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विश्व मानवाधिकार दिवस : अपने अधिकारों को जानें, तभी शोषण से मिलेगी मुक्ति

Updated at : 10 Dec 2023 4:52 AM (IST)
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विश्व मानवाधिकार दिवस : अपने अधिकारों को जानें, तभी शोषण से मिलेगी मुक्ति

इस संसार में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार मिला है. या यूं कहें कि उन्हें बेहतर जीवन जीने के लिए विशेष अधिकार मिला हुआ है. बावजूद इसके लोग शोषित और पीड़ित हैं. ऐसा इसलिए कि वे अपने अधिकारों को नहीं जानते हैं.

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लाइफ रिपोर्टर @ जमशेदपुर की रिपोर्ट : अधिकार और पीड़ित दोनों शब्दों का एक-दूसरे से गहरा संबंध है, जब बात मानवाधिकार की होती है. यानि वे लोग, जो अपने अधिकारों को जानते हुए पीड़ित या पीड़िता बन जाते हैं. इस संसार में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार मिला है. या यूं कहें कि उन्हें बेहतर जीवन जीने के लिए विशेष अधिकार मिला हुआ है. बावजूद इसके लोग शोषित और पीड़ित हैं. ऐसा इसलिए कि वे अपने अधिकारों को नहीं जानते हैं. विश्व भर में प्रतिवर्ष 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है. इसका एक ही उद्देश्य है कि लोगों को उनके अधिकारों के बारे में सचेत किया जाये. उन्हें जागरूक किया जाये. यूं तो अपने शहर में कई ऐसे संगठन, संगठन प्रतिनिधि व निजी तौर काम करने वाले लोग हैं, जो लंबे समय से लोगों को उनके अधिकारों से अवगत करवा रहे हैं. वे शोषित व्यक्ति को उनका अधिकार दिलवाने के लिए जन आंदोलन से लेकर कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाते नहीं थकते. इनके इसी प्रयास से कई लोगों को उनका खोया हुआ सम्मान, नाम, पहचान और स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार प्राप्त हुआ.

ग्रमीण महिलाओं को दिलाया उनका अधिकार : अर्चना सिंह

आदित्यपुर निवासी अर्चना सिंह मानवाधिकार संगठन से जुड़ी हैं. इसके पहले वह जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज के छात्र संगठन की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं. पिछले आठ साल से वह ग्रामीण महिलाओं के अधिकार पर काम कर रही हैं. स्थानीय महिला, जो कि घरेलू हिंसा की शिकार हो चुकी थी और ससुराल से बेघर कर दी गयी थी, आज अर्चना के प्रयास से उसकी समस्याओं का निदान करते हुए सम्मान के साथ ससुराल में रहने का अधिकार दिलवाया गया. डिमना रोड स्थित एक कॉल सेंटर, जहां काम करने वाली छात्राओं को नाइट शिफ्ट कराने के लिए मजबूर किया जा रहा था. इसके खिलाफ भी अर्चना ने आवाज उठायी और उन्हें न्याय दिलायी. अर्चना बताती हैं कि शहर से ज्यादा गांव की स्थिति दयनीय है. गांव की महिलाएं जागरूक नहीं हैं. इसलिए उन्हें छल बल से हमेशा ही अत्याचार का शिकार होना पड़ता है.

कैदियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं समाजसेवी जवाहरलाल शर्मा

मानवाधिकार यह शब्द सुनना और लिखना जितना आसान है, मिलना उतना ही मुश्किल. यह कहना है सोनारी निवासी समाजसेवी जवाहरलाल शर्मा का. उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवाधिकार के लिए समर्पित किया है. उन्होंने फ्री लीगल एड कमेटी बनायी. करीब 40 साल से मानवाधिकार की लड़ाई लड़ रहे जवाहरलाल शर्मा बताते हैं कि लोग जागरूक नहीं हैं. समाज में इस तरह से भ्रष्टाचार फैला हुआ है कि अधिकारों की बात करने वाला दोषी करार दिया जाता है. वो रेडियो का जमाना था जब एमनेस्टी इंटरनेशनल के बारे में सुना. वहीं उत्साह मिली. कॉरेस्पॉन्डेंट के रूप में जुड़े और वहीं से काम करना शुरू किया. आज भी कैदियों के अधिकारों की लड़ाई जारी है. मामला कई साल पुराना है, जब सुप्रीम कोर्ट में पीआइएल फाइल किये थे. यह मामला उन कैदियों का था, जो फैसले के इंतजार में सालों से जेल में हैं. कहा जाये, तो पूरे देश में 75 प्रतिशत ऐसे मामले हैं. फैसला आने तक कैदी के जीवन का एक हिस्सा पूरी तरीके से समाप्त हो जाता है. इन कैदियों के जीवन पर एक फिल्म भी बनायी. जिसका टाइटल पनिशमेंट वीफोर ट्राइल है. इन कैदियों के लिए गिरफ्तारी बीमा की मांग की गयी है. हर चीज का, व्यक्ति का बीमा होता है, तो फिर इनका क्यों नहीं. जब तक यह जेल में हैं, इनके बीमा की किस्त सरकार दे. अगर व्यक्ति दोषी पाये जाता है, तो फैसला आने के बाद वो इस राशि को लौटाये और रिहा होने पर बीमा की राशि उसे पुन: जीवन को नये सिरे से शुरू करने के लिए प्राप्त हो सके.

महिलाओं के अधिकार के लिए बनी आवाज : उषा सिंह

17 साल पहले ह्यूमन राइट्स संस्था से जुड़ी पारडीह निवासी उषा सिंह महिलाओं के अधिकारों पर काम करती है. यही नहीं, जहां भी प्राकृतिक आपदा व संकट की स्थिति बनी, संस्था के तरफ से जाकर उन्हें हर संभव मदद दी गयी. करीब पांच साल पहले बालू काजर गांव की एक 18 वर्षीय लड़की को गांव में तंग करने एवं बेघर करने का मामला सामने आया. इस पर तुरंत संज्ञान लेते हुए पूरी टीम के साथ वहां पहुंच कर पीड़िता को न्याय दिलाया गया. तामोलिया ग्वाला बस्ती में 45 झोपड़बस्तियों को टूटने से बचाया. बेटों के घर में प्रताड़ित माता-पिता को न्याय दिलाया गया. 22 लाख रुपये मिले. लगभग 17 साल में अनगिनत हजारों केस किये गये. उनको न्याय दिलाने की कोशिश की गयी, जो आज भी जारी है. आज खुशी होती है, जब 80 साल की माताएं पैर छूती हैं, झुलसी हुई बहू को, लड़कियों को पीड़ा से बचाया है.

लगातार 40 वर्षों से मानवाधिकार के लिए काम कर रही हैं अंजलि बोस

सुंदरनगर निवासी अंजलि बोस ने मानवाधिकार के क्षेत्र में पिछले 40 वर्षों से हैं. उन्होंने फ्री लीगल एड कमेटी से जुड़ कर इस क्षेत्र में काम करना प्रारंभ किया. यह 1979-80 की बात है, जब टीम ने उन कैदियों के बारे में पता लगाया, जो कि छोटे-मोटे अपराध के कारण नौ-दस साल से सजा काट रहे हैं. उनमें ज्यादातर बच्चे व किशोर थे, जो कि बिजली के तार की चोरी, मंदिर से मूर्ति चोरी जैसे अपराध के कारण जेल में लाये गये थे. उनको केस व इससे संबंधित किसी तरह की कोई जानकारी नहीं थी. सबसे पहले इन लोगों के लिए आंदोलन किया गया. केस दायर हुआ. नतीजा कुछ समय के बाद जुर्माना लगा कर इन्हें रिहा किया गया. इसके बाद ही इस क्षेत्र में गंभीर रूप से काम किया. गांवों में उम्रदराज लड़के से विवाह, दहेज प्रताड़ना व अन्य कई तरह के अत्याचार व महिला उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठायी. यह काम आज भी जारी है.

मानवाधिकारों के लिए तत्पर संस्थाएं

  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एवं अपराध रोधी संगठन

आठ साल से यह संस्था काम कर रही है. असम में इसका मुख्य कार्यालय है. 18 राज्यों में यह काम कर रही है. जमशेदपुर में भी इसकी शाखा है. घरेलू हिंसा, अधिकारों से वंचित व पीड़ित लोगों को न्याय दिलाना, मेडिकल कैंप, चेकअप कैंप व अन्य कार्य किये जाते हैं. हर साल बड़े पैमाने पर मेडिकल कैंप का आयोजन होता है और लोगों का नि:शुल्क मोतियाबिंद ऑपरेशन करवाया जाता है.

  • झारखंड ह्यूमन राइट्स एसोसिएशन

वर्ष 2006 में संगठन की नींव मनोज मिश्रा ने रखी. यह एनजीओ के रूप में लोगों के अधिकारों के लिए काम करती है. संस्था लोगों के मौलिक अधिकारों के लिए काम करती है. सैकड़ों के केस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में चल रहे हैं. मौजूदा समय में संस्था बायो मेडिकल वेस्ट पर काम कर रही है, जिसको लेकर हाइकोर्ट में याचिका दायर किया गया है.

  • इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स एसोसिएशन

22 मार्च 2011 में इस संगठन की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई. मुख्य कार्यालय जेनेवा में है. वहीं भारत में पुणे (महाराष्ट्र) में है. देश के हर राज्य में इसकी शाखा कार्यरत है. झारखंड व जमशेदपुर में संगठन बाल उत्पीड़न, महिला उत्पीड़न, घरेलू कामगार महिलाओं के अधिकार, के अलावा भूखों को खाना खिलाने, कुपोषण व अन्य विषयों पर काम कर रही है.

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