1857 सिपाही विद्रोह के अगुआ राजा अर्जुन सिंह

Updated at : 03 Sep 2018 7:38 AM (IST)
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1857 सिपाही विद्रोह के अगुआ राजा अर्जुन सिंह

शैलेंद्र महतो मानकी मुंडा व्यवस्था के लागू होने से पहले ही सिपाही विद्रोह की चपेट में आ गया था सिंहभूम सिंहभूम के राजा अर्जुन सिंह की राजधानी चक्रधरपुर में थी. झारखंड में शांति का साम्राज्य होने तथा कप्तान सर थॉमस विल्किंसन की चलायी प्रशासनिक मानकी मुंडा व्यवस्था के फलीभूत होने से पहले ही सिंहभूम सिपाही […]

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शैलेंद्र महतो

मानकी मुंडा व्यवस्था के लागू होने से पहले ही सिपाही विद्रोह की चपेट में आ गया था सिंहभूम

सिंहभूम के राजा अर्जुन सिंह की राजधानी चक्रधरपुर में थी. झारखंड में शांति का साम्राज्य होने तथा कप्तान सर थॉमस विल्किंसन की चलायी प्रशासनिक मानकी मुंडा व्यवस्था के फलीभूत होने से पहले ही सिंहभूम सिपाही विद्रोह की चपेट में आ गया था.

रांची एवं हजारीबाग में सिपाहियों के बगावत करने पर उन्हें दबाने के लिए रामगढ़ बटालियन की टुकड़ी भेजी गयी, लेकिन वे भी बागी हो गये. इस खबर से घबरा कर चाईबासा के प्रधान सहायक आयुक्त कप्तान सिस्मोर चाईबासा छोड़ सरायकेला के राजा चक्रधारी सिंह की शरण में चला गया और कुछ दिन बाद चक्रधारी सिंह को सिंहभूम राज्य का जिम्मा सौंप स्वयं कलकत्ता भाग गया.

विद्रोही सिपाहियों ने तीन सितंबर 1857 को चाईबासा में सरकारी खजाने से 20 हजार रुपये लूट लिये, जेल का फाटक तोड़ दिया और करीब 250 सैनिक वहां से भाग निकले. वे रांची में बागियों से मिलने की इच्छा जताते हुए बंदूकें लेकर रांची की ओर बढ़े. उस दिन काफी वर्षा भी हो रही थी, जिससे उफनाई संजय नदी ने चक्रधरपुर में फौज को आगे बढ़ने से रोक दिया. उस समय नदी पर कोई पुल नहीं बना था.

दूसरी ओर सरायकेला के राजा चक्रधर सिंह और खरसावां के ठाकुर हरिसिंह ने अपनी सीमाओं पर चौकसी बढ़ा दी, ताकि ये बागी उनकी सीमा में न प्रवेश कर जायें. इस स्थिति में सिंहभूम के राजा अर्जुन सिंह को दया आ गयी. उन्होंने सैनिकों को शरण देने के लिए जग्गू दीवान को दो हाथियों के साथ भेजा, जिनकी मदद से बागी सैनिक सात सितंबर को चैनपुर के बाबू घाट पर दो हाथियों के सहारे नदी पार हुए.

बागियों को चैनपुर के जमींदार के घर ठहराया गया. उधर, नदी पार करने में पांच दिन लगने के कारण सैनिकों की हालत बिगड़ने लगी. कई फौजियों ने राजा के यहां नौकरी कर ली. उन्होंने सरकारी खजाने से लूटे 20 हजार रुपये और बंदूकें भी राजा को सौंप दीं. राजा अर्जुन सिंह ने फौजियों की सभा बुलाकर उन्हें संरक्षण का भरोसा दिलाया.

16 सितंबर को कैप्टन सिस्मोर की जगह नियुक्त लेफ्टिनेंट आरसी वर्च सरायकेला और खरसावां के राजाओं समेत हजार लोगों को लेकर चाईबासा पहुंचे. वर्च ने विगत घटनाओं की समीक्षा करते हुए राजा अर्जुन सिंह को बागी एवं विद्रोही घोषित कर उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया.

अंग्रेज शासन की इस कार्रवाई के मद्देनजर राजा अर्जुन सिंह गढ़ छोड़ अपनी प्रजा, कोल, कुड़मी और स्थानीय जनता के साथ रहने लगे. क्षेत्र की जनता ने ओटार गांव में सभा कर राजा अर्जुन सिंह का साथ देने की घोषणा की, जबकि सरायकेला एवं खरसावां के राजा, केरा के ठाकुर और आनंदपुर का जमींदार, ये सभी अंग्रेजों के साथ थे. ऐसे में जनता ही अर्जुन सिंह का सहारा थी. इससे वे जनांदोलन के नेता बन गये.

17 जनवरी 1858 को कर्नल फॉस्टर के अधीन शेखवत्ती बटालियन चाईबासा भेजी गयी, जिसने तीन-चार दिन में ही अर्जुन सिंह का चक्रधरपुर स्थित गढ़ एवं चक्रधरपुर गांव को नष्ट कर ढेरों कोल-कुड़मियों व स्थानीय लोगों का कत्ल कर डाला.

अर्जुन सिंह एवं उनके समर्थक कुछ दिन तक उनका सामना करते रहे. मार्च 1858 से लेकर जून तक सरकारी फौजों से अनवरत युद्ध चलता रहा. अंतत: विद्रोही, जंगलों तथा पहाड़ी भागों में शरण लेने को बाध्य हुए. कई लोगों को फांसी दे दी गयी तो कई को काला पानी भेजा गया. इन हालात में भी राजा अर्जुन सिंह नहीं पिघले. तब अंग्रेजों ने साजिश व दबाव की नीति अपनायी.

अर्जुन सिंह को आत्मसमर्पण कराने के लिए उनके ससुर, मयूरभंज के राजा को मोहरा बनाया. अंग्रेज शासन ने उन्हें धमकाया कि वे अपने दामाद अर्जुन सिंह का आत्मसमर्पण नहीं कराते, तो उन्हें भी राज्य से हाथ धोना पड़ेगा. दबाव में अर्जुन सिंह ने 15 फरवरी 1859 को समर्थकों के साथ छोटानागपुर के आयुक्त डाल्टन के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और सिंहभूम का सिपाही विद्रोह दब गया.

अंग्रेजों ने राजा अर्जुन सिंह को राज बंदी बना बनारस जेल भेज दिया. 1890 में वहीं उनकी मृत्यु हुई. उधर, राजा अर्जुन सिंह के शासन के अधीन सिंहभूम में प्रशासनिक परिवर्तन किये गये. कुछ इलाके सरायकेला और खरसावां में मिला दिये गये और एक नये राज्य पोड़ाहाट का गठन किया गया.

अर्जुन सिंह के एकमात्र पुत्र कुंवर नरपत सिंह को नव गठित पोड़ाहाट का राजा बनाया गया. वर्ष 1934 में नरपत सिंह की मृत्यु के बाद से 1947 तक पोड़ाहाट अंग्रेजी शासन में रहा. लेखक पूर्व सांसद व झारखंड आंदोलनकारी हैं.

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