घर की देहरी लांघ बनायी पहचान

Updated at : 08 Mar 2018 4:28 AM (IST)
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घर की देहरी लांघ बनायी पहचान

कुड़ू : प्रखंड के विश्रामगढ़ निवासी मुकेश साहू की पत्नी तथा क्षेत्र में सहिया दीदी के रूप में पहचान बनानेवाली रेखा देवी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है. रेखा देवी की शादी मुकेश साहू से साल 2006 में हुई थी. पति मुकेश साहू खेती-बारी और टेंपो चलाने का काम करते हैं. रेखा देवी […]

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कुड़ू : प्रखंड के विश्रामगढ़ निवासी मुकेश साहू की पत्नी तथा क्षेत्र में सहिया दीदी के रूप में पहचान बनानेवाली रेखा देवी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है. रेखा देवी की शादी मुकेश साहू से साल 2006 में हुई थी. पति मुकेश साहू खेती-बारी और टेंपो चलाने का काम करते हैं. रेखा देवी के दो बच्चे हैं, बड़ी पुत्री पिहू कुमारी (9) तथा पुत्र सक्षम कुमार (6) वर्ष है. पुत्री पिहू होली फेथ पब्लिक स्कूल में तथा सक्षम कुमार अविराम एकेडमी में पढ़ रहा है.

रेखा देवी का सपना दोनों बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना है़ 12 साल पहले शादी के बाद घर का चौका-बरतन संभालने वाली रेखा आज गर्भवती महिलाओं, मनरेगा मजदूरों के लिए एक मिसाल बन गयी है. स्वास्थ सेवा के क्षेत्र में बेहतर काम करने के लिए स्वास्थ विभाग झारखंड सरकार ने रेखा को दो बार सम्मानित किया है. स्वास्थ विभाग से मिली स्कूटी से रेखा मनरेगा के तहत संचालित विकास कार्यों की निगरानी तथा मजदूरों की हाजरी बनाने जाती है.

इतना ही नहीं रेखा देवी ममता वाहन से गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए खुद वाहन चला कर केंद्र तक लाती हैं. रेखा देवी की शादी कुड़ू प्रखंड के विश्रामगढ़ निवासी मुकेश साहू से हुई है. प्रारंभ में रेखा देवी घर की देहरी लांघने से कतराती थी. गांव-समाज के भय से घर का चौका-बरतन तक सीमित थी. लेकिन घर की माली हालत ठीक नहीं रहने और बच्चों की पढ़ाई को लेकर रेखा परेशान हो गयी. रेखा साल 2009 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन के तहत सहिया के रूप चयनित हुई़ं सेवाभाव से काम शुरू किया. लेकिन रेखा की डगर आसान नहीं थी़ गांव-समाज के ताने-बाने ने रेखा को झकझोर कर रख दिया.

लेकिन पति का प्रोत्साहन मिलते ही रेखा के हौसले को चार चांद लग गया. तीन साल के भीतर रेखा की मेहनत रंग लायी. क्षेत्र में सहिया दीदी के रूप पहचान बनायी. संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देते हुए अंधेरी रात, मूसलाधार बारिश,कंपकपाती ठंड या फिर देह जलाने वाली गर्मी सभी मौसम में रेखा ने गर्भवती महिलाओं की सेवा की. रेख के सेवा काे सम्मान भी मिला़ राष्ट्रीय स्वास्थ मिशन के तहत साल 2013 – 2014 में स्वास्थ के क्षेत्र में बेहतर काम करने के लिए राज्य स्तर पर प्रशस्ती पत्र मिला.

यह इनाम रेखा के लिए काफी नहीं था. इसी दौरान रेखा का चयन मनरेगा मेट के रूप में किया गया. मनरेगा में काम करनेवाले मजदूरों को समय पर मजदूरी दिलाने, मजदूरों को रोजगार दिलाने का प्रयास शुरू की. क्षेत्र में काम करते हुए रेखा ने अपनी अलग पहचान बनायी. साल 2015 में रेखा के काम को देखते हुए राज्य सरकार ने स्वास्थ सेवा के रूप मे बेहतर काम करने का इनाम दिया. राज्य सरकार के स्वास्थ विभाग ने रेखा को एक स्कूटी दी. इसी स्कूटी से रेखा मनरेगा के कार्यों की निगरानी करती है. इसी दौरान साल 2016 में एक घटना हुई जब काली अंधेरी रात में मूसलाधार बारिश हो रही थी इसी बीच एक गर्भवती महिला के परिजन उसके पास पहुंचे तथा गर्भवती को अस्पताल ले जाने की बात कही. साधन नहीं होने से रेखा काफी परेशान हुई.

लेकिन उसने हार नहीं मानी अपने पति के टेंपो से वह गर्भवती महिला को कुड़ू लेकर आयी और सुरक्षित प्रसव कराया. रेखा ने उसी दिन संकल्प लिया कि वह चार पहिया वाहन खरीदेगी और खुद चालक बनेगी. रेखा ने तीन महीने बाद मारूति कंपनी की ओमनी वैन लोन पर खरीदी और गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण पति से लिया. रेखा पिछले दो साल में पांच दर्जन से ज्यादा महिलाओं को ममता वाहन से लेकर कुड़ू लायी और संस्थागत प्रसव कराया. क्षेत्र में रेखा की पहचान सहिया दीदी के रूप मे बन गयी है. रेखा बताती है कि शुरू में थोड़ी परेशानी हुई पर पति का सहयोग मिला. अगला लक्ष्य महिलाओं की सेवा निष्ठापूर्वक करने का है. इसके अलावा भी रेखा को कई सम्मान मिला है.

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