगा दी गयी है. एनजीटी ने यह […]

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एनजीटी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को नयी गाइडलाइन जारी करने का दिया निर्देश
जेएसएमडीसी के 14 बालू घाटों का मामला फंसा
सुनील चौधरी
रांची : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेशानुसार, अब जिला स्तर पर पत्थर खदानों और बालू घाटों को पर्यावरण क्लियरेंस प्रदान करने पर रोक लगा दी गयी है. एनजीटी ने यह आदेश इसी साल 13 सितंबर और 11 दिसंबर को दिया है. इसके साथ ही झारखंड के 14 बालू घाटों का मामला स्टेट इनवाॅयरमेंट इंपैक्ट असेसमेट अथॉरिटी (सिया) के पास फंस गया है.
सरकार ने बड़े बालू घाटों की जिम्मेवारी जेएसएमडीसी को सौंपी है. जेएसएमडीसी की ओर से अब तक खूंटी एवं गढ़वा में दो बालू घाटों को चालू किया गया है. 14 बालू घाटों का आवेदन स्टेट इनवॉयरमेंट इंपैक्ट असेसमेट अथॉरिटी के यहां पर्यावरण स्वीकृति के लिए लंबित था. 11 दिसंबर 2018 के एनजीटी के आदेश के बाद अब यह मामला लंबित हो गया है.
केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 15 जनवरी 16 को पांच से 25 हेक्टेयर तक के बी-1 कैटगरी के बालू घाटों के पर्यावरण स्वीकृति के लिए आदेश जारी किया था.
इसके तहत बालू, स्टोन क्रशर और स्टोन माइंस जैसे लघु खनिज के लिए पर्यावरण क्लियरेंस सर्टिफिकेेट जिलास्तर पर ही देने की व्यवस्था की गयी थी. इसके लिए जिलास्तरीय अथॉरिटी को पास आवेदन देना होता था.
झारखंड में पांच हेक्टेयर तक के लघु खनिज से संबंधित पर्यावरण क्लियरेंस के मामलों के लिए डिस्ट्रिक्ट इनवाॅयरमेंट इंपेक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी (डिया) को अधिकृत किया गया था. जिले में चार सदस्यीय अथॉरिटी के अध्यक्ष उपायुक्त होते हैं. तकनीकी मामलों के लिए इस अथॉरिटी के अंतर्गत डिस्ट्रिक लेबल एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी (डीइएसी) काम कर रही थी. साथ ही पांच हेक्टेयर से अधिक के लिए राज्यस्तर पर स्टेट इनवाॅयरमेंट इंपैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी बनाया गया था. केंद्र की अधिसूचना के निर्गत होने के साथ ही झारखंड के सभी जिलों में अथॉरिटी का गठन कर अब तक बालू घाटों और स्टोन माइंस के लिए पर्यावरण स्वीकृति दी जा रही थी. इसमें केवल कागजात की जांच की जाती थी. पर्यावरण पर प्रभाव का अध्ययन, सौशल इंपैक्ट असेसमेंट आदि का प्रावधान नहीं था.
विक्रांत टोंगद व अन्य बनाम भारत सरकार मामला : एनजीटी की ओर से 13 जुलाई 2018 को विक्रांत टोंगद व अन्य बनाम भारत सरकार के मामले में डीइआइएए और डीइएसी द्वारा बालू घाटों के पर्यावरण स्वीकृति देने पर लगा दी गयी थी. कहा गया था कि इनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया जाता है. जिलास्तरीय कमेटी में प्रशासनिक अधिकारी होते हैं, जिन्हें पर्यावरण का अनुभव नहीं है.
न ही इनके द्वारा पर्यावरण के मानकों का पालन किया जा रहा है. एनजीटी ने भारत सरकार के 15 जनवरी 2016 की अधिसूचना के अनुरूप पर्यावरण स्वीकृति दिये जाने पर ही रोक लगा दी. साथ ही भारत सरकार को आदेश दिया गया कि नयी अधिसूचना जारी करे, जिसमें पांच से 25 हेक्टेयर तक के बालू घाटों का पर्यावरण स्वीकृति 25 से 50 हेक्टेयर तक के बड़े बालू घाटों जो बी-टू कैटगरी में हैं, की तर्ज पर ही दी जाये.
यानी मंजूरी देने के पूर्व पर्यावरण इंपैक्ट असेसमेंट कराने का प्रावधान भी किया जाये. इसके बाद उत्तर प्रदेश और केरल सरकार ने दोबारा आदेश जारी कर 15 जनवरी 2016 के अनुरूप ही पर्यावरण स्वीकृति देने का आदेश दे दिया. जिस पर विक्रांत टोंगद ने अवमाननावाद दाखिल किया. इस पर 11 दिसंबर 2018 को एनजीटी ने पुन: आदेश दिया और 15 जनवरी 2016 की अधिसूचना के अनुसार पर्यावरण स्वीकृति दिये जाने पर रोक लगा दी. साथ ही वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को 31 दिसंबर तक संशोधित अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया है.
जानकार बताते हैं कि एनजीटी के इस आदेश पर जब तक नयी अधिसूचना जारी नहीं होती, तब तक राज्य स्तर पर सिया और जिला स्तर पर डिया किसी भी बालू घाटों और पत्थर खदानों को पर्यावरण स्वीकृति नहीं दे सकता.
अब लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा बालू घाटों को
एनजीटी ने अपने आदेश में बी-1 कैटगरी के बालू घाटों को पर्यावरण स्वीकृति बी-2 कैटगरी (25 से 50 हेक्टेयर) की तर्ज पर देने का आदेश दिया है.
यानी अब बालू घाटों के संचालन के पूर्व पब्लिक हियरिंग होगी. सोशल इंपैक्ट असेसमेंट कराना होगा. फिर ग्राम सभा से अनुमति लेनी होगी. इन सभी प्रक्रियाओं को पूरी करने में करीब एक साल लग सकते हैं. इसके बाद ही बालू घाटों से बालू का उत्खनन किया जा सकेगा.
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